शनिवार, 27 सितंबर 2014

हनुमान मुक्त का व्यंग्य - आंदोलन शादी कराने के लिए

आंदोलन शादी कराने के लिए

एक नगर के कुछ अविवाहित जवान लड़कों ने सरकार से मांग की कि या तो हमारी शादी करवाई जाए या छेड़छाड़ करने की इजाजत दी जाए। उनका तर्क था हम भी आदमी हैं, हमें भी भूख लगती है, हमारी भी आवश्यकताएं हैं, जब जानवर तक को अपनी नैसर्गिक आवश्यकता पूरी करने की आजादी है तो हमें क्यों नहीं?

जैसे कि सरकार की आदत है वह ऊँचा सुनती है। सामान्य तरीके से मांगी गई मांग उसके कानों तक नहीं पहुँचती। उनकी मांग भी नहीं सुनी गई।

लड़के सरकार के सुनने का इंतजार करते रहे। आखिर जब उनके सब्र का बांध टूट गया तो उन्होंने अपने जैसे युवकों को पीले चावल भेज-भेज कर अपनी मांग के समर्थन में खड़े होने का आग्रह किया।

पीले हाथ होने का वर्षों से इंतजार कर रहे युवक पीले चावल मिलते ही मांग के समर्थन में खड़े हो गए। धीरे-धीरे उन अविवाहित युवकों की मांग ने एक आंदोलन का रूप ले लिया।

युवकों के परिवार जनों का भी इस आंदोलन को हिडन समर्थन था। मांग दिलचस्प थी। मीडिया ने पब्लिक का इंट्रेस्ट देखते हुए अपने स्टूडियो में इस विषय पर विषय-विशेषज्ञों द्वारा चर्चा-परिचर्चा शुरु कर दी। जिसका लाइव टेलीकास्ट किया जाने लगा। चैनलों की टीआरपी बढ़ने लगी।

आंदोलन से जुड़े युवकों को चैनलों पर ला-लाकर उनके तर्कों को दिखाया जाने लगा।

समाचार-पत्रों में इस विषय पर संपादकीय लिखे जाने लगे। इनमें से कुछ का मानना था कि युवाओं की यह मांग जायज है। उन्हें भी शादी करने का अधिकार है। आखिर, उनकी शादी नहीं होगी तो वे अपनी नैसर्गिक आवश्यकता कैसे पूरी करेंगे? सरकार को या तो उनकी शादी करानी चाहिए या आवश्यकता पूर्ति करने का कोई दूसरा रास्ता खोजना चाहिए।

कुछ लोग युवाओं की इस मांग को बिल्कुल नाजायज बता रहे थे। उनका कहना था कि जीवन जीने के लिए विवाह करना कोई आवश्यक नहीं। हमारे देश में ऐसे बहुत से लोग हुए हैं जिन्होंने अविवाहित रहते हुए बड़े-बड़े पदों पर रहकर काम किया है। हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, राष्ट्रपति माननीय डॉ. अ दुल कलाम सहित सैंकड़ों ऐसे लोग हैं जिन्होंने जीवन भर शादी नहीं की। उनकी भी नैसर्गिक आवश्यकता रही होगी, लेकिन उन्होंने इस पर कभी ध्यान नहीं दिया।

देश की राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार राहुल गांधी आज तक अविवाहित हैं, उन्होंने आज तक ऐसी मांग नहीं की। वैसे भी अविवाहित होना कोई अभिशाप नहीं है। दुनिया के अन्य देशों में युवक अविवाहित रहते हैं। यहां भी रह रहे हैं, लेकिन इतिहास गवाह है युवाओं ने कभी इस प्रकार की मांग नहीं की। भारतीय अविवाहित युवाओं द्वारा की गई यह मांग अनैतिक है। इससे हमारे युवाओं का देश में ही नहीं, विदेशों में भी सर झुक जाएगा।

धर्म के मठाधीशों द्वारा युवाओं की इस मांग को भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताया गया। उनका तो यहां तक कहना था कि ऐसे युवाओं को तुरन्त पकड़कर जेल में डाल दिया जाना चाहिए।

अलग-अलग स्थानों से अलग-अलग तर्क आ रहे थे। कोई इसे जायज तो कोई इसे नाजायज ठहरा रहा था। समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर यही खबर प्रमुखता से आ रही थी।

इतना सब होने के बाद सरकार की नींद खुली। उसे सुनाई दिया कि अविवाहित युवा उनसे कुछ मांग कर रहे हैं। सरकार हरकत में आ गई। उसने सम्बन्धित जिला प्रशासकों को पत्र लिखा कि ‘कौनसी प्रशासनिक चूक हुई है जिसके कारण अविवाहित युवाओं को इस प्रकार का कदम उठाना पड़ा, अब से पहले भी युवाओं की शादी नहीं होती रही थी। वे भी अपना काम चला रहे थे। फिर अब ऐसा क्या हो गया कि उन्हें इस प्रकार आंदोलन करने के लिए बाध्य होना पड़ा। हमें इस मांग की सच्चाई पर ही शक है। जांच करके यह बताएं कि क्या वास्तव में युवा शादी की मांग करने लगे हैं और उनकी मांग कितनी जायज है? सात दिनों में अब से पहले किए गए समस्त निर्णयों की उच्च स्तर पर समीक्षा करें। हमें इसमें कहीं विदेशी ताकतों का हाथ नजर आता है।’

प्रशासन पूरी तरह चाक-चौबन्द हो गया। गत दिनों हुए निर्णयों की स्वयं जिला कलेक्टरों द्वारा समीक्षा की जाने लगी। समीक्षा में यह निकलकर आया कि गत दिनों प्रशासन द्वारा आस-पास चलने वाले अवैध चकलाघरों को पूरी तरह बन्द कर दिया गया था। स्कूल, कॉलेज और महिलाओं का जहां आना-जाना अधिक रहता था। वहां गश्त बढ़ा दी गई थी। छेड़छाड़ करने वाले युवाओं को बन्द कर दिया गया था। सुनसान इलाकों पर सुरक्षा बढ़ा दी गई थी। प्रशासन ने मांग की सच्चाई जानने के लिए आंदोलनकारी नेताओं से इस बारे में पूछा, ‘क्या प्रमाण है कि तुम्हें शादी करने की नितान्त आवश्यकता है और तुम ही इसकी मांग कर रहे हो?’

युवा नेता बोले, ‘कहें तो यहीं प्रत्यक्ष प्रमाण दे दें।’ प्रशासन उनकी प्रत्यक्ष प्रमाण की क्षमता से घबरा गया। बोला, ‘नहीं-नहीं। हम आपकी आवश्यकता और क्षमता से वाकिफ हैं। वह तो सरकार के ऐसे निर्देश थे इसीलिए हमें यह सब पूछना पड़ा। आप जा सकते हैं। हम सरकार को आपकी आवश्यकता और क्षमता के बारे में बता देंगे।’

प्रशासन ने सरकार को लिखा कि हमारी व्यक्तिगत जानकारी के आधार पर आपको यह विश्वास दिलाते हैं कि युवाओं को विवाह करने की सख्त आावश्यकता है और वे इसकी मांग कर रहे हैं। अगर उनकी आवश्यकता पर अविश्वास किया गया तो वे इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देने लग जाएंगे। अब से पहले अविवाहित रहने वाले युवाओं की संख्या बहुत कम रहती थी। वे संस्कारों के कारण ऐसी मांग उठाने में हिचक महसूस करते थे लेकिन अब ऐसे युवाओं की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हो रही है। साथ ही इन्होंने शर्म हया भी ताक पर रख दी है। इसीलिए इनकी मांग जायज भी है। इसका प्रबंध करने की नितान्त आवश्यकता है।

साथ ही गत दिनों हुई प्रशासनिक चूक से भी सरकार को अवगत करवा दिया गया था।

सरकार ने जिला प्रशासन के पत्र को पढ़ा और इस पर टिप्पणी कर इसका हल निकालने के लिए एक समिति को सौंप दिया। समिति ने अथक अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि युवाओं की मांग बिल्कुल जायज है। उन्हें इसकी आवश्यकता भी है। जब जानवर तक अपनी नैसर्गिक आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए स्वतंत्र हैं तो वे क्यों नहीं? इसकी पूर्ति करना सरकार और समाज का नैतिक दायित्व है लेकिन युवाओं की शादी कराने के लिए युवतियां कहाँ से लाई जाएं? भ्रूण हत्या के कारण लिंगानुपात बिगड़ गया है। प्रत्येक युवक को युवती दिलवाना असम्भव है। युवतियाँ कहीं कल-कारखाने या प्रयोगशाला में तो बनाई जा सकती नहीं और ना ही उन्हें किसी अन्य देश से आयातित कर मंगाया जा सकता है। जिस स्थिति का आज सामना कर रहे हैं उससे भयावह स्थिति भविष्य में आने वाली हैं।

अगर दो युवकों की एक युवती से शादी करने का प्रस्ताव समाज और युवतियाँ मान लें तो इसका हल निकल सकता है। अन्यथा युवाओं की पहली मांग की पूर्ति करना सम्भव नहीं लगता।

दूसरी मांग जिसमें वे युवतियों से छेड़छाड़ करने की इजाजत मांग रहे हैं, यह उनकी निर्लज्जता की पराकाष्ठा है। जब वे इस प्रकार की मांग कर सकते हैं तो वे यह भी कह सकते हैं कि हमारे लिए वैश्यालय खोला जाए। जहां आने-जाने पर हमारे लिए किसी प्रकार की कोई पाबंदी नहीं हो। बल्कि उसका प्रबंध भी सरकारी तौर-तरीकों से लाईसेंस प्रणाली से किया जाए।

समिति युवाओं की मांगों को तो जायज मानती है लेकिन अभी उनकी पूर्ति करना किसी भी स्थिति में जायज नहीं है। समिति का मानना है कि समाचार-पत्र पत्रिकाओं, टीवी चैनलों पर विज्ञापन देकर, सामाजिक स्तर पर परिचर्चा करवाकर ऐसा वातावरण तैयार करवाया जाए जिससे युवाओं की जायज मांग समाज को भी जायज लगे। और उसकी पूर्ति कर सकने के समस्त माध्यम जो आज नाजायज लग रहे हैं वे भी जनता को जायज लगने लग जाएं। अगर आवश्यकता पड़े तो इसके केम्पेन (प्रचार-प्रसार) के लिए विदेशी कम्पनियों की मदद भी ली जाए। तब तक के लिए प्रशासनिक स्तर पर जो चूक की गई है उसे दुरुस्त कर युवाओं को थोड़ी बहुत राहत देने का प्रयास करे जिससे उनके सर में चढ़ रही गर्मी से उनका दिमाग खराब ना हो। अविवाहित रहने के फायदे और अन्य नुस्खे जिनसे आसानी से बिना विवाह किए काम चलाया जा सकता है, के बारे में उन्हें बताकर जागरुक किया जाए।

समाचार-पत्र-पत्रिकाओं में आ रहे विज्ञापन जिनको पढ़कर, देखकर अविवाहित युवाओं को बेचैनी अनुभव होती हो उन्हें भी प्रकाशित होने से रोका जाए।

सरकार ने समिति की रिपोर्ट पर अमल करना शुरु कर दिया है। सभी जिला प्रशासकों को इसकी पालना करने के आदेश के साथ रिपार्ट भेज दी गई है।

1 blogger-facebook:

  1. एक वास्तविक समस्या जो सब झेलते है पर आवाज़
    नहीं उठाते और जिसके जिम्मेदार भी हैं हम सब ये
    कन्या भ्रूण हत्याये विवाह की बढती उम्र आधुनिक
    संचार साधन क्या यह सब मिलकर विवाह योग्य
    युवक युवतियों की समस्यायों को और नहीं बढ़ाते
    श्री हनुमान मुक्त ने एक जीवंत समस्या को व्यंग के
    माध्यम से सशक्त ढंग से उठाया है बधाई

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------