राकेश जोशी की ग़ज़लें

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डॉ. राकेश जोशी की पाँच ग़ज़लें

1
हमें हर ओर दिख जाएं, ये कचरा बीनते बच्चे
भुलाए किस तरह जाएं, ये कचरा बीनते बच्चे

यही है क्या वो आज़ादी कि जिसके ख़्वाब देखे थे
ये कूड़ा ढूँढती माँएं, ये कचरा बीनते बच्चे

तरक्की के फ़साने तो सुनाए जा रहे हैं पर
न इनमें क्यों जगह पाएं, ये कचरा बीनते बच्चे

ये बचपन ढूंढते अपना, इन्हीं कचरे के ढेरों में
खिलौने देख ललचाएं, ये कचरा बीनते बच्चे

वो जिनके हाथ में लाखों-करोड़ों योजनाएँ हैं
उन्हें भी तो नज़र आएं, ये कचरा बीनते बच्चे

वो जिस आकाश से बरसा है इन पर आग और पानी
उसी आकाश पर छाएं, ये कचरा बीनते बच्चे

वो तितली जिसके पंखों में मैं सच्चे रंग भरता हूँ
कहीं उसको भी मिल जाएं, ये कचरा बीनते बच्चे

कभी ऐसा भी दिन आए, अंधेरों से निकलकर फिर
किताबें ढूँढने जाएं, ये कचरा बीनते बच्चे


2
डीज़ल ने आग लगाई है, फिर भी ज़िंदा हूँ
खूब बढ़ी महंगाई है, फिर भी ज़िंदा हूँ

पत्थर बनकर पड़ा हुआ हूँ धरती पर
याद तुम्हारी आई है, फिर भी ज़िंदा हूँ
बहुत उदासी का मौसम है, ख़ामोशी है
मीलों तक तन्हाई है, फिर भी ज़िंदा हूँ

खेतों में फसलों के सपने देख रहा हूँ
नींद नहीं आ पाई है, फिर भी ज़िंदा हूँ

एक कुआँ है कई युगों से मेरे पीछे
आगे गहरी खाई है, फिर भी ज़िंदा हूँ

सरकारों ने कहा गरीबों की बस्ती में
खूब अमीरी आई है, फिर भी ज़िंदा हूँ

जंगल-जंगल आग लगी है और तुम्हारी
चिट्ठी फिर से आई है, फिर भी ज़िंदा हूँ
3
धरती के जिस भी कोने में तुम जाओ
वहाँ कबूतर से कह दो तुम भी आओ

अगर आग से दुनिया फिर से उगती है
जंगल-जंगल आग लगाकर आ जाओ

आज तुम्हारी आँखों में फिर से आँसू हैं
उजड़ गए हर गाँव से मिलकर आ जाओ

कहो करोड़ों से, अच्छा फिर मिलते हैं
और हजारों से कह दो तुम मत जाओ

महल में राजा के कल फिर से दावत है
भूखे-प्यासे लोगो, अब तुम सो जाओ

फसलो, तुमसे बस इतनी-सी विनती है
सेठों के गोदामों में तुम मत जाओ

4
जो भी बात न पूरी समझा
आधी और अधूरी समझा

उतना ही भूला हूँ तुमको
जितना बहुत ज़रूरी समझा

खूब अँधेरे में बैठा तो
ख़्वाबों की बे-नूरी समझा

बोल न कुछ तू आसमान को
दिल से दिल की दूरी समझा

मज़दूरों से मिला तो उनको
मिली नहीं मज़दूरी समझा

पुल टूटा तो किसने उसको
कैसे दी मंज़ूरी समझा

रोटी से मिलकर तू उसको
भूखों की मजबूरी समझा

5
नगर की जनता अब भी भूखी-प्यासी है
ख़बर तुम्हारी बहुत पुरानी बासी है

राजा, महल से बाहर थोड़ा झाँको तुम
चारों और अँधेरा और उदासी है

औरत होना पहले तो अपराध नहीं था
औरत लेकिन आज सभी की दासी है

जिस बेटे को शहर में अफसर कहते हैं
उस बेटे की माँ को गाँव में खाँसी है

जहाँ रात में बच्चे भूख से चिल्लाते हैं
चैन से तुमको नींद वहां कैसे आती हैं

तुमको है क्या याद तुम्हारे राजमहल तक
सड़क हमारे गाँव से ही होकर जाती है

 

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डॉ. राकेश जोशी
असिस्टेंट प्रोफेसर (अंग्रेजी)
राजकीय महाविद्यालय, डोईवाला
देहरादून, उत्तराखंड

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1 टिप्पणी "राकेश जोशी की ग़ज़लें"

  1. डाक्टर जोशी जी आपकी गजले बहुत अच्छी लगी
    बार बार दिल को छुवा आपने इन्हें दिल से लिखा है
    ऐसा मेरे दिल को एहसास हुवा उत्तम लेखन के लिए
    बधाई और शुभकामना

    उत्तर देंहटाएं

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