रविवार, 7 सितंबर 2014

श्याम गुप्त के नवगीत

                 डा श्याम गुप्त के नवगीत


१. कितना अच्छा होगा जब,,,,,

 

कितना अच्छा होगा जब,

बिजली पानी न आयेगा |

              ऐसी कूलर नहीं चलेंगे,

              पंखा नाच नचाएगा  ||           

 

छत की शीतल मंद पवन में,

सोने का आनन्द रहेगा |

जंगल-झाडे के ही बहाने,

प्रातः सैर का वक्त मिलेगा |

 

नदी कुआं औ ताल नहर फिर,

जल क्रीडा का सेतु बनेंगे |

शाम समय छत पर, क्रीडाओं-

चर्चाओं के दौर चलेंगे |

         नहीं चलेगें फ्रिज टीवी,

         डिश, केबुल न आयेगा ||

 

मिलना जुलना फिर से होगा,

नाते –रिश्तेदारों में |

उठना बैठना घूमना होगा,

पास पडौसी यारों में |

 

घड़े सुराही के ठन्डे जल की,

सौंधी  सी गंध मिलेगी |

खिरनी फालसा शरवत, कांजी,

लस्सी औ ठंडाई घुटेगी |

         घर कमरों में बैठे रहना,

         शाम-सुबह न भाएगा ||

 

भोर में मंदिर के घंटों की,

ध्वनि का सुख-आनंद मिलेगा|

चौपालों  पर ज्ञान वार्ता,

छंदों  का  संसार सजेगा |

 

धन्यवाद है शासन का, इस –

अकर्मण्यता का वंदन है |

धन्य धन्य  हम भारत वासी,

साधुवाद है अभिनन्दन है |

         लगता है यह अब तो यारो!,

          सतयुग जल्दी आजायेगा ||

 

 

२..कविता कविता खेलें ( ब्रजभाषा )

                      आऔ हम सब मिलिकैं ,
                      कविता कविता खेलें ||

छंद औ अलंकार में भूलें
  विषय व्याकरन भाव |
लच्छनि बारी भासा होय तौ
का अनुभाव-विभाव |

भाँति भांति के उपमा रूपक,
गढ़िकें ऐसे लावैं |
जन जन की कहा बात,
नामधारी न समुझि पावैं |

                  नए नए बिम्बनि कौं ढूंढें ,
                  मिलिकैं पापड़ बेलें ||

आदि मध्य औ अंत में-
ना होय कोऊ लाग-लपेट |
छत्तीस व्यंजन ठूँसि कै बस-
भरिदें कविता कौ पेट |

ये दुनिया है संत्रासनि की ,
रोनौ-गानौ गायौ |
कवि तौ सुकवि औ समरथ है ,
कहा सुन्दर गीत सुनायौ |
                   का सारथकता, सामाजिकता,
                   सास्तर ज्ञान कौं पेलें ||

कम्प्युटर जुग में सब्दन के,
नए निकारें अर्थ |
कोऊ पूछै बतलाय डारें ,
सबके अर्थ -अनर्थ |

सुनें चुटकियाँ आज ,
हंसें रोवें घर जायकें |
जासौं पूछें अरथ,
वोही रहि जावै झल्लाय कें |
                       घर जायकें सब्दावली ढूंढें ,
                          सब्दकोस कौं झेलें ||

काऊ बड़े मठाधारी कौं
चलौ पटाय डारें |
पूजा अरचन करें,
आरती करें मनाय डारें |

काऊ तरह औ कैसे हूँ ,
बस जुगति-जुगाड़ करें |
पुरस्कार मिलि जावै ,
औ सब जै जैकार करें |
                      काऊ तरह ते छपवाय डारें ,
                       बाजारनि में ठेलें ||


३..भरी उमस में... (ब्रजभाषा )

                आऔ आजु लगावैं घावनि पै
                गीतनि के मरहम |

मन में है तेज़ाब भरौ
पर गीतनि  कौ हू  डेरौ |
मेरे गीतनि में ठसकी है,
दोस नांहि है मेरौ |

मेरौ अपनौ काव्य-बोधु है,
आपुनि ठनी ठसक है |
मेरी आपुनि ताल औ धुनि  है,
आपुनि सोच-समुझि है |
                   भरी उमस में कैसें गावें
                    प्रेम प्रीति प्रीतम ||

जो कछु देखौ सोई कहतु हौं
झूठौ भाव है नाहीं |
जो कछु मिलौ सोई लौटाऊँ
कछु हू नयौ  है नाहीं |

हमकों थी उम्मीद
खिलेंगे इन बगियन में फूल |
पर हर ठौर ही उगे भये हैं
कांटे और बबूल |
                   टूटि चुके हैं आजु समय की
                     सांसनि के दम-ख़म |

                    आओं आजु लगावैं घावनि पै
                    गीतनि के मरहम ||

 

4.गुणा भाग की माया

         ना उम्मीदी ने हर मन में

         अविश्वास पनपाया |

 

असली से भी सुन्दर

नकली पुष्प हुआ करते हैं|

लाचारी है बाज़ारों में

वही बिका करते हैं|

 

         बिंदु बिंदु पर घटा-बढ़ी है    

         गुणा भाग की माया ||

 

चौकीदार चोर बन बैठे

जनता की तकदीर |

जन जन है लाचार, चोर-

बन बैठे आज वजीर |

 

        विश्वासों में घटाटोप

        अंधियारा सा छाया ||

 

अब तो भोग प्रभु का पाकर

भक्त रुग्ण होजाते |

धैर्य और श्रृद्धा, तृष्णा के =

झुरमुट में खोजाते |

 

       बाज़ारों ने सौदा करने का

       निज धर्म निभाया ||

 

पथरीली राहें दिखलाते

मैथ मस्जिद चौपाल |

बात बात पर सडकों पर

आजाते बाल-गुपाल |

 

       मुद्दों मुद्दों पर विवाद का

       विषम जाल-भ्रम छाया ||

 

नई फसल कब अपनाती है

धैर्य धीरता धन को |

हम चाहें मुट्ठी में करसकते हैं

सकल भुवन को |

 

      अहंभाव युत, द्वंद्व भाव में

      जन जन है भरमाया ||

 

गला काट प्रतियोगी हैं अब

सभी ख़ास और आम |

नाउम्मीदी होती है तो

जीवन करें तमाम |
 
 

      सदा कमाई रत हमने, कब-

       धर्म कर्म सिखलाया ||

 

ना उम्मीदी ने हर मन में

अविश्वास पनपाया ||


   ---------डा श्याम गुप्त, सुश्यानिदी, के-३४८ आशियाना लखनऊ -२२६०१२

5 blogger-facebook:

  1. आपकी लिखी रचना बुधवार 10 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. धन्यवाद यशोदा जी.....

    उत्तर देंहटाएं
  3. धन्यवाद रवि जी....

    उत्तर देंहटाएं
  4. 1. कितना अच्छा होगा जब,,,,,
    4.गुणा भाग की माया
    गीत बहुत ही शानदार लगे

    स्वागत है मेरी नवीनतम कविता पर रंगरूट

    आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  5. मन के भावो को अच्छे से सजाया है
    अपनी कविताओं को सुन्दर कलेवर
    पहिनाया है अच्छी अच्छी कविताओं
    के लिये बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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