सोमवार, 22 सितंबर 2014

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - बेलगाम प्रदूषण के नतीज़ों से बेखबर कब तक ?

बेलगाम प्रदूषण के नतीज़ों से बेखबर कब तक ?

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

क्या आप जानते हैं कि प्रदूषण की रोकथाम के कारगर इंतजाम नहीं करने की वजह से राजस्थान का कोटा पूरा शहर सांसत में है। शहर और आस पास के छोटे-बड़े सैंकड़ों कारखानों के काले धुएं से कोटा में तेजाबी बारिश का वातावरण बन रहा है। यहां कारखानों की कम लंबाई वाली चिमनियों धुंएँ,कार्बन और रसायन युक्त पानी से जमीन बंजर हो रही है। कारखानों में काम करने वाले दस लाख लोगों की ज़िंदगी सवालिया निशान के दायरे में आ गई है। नदी-नालों, तालाबों का पानी विषेला हो रहा है। 

जानकारी के मुताबिक वहां अफीम के उत्पादन में पहले के मुकाबले कमी आई है। यहां तक की साग सब्जी की खेती पर भी इसका बूरा असर देखा जा रहा है। यहां की मशहुर मिर्च पहले आगरा, बड़ौदारा, सूरत तक पहुंचती थी, लेकिन कारखाने के प्रदूषण ने मिर्च की पैदावार चौपट कर दी है। चिमनियों से उड़ने वाली राख का बुरा प्रभाव फसलों की रखवाली करने वाले किसानों की आखों में हो रहा है। शहर के आसपास के चारागाह भी अब मलबे के ढ़ेर में बदल रहे हैं। जिसके कारण पशुओं को चराने की विकट समस्या भी पैदा हो गई है।

प्रदूषण के दुष्प्रभाव के चलते पशुओं को भी अनेक बिमारियों ने दबोच लिया है। इधर मुंबई-दिल्ली मार्ग पर स्थित लाखेरी सीमेन्ट कारखाना घनी आबादी के बीच काला धुंआ फैलाकर लोगों के फेफड़ों को खराब कर रहा है। क्षेत्र में क्षय रोग पीड़ित सैंकड़ों लोग हैं। गरमपुरा, गांधीपुरा, तमोलखाना, गणेशपुरा, बसापूरी इलाके में क्षय रोग से पीड़ितो की तादात खूब है। यहां कारखाने के प्रदूषण से बंगला व देशी पान के बैरजे बर्बाद हो गए।

कोटा में चंबल नदी के समीप स्थित मकानों से निकलने वाल मेला तथा गंदे नालों का पानी गिरने से चंबल मैली हो रही है। हाड़ौती मे जलस्त्रोतों में तेजी से बढ़ते प्रदूषण और वाहनों के प्रदूषण से पर्यावरणका खतरा बढ़ गया है। कोटा में सीवरेज व्यवस्था नदारत होने से भी गंदगी प्रदूषण बढ़ा रही है। जिससे पिलीया और पेट की बीमारियां बढ़ रही है। गांवों में प्रदूषित पानी पीने से लोगोंके हाथ पैर टैडे-मैडे हो रहे है। ध्वनी प्रदूषण की रफ्तार भी कोटा शहर में बढ़ रही है और ऐसे में श्वास व कान के रोगों में इजाफा हो रहा है। कुल मिलाकर प्रदूषण रोकने की लचर व्यवस्था और छोटे-बड़ेकारखानों से फैल रहे प्रदूषण पर्यावरण का खतरा घर-घर मंडराने लगा है।

सोनांचल का सिंगरौली अंचल फिर गरमा रहा है। अब पर्यावरण बचाने के लिये किसान सडक पर उतर आए है। सिंगरौली जिले के गोरबी-बरगवां मार्ग पर कसर गेट से करीब कोस भर आगे स्थित त्रिमुला ईण्डस्ट्रीज़ के आस-पास रहने वाले 12 गाँव के किसान इस कंपनी की वजह से फ़ैल रहे प्रदूषण से परेशान हैं। इसे लेकर वे लगातार सवाल उठाते रहे हैं पर पिछले कई वर्षों से लगातार होती बातचीत के नाकाम होने के बाद अब किसान आर पार की लड़ाई का मन बना चुके हैं। पच्चीस फरवरी को सुबह 11 बजे सैकडो किसानों ने त्रिमुला इण्डस्ट्रीज़़ के गेट पर पहुँच कर कम्पनी प्रबन्धन के सामने पाँच सूत्रीय माँगें रखीं। प्रबन्धन के तरफ से कोई पहल न होती देख किसानों ने कम्पनी के गेट पर ताला जड़ दिया, जिससे कम्पनी का काम बन्द हो गया।

त्रिमुला इण्डस्ट्रीज़़ में सिंगरौली व सोनभद्र जिले से लोहे का कबाड़ इकट्ठा करा कर गलाया जाता है, जिसके बाद इससे लोहे के कई किस्म के सामान तैयार किये जाते हैं। वित्तीय वर्ष 2012-13 के कम्पनी के रिपोर्ट के मुताबिक, कम्पनी का वार्षिक लेन-देन लगभग 800 करोड़ रूपये का है। प्रदूषण के अलावा, समय-समय पर, इस एक परिवार द्वारा संचालित कम्पनी पर ढेरों आरोप लगते रहें हैं। इनमें संगठित तौर पर इलाके भर में कबाड़ चोरी करना, किसानों को डरा-धमका कर उनकी जमीने हथियाना, अवैध कब्जे करना, श्रम कानूनों का उलंघन आदि कुछ संगीन मामले हैं जिनमें कम्पनी को कई बार जाँच का सामना भी करना पड़ा है। यह बात दीगर है कि प्रशासनिक सांठ-गांठ और केन्द्रीय नेतृत्व व राज्य सरकार की खुलेआम मद्दद से, कोई भी जांच अब तक मुकम्मल नतीजे तक नहीं पहुच सकी है।

बहरहाल, मेन गेट पर तालाबंदी के बाद कम्पनी प्रबन्धन हरकत में आया और जिला प्रशासन की मध्यस्थता मे वार्ता की पेशकश रखी। शाम छह बजे तक तीन बार बातचीत के नाकाम होने पर प्रशासनिक गुण्डागर्दी के बल पर कम्पनी प्रबन्धन ने गेट का ताला तो तुड़वा लिया, जिससे नाराज़् होकर किसानों ने तत्काल ‘ प्रदूषण मुक्ति मंच ‘ का ऐलान करते हुये अनिश्चितकालीन अनशन की घोषणा कर दी। अम्बरीश देव पाण्डेय, नईम खॅान, पप्पू सिंह, मैनू खान (सभी किसान), संजय नामदेव व रंजन चौधरी (ऊर्जांचल विस्थापित कामगार यूनियन) ने अनिश्चितकालीन अनशन तत्काल प्रारम्भ करते हुये आन्दोलन को और तेज करने की घोषणा कर दी। मौके पर उपस्थित उर्जांचल विस्थापित कामगार यूनियन ,लोकविद्या जन आन्दोलन और किसान, आदिवासी, विस्थापित एकता मंच के कार्यकर्ताओं ने आन्दोलन को बिना किसी शर्त के समर्थन देने की घोषणा की और किसानों के इस आन्दोलन को हरसम्भव तरीके से मजबूत बनाने का आहवान किया। अब यह आन्दोलन लंबा चलेगा।

रमपुरवा, समदा, पड़री, कसर, सालन, भलूआ, बस्तौली, बड़ोखड़, सेमुआर, गन्दवली तथा गोरबी तक के गांवों के हालात की जानकारी दी वह भयावह है। पिछले वर्ष, 2013 में मप्र राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इलाके भर की मिट्टी की उर्वरता पर पडते असर की जांच की और पाया कि उर्वरता लगभग नष्ट हो चुकी है। गाँव के लोगो ने दिखाया कि किस प्रकार उनके भोजन और पीने के पानी, ढके रहने के बावजूद एक काली परत से पटे रहते है। गाँव के बुजुर्गों ने बताया कि उनके गाँव मौसमी फलों व सब्जियों से भरे पूरे रहते थे, आज इस प्रदूषण के कारण पेड़ों पर फल नहीं लगते, बच्चे आम, अमरूद जैसे फल खाने को तरस जाते हैं। हालात पर काबू की ज़रुरत कितनी है, कहने की ज़रुरत शायद नहीं है। 

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लेखक दिग्विजय कालेज, राजनांदगांव में प्रोफ़ेसर हैं।

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