शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

ओम प्रकाश शर्मा का आलेख -- आस्था बनाम तर्क

आस्था बनाम तर्क  

   राग द्वेष रहित व्यक्ति जिन विचारों और कर्मों का समर्थन करते हैं और आने वाले समाज के लिए उपयोगी मानते हैं तथा आपका मन भी जिसकी गवाही देता है वही धर्म है। जिन कर्मो एवं सिद्धान्तों को विभिन्न धर्मो के अन्तर्गत आज हम स्वीकार कर रहे है वे इसी प्रकार के महान विचारको एवं मनीषियों  द्वारा बनाई गई आचार संहिताएँ है। छोटे-छोटे कर्म जो इन महान विभूतियों की दृष्टि में व्यक्तिगत, सामाजिक एवं साँस्कृतिक महत्त्व रखते थे व आने वाले समाज में जिन कर्मो का किया जाना वे नितान्त आवश्यक समझते थे, उन्हें वे धर्म के साथ जोड़ते चले गए। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि इन धार्मिक कृत्यों को धर्म पर आस्था रखने वाले लोग अवश्य करेंगे और ऐसा करने से उनका तथा समाज का कल्याण स्वतः ही होता चला जाएगा। वे आचार्य नाम या यश के लोभी नहीं थे बल्कि वे तो  देश अथवा समाज के प्रति तन मन से समर्पित थे। वे जन कल्याण में विश्वास रखते थे यही कारण था कि बड़े-बड़े चक्रवर्ती सम्राट सदैव उनके चरणो में नत मस्तक हो जाया करते  थे। इन कर्मों  को धर्म से जोड़ने के पीछे छिपे अपने रहस्यों को उन्होंने किसी के समक्ष प्रकट नहीं किया क्योंकि उन्हें आभास था कि वास्तविकता का ज्ञान हो जाने पर लोगों के मन में इन कार्यो को करने की भावना कम हो जाएगी।

हमारा प्राचीन भारतीय समाज नैतिक एवं भावनात्मक स्तर पर अपना जीवन व्यतीत करता था परन्तु आज हम तर्क के युग में जी रहे हैं। वर्तमान में उच्च अध्ययन का माध्यम अंग्रेजी भाषा होने के कारण आज हम पाश्चात्य सभ्यता व संस्कृति से अधिक प्रभावित हैं। इसीलिए सभी कार्यो को तर्क की कसौटी पर परखने का हमारा स्वभाव बन गया है। सभी प्रश्नो का तार्किक हल हो ही नहीं सकता। उदाहरणार्थ आपसे यदि कोई पूछे कि मीठा किसे कहते हैं तो आप उसके लिए कई उदाहरण देने का प्रयास कर सकते हैं परन्तु मीठा क्या है इस को तो सही अर्थो में जीभ ही समझ सकती हैै। ठीक इसी प्रकार कई कार्यो का औचित्य और अनौचित्य केवल अनुभव से ही जाना जा सकता है तर्क के आधार पर उसे समझना और समझाना अत्यन्त कठिन है। उदाहरण के लिए हमारे समाज में नित्य स्नान करने के उपरान्त व पूजा करने से पूर्व मस्तक पर चन्दन घिस कर तिलक लगाने का विधान है। यह सर्वविदित है कि चन्दन का गुण शीतलता प्रदान करना है। यह एक आयुर्वैदिक औषधि है। ऐसा माना जाता रहा है कि माथे पर चन्दन लगाने से मस्तिष्क  की सारी गर्मी निकल जाती है, मन को ठण्ड़क मिलती है तथा नेत्र ज्योति बढ़ती है। यदि उपर्युक्त लाभों का वर्णन कर जन साधारण को कहा जाता कि आप अपने मस्तक पर प्रतिदिन चन्दन लगाएँ तो शायद कोई न करता। एक उर्दू के शायर ने भी कहा है -                                                 
   सर दर्द की दवा तो है चन्दन का लगाना,             
    मगर चन्दन का घिसाना भी तो दर्दे सर ही तो है। 
इसीलिए हमारे प्राचीन मनीषियों ने इसे धर्म के साथ जोड़, पूजा से पहले चन्दन लगाने का विधान बना ड़ाला। धर्म में आस्था रखने वाले लोग आज भी इसका प्रयोग करते है। इसके नित्य प्रति तिलक के रूप में प्रयोग करने से हमारे हिन्दू समाज के लोगों के स्वास्थ्य पर काफी प्रभाव पड़ा। जो लोग आज भी चन्दन को अपने मस्तक से लगाते है उनकी आँखों में  नज़र का चश्मा  कम ही देखने को मिलता है। मुझे याद है कि मेरे दादाजी प्रतिदिन चन्दन लगाया करते थे और वे अट्ठासी वर्ष की अवस्था में बिना चश्में के गीता व अन्य धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया करते थे। आज अनेक तर्को द्वारा तिलक लगाने का खण्डन किया जाता है, इसे एक आडम्बर समझा जाता है। प्रतिदिन  तिलक लगाने वाले बन्धु जन भी तिलक के लिए प्रस्तावित पदार्थो की ओर ध्यान न देते हुए अपने सौन्दर्य और साज सज्जा के प्रति अधिक सजग रहते हैं। यही कारण है कि तिलक कर्म के महत्त्व को न समझकर हम नेत्र चिकित्सकों के लिए एक अच्छी आय के स्रोत बनते जा रहे हैं।

   हमारे हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा का प्रचलन है। बड़े प्राचीन काल से मूर्तिपूजा का खण्ड़न होता चला आया है। इसी के विरोध में हिन्दू धर्म में से ही दूसरे धर्म पंथ और सम्प्रदायों का जन्म हुआ और साथ ही साथ हम भी कई सम्प्रदायों में बंट गए । कालांतर में मूर्ति पूजा के विरोध में उठे धर्मावलंबी चाहे अपने धर्म प्रवर्तको की मूर्तियों को महत्त्व देने क्यों न लग पड़े हों मूर्तिपूजा का खण्ड़न आज भी जारी है। भक्तिकाल में संत कबीर न बाह्य आडम्बरों का खण्डन बड़े ही सुन्दर ढ़ंग से किया है। उन्होने अपने जीवन के अनुभवों को यथार्थ रूप अभिव्यक्त किया है इसीलिए उनकी दार्शनिक बाते आज हमारे जीवन को अत्यधिक प्रभावित करती हैं। मैंने जब उनका दोहा -
                पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़।
               ताते तो चाकी भली , पीस खाय संसार।।

पढ़ा तो मै भी इससे प्रभावित हुआ। उनकी यह बात एक अच्छे साधक के लिए है भी शत प्रतिशत सही। मुझे मूर्ति पूजा के साथ-साथ अपने धर्म के अनेक सिद्धान्तो पर अनास्था होने लगी। कालांतर में जब विश्वविद्यालय में अपने शिक्षा काल में शिक्षा सिद्धान्त पढ़ने का अवसर मिला उसको पढ़कर मैने जाना कि सीखने के क्षेत्र मे बालक मूर्त से अमूर्त की ओर जाता है। उस समय मुझे लगा कि साधना के क्षेत्र में मूर्ति की अवधारणा का कारण भी शायद यही रहा है। जिस प्रकार एक बालक जिसने सेब नहीं देखा उसको हम सेब सेब कहते रहें तो वह उसके अर्थ को नहीं समझ सकता। परन्तु यदि हम उसे  सेब या सेब की आकृति एक बार दिखा दें अथवा दिखाने के साथ उसका रसास्वादन भी करवा दें तो सेब की आकृति उसके मानस पटल में अपना स्थान बना लेगी और सेब का अमूर्त रूप  अर्थात उसके नाम से ही उसके बारे में समझने लगेगा। यही बात नवीन साधक पर भी पूर्णरूपेण चरितार्थ होती है। साधना की प्रथमावस्था में साधक के सम्मुख कोई न कोई मूर्त रूप होना अनिवार्य स्वीकार किया गया है। कालांतर में जब वह साधना के मार्ग में आगे बढ़ जाता है व उसका  ईंश्वर से मानसिक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है तो उसके लिए मूर्त रूप  की आवश्कता गौण हो जाती है।

      आज भी नगरों में न जाकर गाँवों में अथवा सदूर जंगलो अथवा पर्वत श्रृंखलाओं पर बने मंदिरों मेन जाकर देखें तो उनमें मूर्ति रूप में ऐसी पाषाण प्रतिमाएँ देखने को मिलती है जिनका कोई विशेष आकार नहीं है नास्तिक व्यक्ति के लिए तो वह एक बेडोल पत्थर ही हैं। ये पाषाण रूप  ही प्राचीन काल में मानव आस्था के प्रतीक थे कालांतर में सौंदर्य प्रेमी मानव ने अनेक प्रकार की मूर्तियों का निर्माण किया। उन मूर्तियों की आकृति प्रदान करने के पीछे भी उनका विशेष प्रयोजन रहा। उदाहरणार्थ किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पूर्व हमारी हिन्दू संस्कृति में गणेश पूजन का विधान है। यदि हम गणेश जी की मूर्ति को ध्यान लगा कर देखें तो उनकी चार भुजाओं में जो चार पदार्थ हैं वे ही हमें संकेत दे देते हैं कि कार्य सिद्धि किस प्रकार की जा सकती है। आजकल के चित्रों को देख कर कोई यह भी कह सकता है कि गणेश जी के तीन हाथों में ही पदार्थ हैं चौथा हाथ तो आशीर्वाद देने के लिए है। मैं उनसे सहमत हूँ लेकिन गणेश आरती का एक चरण है- ‘शंख चक्र गदा पदम चतुर्भुजा धारी। माथे सिंदूर सोहे मूस की सवारी ।। ’ जिससे स्पष्ट है कि उनके करों में शंख्, कमल, गदा व चक्र विराजमान हैं।

      शंख साम अथवा ध्वनि का प्रतीक है। उसे देख कर व्यक्ति को यह याद आ जाता है कि यदि हम मधुर ध्वनि या शब्दों का प्रयोग करतें हैं तो हमारे कार्य बड़ी सुगमता से हल हो सकते हैं। अपना कार्य साधने के लिए हमें कठोर वचनों का परित्याग कर देना चाहिए। उनके दूसरे हाथ में कमल सुशोभित है जो दाम या प्रलोभन का प्रतीक है। यदि प्रथम रीति से हमारा कार्य हल नही होता तो हम काम करने वाले को थोड़ा प्रलोभन दे कर अपना कार्य करवा सकते हैं। आजकल ऐसे लोभी व्यक्तियों की कोई कमी नहीं है जो बिना कुछ लिए कोई काम करते ही नहीं। इसको निम्न कुण्ड़ली से आसानी से समझा जा सकता हैः-
           भेंट सदा चढ़ती रही ,नई नहीं यह बात ।
     काज सरे न एक भी ,जाकर खाली हाथ।।             
     जाकर खाली हाथ,  बात पूछे नहीं कोय ।
     रहे चढ़ावा साथ, काज सरै आदर  होय ।
     कह प्रकाश याद रख, हों इसमें कभी न लेट ।
     ग्रह शांति न हो सके,बिन दिए शनि को भेंट।

जो  लोभी व्यक्ति बिना कुछ लिए काम करते ही नही उनसे काम निकालने का तरीका उनके हाथ में धारण किया कमल बता रहा है। यदि उपर्युक्त दोनो तरीकों से कार्य हल नही होता तो फिर किस ढ़ंग को अपनाया जाए वह ढंग उनके तीसरे हाथ में उठाया हुआ गदा संकेतित करता है। जब मधुर वचन तथा प्रलोभन दोनो ही अपने कार्य से निरत हो जाएँ तो उस समय कार्य न करने वाले व्यक्ति को भय दिखाना जरूरी है। आजकल भय डण्डे का ही नहीं होता भय दिखाने के कई और तरीके भी हैं जैसे किसी उच्चाधिकारी का टेलीफोन । ऐसी अवस्था में व्यक्ति अपनी हानि के भय से दूसरों का कार्य कर दिया करता है। उनके चौथे हाथ में चक्र है जो संकेत करता है कि यदि उपर्युक्त किसी प्रकार से कार्य न निकले तो कूटनीति से कार्य लेना चाहिए। इस प्रकार मूर्तियों के आकार के अन्दर भी कोई न कोई कूट संदेश छिपा है जो व्यक्ति उस संकेत को समझने लगता है और उस आधार पर अपना जीवन चलाता है उसका जीवन सदैव सुखमय होता है।

     अन्य राज्यों की बात न करते हुए यदि हिमाचल प्रदेश की ही बात करें तो यहाँ मन्दिरों के नाम बहुत सी भूमि है। इसको बड़े बड़े वृक्ष अपनी छाया प्रदान करते रहते है। लोग इन वृक्षों को किसी प्रकार की हानि पहुँचाने का साहस नहीं करते क्योंकि वे इसे देवता की सम्पत्ति मानते है और इस भूमि का तिनका या पत्ता तोड़ना तक पाप समझते है। वर्तमान युग में जब इधर उधर पेड़ काटे जा रहे हैं वहाँ धार्मिक आस्था के कारण मन्दिरों के नाम की भूमि में सुन्दर, ऊँचे,घने वृक्षों के वन दिखाई देते हैं।  जो आज भी प्रकृति को सुन्दर बनाने में अपनी भूमिका अदा कर रहे है। मध्य प्रदेश के खेजड़ी गाँव की कहानी सर्वविदित है जहाँ महिलाओं ने वृक्षों को बचाने के लिए अपने जीवन का बलिदान दे दिया था। यह सब हमारे  प्राचीन विचारकों की दूरदर्शिता का ही परिणाम है जिन्होने वृक्षों को लोगों की धार्मिक आस्था के साथ जोडा था ।

हमारे धार्मिक कृत्यों में पशुबलि को एक कुरीति माना गया है। मेरे विचार से जिसने भी इसका समर्थन किया होगा उसके मन में भी कोई न कोई मानव समाज के कल्याण का भाव छिपा होगा। यदि आप ध्यान से देखें तो उन ही प्राणियों की बली दी जाती रही है जिनका कार्य स्थान विशेष के आधार पर कम था । जैसे बकरा , पर्वतीय क्षेत्रों में भैंसा, मुर्गा इत्यादि। बकरी,भैंस इत्यादि की बली नही दी जाती क्योंकि वे जहाँ वंश को चलाए रखती हैं वहाँ मानव को दूध देती हैं जिससे मक्खन घी आदि कई पौष्टिक पदार्थ तैयार किए जाते हैं। मुर्गी अण्डे देती है उसकी भी बली नहीं दी जाती । गाय माँ के समान अपने दूध से परिवारों का पालन करती है इसलिए तो उसे माता का दर्जा दिया गया है तथा बैल को हल में जोतना था इस कारण उसको शिव वाहन कह कर सम्मान दिया जाता रहा है। इसी प्रकार घोड़ा और घोड़ी दोनो सवारी व सामान लादने के काम आते है उनकी बली देने के सम्बन्ध में कहीं भी स्पष्ट वर्णन नहीं मिलता। परन्तु यदि गहराई से सोचें तो यह पर्यावरण संतुलन की ओर उठाया गया एक ऐसा ही कदम था जिस प्रकार आज परिवार नियोजन। उन ही पालतू पशुओ की बली दी जाती थी जिनकी आवश्यकता नही होती थी इस प्रकार इस प्रथा का प्रचलन जहाँ एक पर्यावरण संतुलन बनाने का प्रयास था तथा उन प्राणियों के चारे इत्यादि की व्यवस्था बनी रहे जिनकी समाज में आवश्कता है। आप अनुमान लगाइए यदि सभी भैंसे जितने जन्म लेते है सभी जीवित रहते तो क्या मानव  उनके उत्पात के कारण सुखी रह सकता । हो सकता है ऐसा करना तत्कालीन माँग रही हो। यातायात के साधन कम थे। जिन स्थानों पर मानव निवास करते थे वहाँ पालतू पशुओ को चारा इत्यादि उपलब्ध करवाने की समस्या उत्पन्न होने लगी हो। इसलिए नकारा पशुओं को समाप्त करने के लिए ही इस प्रथा का धर्म में समावेष कर दिया गया हो ठीक उसी प्रकार जैसे जनसंख्या समस्या के लिए परिवार नियोजन कार्यक्रम आज के समाज में चलाया जा रहा है। आज छोटा परिवार , सुखी परिवार के मंत्र को शिक्षित समाज द्वारा मानव धर्म स्वीकार कर ही लिया गया है।

      आज भी चर्चा होती है कि महिलाएँ  बाल्यकाल से ही कुपोषण का शिकार है। हमारे समाज में माताओं द्वारा भी पुत्र की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है बालिकाओं की ओर नहीं यही कारण है कि सरकार को कई कानून पारित करने पड़े जिससे महिलाओं के स्तर में उन्नति हो सके। हमारे प्राचीन विद्वान इस बात को समझते थे। वह प्रत्यक्ष रूप से लोगों की मानसिकता में परिवर्तन लाने में अक्षम थे। उन्होने परोक्ष रूप से नवरात्रों व अन्य शुभ अवसरों पर  कन्या पूजा के विधान को  अपने धर्म में जोड़ दिया ताकि समय-समय पर बालिकाओं को पौष्टिक भोजन तथा वस्त्र मिल जाएँ व ऐसे अवसरों पर प्राप्त दक्षिणा से वह अपनी पसंद की वस्तु क्रय कर सकें।

       तर्क से बिगड़े काम आस्था और विश्वास से सुधारे जा सकते हैं। हमारे पडौस  में में एक विवाह सम्पन्न हुआ । विवाह को अभी छह मास भी व्यतीत नहीं हुए थे कि लड़की को ससुराल वाले उसके पिता के पास छोड़ गए। उनका कहना था कि आपकी कन्या का व्यवहार हमारे परिवार के अनुकूल नहीं है जिस कारण हमारे अन्य सदस्यों पर उसका विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। उधर कन्या भी उस परिवार में नहीं रहना चाहती थी। उसका तर्क था कि उस परिवार के लोग रूढ़िवादी है । हर समय कुछ न कुछ कहते रहते है, उस घर में मेरा कोई सम्मान नहीं है, मै उस घर में निर्वाह नहीं कर सकती। कन्या के पिता बहुत परेशान थे एक दिन उन्होने अपनी समस्या को हम लोगों के समक्ष रखा। मैं उन्हे अपने एक विद्वान मित्र के पास ले गया।  उन्होने उनको सलाह दी की वे अपनी पु़त्री को उनके  पास भेज दें।  जब उनकी पुत्री उनके पास गई तो उसने अपनी सारी समस्याएँ  उनको विस्तार से बताई। उन्होने उसे एक मंत्र दिया और साथ ही साथ एक चावल की पोटली दी और उसे कहा कि यदि घर का कोई व्यक्ति उसे कुछ कहता है तो क्रोध में आकर उनको कुछ न कहे। उस समय वह चावल का एक दाना मुँह में ले कर मंत्र को मन ही मन इस प्रकार बोलती रहे कि किसी को पता ही न चले देखना सारा परिवार बेटी तुम्हारी मुट्ठी में हो जाएगा। उन्होंने जिस प्रकार उसे समझाया उसे उन पर आस्था हो गई थी। वह घर गई उसने अपने माता-पिता से कहा कि वह अपनी ससुराल जाएगी। पहले तो उनको उसकी बात मेन विश्वास नहीं हुआ तो लेकिन जब उसकी बात में  दृढ़ता देखी तो उसे स्वयं उसके साथ जाकर उसे छोड़ने के लिए राजी हो गए। उन्होने उसकी ससुराल वालों को बड़ी मुश्किल से राजी किया और उसे ससुराल छोड़ दिया। उसने वहाँ जा कर मेरे मित्र द्वारा बताई गई सभी बातो का पालन किया। उससे जब कोई ऐसी बात करता जो उसको अच्छी नहीं लगती थी तो वह उसका जबाब देने के स्थान पर चुपचाप एक चावल का दाना मुँह में डाल कर चबाती और मन ही मन मंत्र बोलती। दो चार दिन बाद ही उसके परिवार के सदस्यों के व्यवहार में अन्तर आने लगा। वे इसे प्यार करने लगे। सास-ससुर उसे बेटी तुल्य समझने लगे। उनके इस व्यवहार को देख उसके मन में भी उनके प्रति आदर की भावना आ गई । इस  का परिणाम यह हुआ कि एक मास के बाद जब उसके पिता उसे लिवाने आए तो उसने  जाने से इन्कार कर दिया। उसकी समस्या मात्र यह थी कि इकलौती पुत्री होने के कारण उसे  आगे से बोलने की आदत थी। यदि उसे यह कहा जाता कि तुम जबाब देना बंद कर दे। तो शायद उसका उत्तर होता कि क्या मैं मूर्ख हूँ ,मैं गलत बोलती हूँ। परन्तु चावल और मंत्र ने उसकी आदत में सुधार ला दिया और उसका वैवाहिक जीवन सुखमय हो गया। अब आप चाहे टोटका कहें या मंत्र का जादू मेरा तो मानना है कि यह सब आस्था के कारण हुआ है। यदि उसे मेरे मित्रकी बातों पर आस्था न होती वह इसके लिए तर्क करती तो उसके जीवन में कोई अन्तर न पड़ता।

किसी भी धर्म से जुड़े सभी कृत्यों के पीछे कोई न कोई समाजोपयोगी बात जुड़ी होती है। धर्म केवल मात्र दिखावा नहीं है यह हमारे जीवन को जीने का ढ़ंग है, हमारी जीवन शैली है। उसके सभी कर्मो  के पीछे छिपे रहस्यों को अनुभव से जाना जा सकता है तर्क से नहीं। चाहे सूर्य अथवा तुलसी को जल देना हो अथवा उपवास या व्रत रखना इन सबके पीछे एक निश्चित उद्देश्य छिपा है जिसके महत्त्व को करने वाला ही भली भाँति अनुभव कर सकता है। हमें  मात्र तर्क के आधार पर किसी बात का खण्डन स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। समय स्थान व काल के अनुसार कई कार्यो का महत्त्व क्षीण हो जाया करता है इसलिए वर्तमान और आने वाले समाज के लिए उन कृत्यों का किया जाना उपयोगी नहीं रहता। इसलिए उनमें परिवर्तन की अपेक्षा रहती है। हमें बिलकुल रूढ़िवादी न बनकर उन परिवर्तनों को स्वीकार करने के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए। मेरे बाल्यकाल के समय में रेत को अशुभ माना जाता था। मुझे याद है कि एक बार मैं अपनी जेबों में नदी से रेत भर कर ले आया तो मुझे बहुत डाँट पड़ी थी। उस समय लोगों का मानना था कि नदियों के किनारे मुर्दे जलाए जाते हैं इसलिए रेत में मशान होते है परन्तु आज कोई ही घर ऐसा होगा जिसमें रेत का प्रयोग न किया गया हो।

बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार बहुत सी नई बातें समाज के लिए उपयोगी हो सकती है। यदि हमारे विद्वतजन बड़े सहज ढंग से उन्हें धर्म के साथ जोड़ते चले जाएँ तो उन पर आचरण कर आने वाले समाज का बहुत कल्याण हो सकता है।

(ओम प्रकाश शर्मा )
एक ओंकार निवास, सम्मुख आँगरा निवास,                                    छोटा शिमला,-171002

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  1. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 29/09/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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