शनिवार, 27 सितंबर 2014

सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - घाघ की कहावतें किसानों का आईना

घाघ की कहावतें किसानों का आईना
- ज्योतिष शास्त्र का आधार -
    कृषि के क्षेत्र में हम लगातार किसी न किसी कठिनाई का सामना करते आ रहे हैं। कभी अनियमित मानसून तो कभी भारी बारिश ने कृषकों को बेहाल किया है। कभी सूखे की स्थिति ने ऋण-बोझ को और बढ़ाया तो कभी बीज की गुणवत्ता ने किसानों पर च्च्दुबले पर दो आषाढ़ज्ज् वाली कहावत को चरितार्थ कर दिखाया। इक्कीसवीं सदी वाले इस वैज्ञानिक युग में यदि हम तकनीकी जानकारी के अभाव में कृषि के कष्टों को दूर नहीं पा रहे हैं तो कहीं न कहीं हमारे सिस्टम में ही दोष माना जा सकता है। इन सारी अव्यवस्थाओं के बीच मुझे आज अठारवीं शताब्दी में जन्में कवि घाघ की याद आ रही है। हमारे बड़े बुजुगर्ोें से घाघ-भड्डरी की कहावतों की चर्चा सुनकर मुझे उन्हें जानने की उत्सुकता हुई और मैंने कुछ पुराने ग्रंथों का अध्ययन किया। उन ग्रंथों में जहां महाकवि घाघ के जन्म को लेकर स्पष्ट तिथि का अभाव है वहीं उनकी कहावतों की सच्चाई उनके पांडित्य का बखान करती प्रतीत हो रही हैं -
                खाद पड़े तो खेत, नही तो कूड़ा रेत,
                गोबर राखी पाती सड़ै, फिर खेती में दाना पड़ै।
                सन के डंठल खेत छिटावै, तिनते लाभ चौगुनों पावै,
                गोबर, मैला, नीम की खली, या से खेती दूनी फली।।
                वही किसानों में है पूरा, जो छोड़ै हड्डी का चूरा ।।
    आज हमारे किसान  जिस हड्डी चूरा का उपयोग खेतों में खाद के रूप में कर रहे हैं उसे महाकवि घाघ ने तीन सौ साल पूर्व ही उपयोगी बता दिया था। खेती-किसानी के संबंध में कौन सी फसल कब बोई जाये और बीजों की दूरी कितनी हो इसे भी एक कृषि वैज्ञानिक के पूर्व घाघ ने अनुमानित कर अपने ज्ञान की पहचान करा दी थी। महाकवि घाघ ने फसलों को बोने का उचित समय बताते हुए बीजों की मात्रा का भी उल्लेख किया है। अपने अध्ययन के बाद उन्होंने किसानों को प्रति बीघा जमीन पर पांच पसेरी गेहूँ तथा जौ, छह पसेरी मटर, तीन पसेरी चना, दो सेर मेथी तथा अरहर, डेढ़ पसेर कपास, बाजरा बजरी, सावां-कोदो और अंजुली भर सरसो बोकर किसान दूना लाभ कमा सकते हैं। इतना ही नहीं बोवाई करते समय भारत वर्ष के उस महान कवि ने बीजों की दूरी को भी स्पष्ट रूप से उल्ल्ेाखित किया है। उदाहरण के रूप  में सन की बुआई को काफी घना- घना करने की बात बतायी है। तो ज्वार की बोआई  मेंढक की छलांग वाली दूरी पर करने की हिदायत भी दी है। किसानों को अपने पग-पग की दूरी पर बाजरा और कपास बोना चाहिए , हिरण की छलांग पर ककड़ी और पास-पास ऊख को बोने का निर्देश दिया है।  
    किसानों सहित जन-सामान्य के  जीवन को बहुमूल्य मानते हुए घाघ - भड्डरी  ने अकाल और सुकाल पर भी खरी उतरने वाली कहावतों की रचना कर किसानों को बड़ा लाभ पहुंचाया है। कहते हैं बिहार और उत्तर प्रदेश में घाघ -भड्डरी   की कहावतों पर बड़ा विश्वास करते हैं।  ज्योतिष शास्त्र की गणनाओ में अति- महत्वपूर्ण नक्षत्रों का गहन अध्ययन करने वाले घाघ-भड्डरी   ने सुकाल का स्पस्ट संकेत किसानों के लिए दिया है-
                सर्व तपै जो रोहिणी, सर्व तपै जो  मूर (मूल नक्षत्र)
                पीरिवा (एकम)तपै जो जेठ की, उपजैं सातों तूर।।
    अर्थात यदि रोहिणी नक्षत्र  में खूब गरमी पड़े और मूर (मूल)नक्षत्र भी खूब तपन पैदा करे साथ ही जेठ की प्रतिपदा भी खूब गरम होवे तो सातों प्रकार के अन्न भरपुर मात्रा में पैदा होंगें, ऐसा मानना चाहिए। इसी तरह बरसात को लेकर भी बड़ी सटिक भविष्यवाणी कहावत के रूप में की गई है, जिसकी सच्चाई स्वयं मैने इस वर्ष के मानसून में परखी है और सच्चाई से रूबरू होने के बाद इस आलेख को लिखना उचित समझा। बारिश के संबंध में दी गयी उक्त कहावत इस प्रकार है-
                शुक्रवार की बादरी, रही सनीचरी छाय।
                तो यों भाखै भड्डरी , बिन बरसे न जाए।।
    अर्थात यदि शुक्र वार के दिन बादल घटाटोप छाये हों और वे शनिवार तक बने रहें तो भड्डरी   के अनुसार ऐसे  बादल बिन बरसे नहीं जाते हैं। जमीन को जोतने और बोने के संबंध में भी किसान घाघ-भड्डरी   को बड़ा वैज्ञानिक मान अच्छी फसल प्राप्त कर सकते हैं। हिन्दी मास और नक्षत्रों के आधार पर उनका कहना है कि :-
                भादों की छठ चांदनी, जो अनुराधा होय।

        उबड़-खाबड़ बोए दे, अन्न घनेरा होय।।
    घाघ- भड्डरी  का मानना है कि यदि भादों सुदी छठ को अनुराधा नक्षत्र पड़े अर्थात चांदनी रात का अनुराधा नक्षत्र होने पर किसान अपनी उबड़-  खाबड़ जमीन पर भी बीज बो देवे तो  अन्न  की भरपूर पैदावार प्राप्त हाती है।
    उपलब्ध कहावतों पर पूर्णतः विश्वास किया जावे तो इतना तो अवश्य माना जा सकता है कि घाघ ने भारतीय कृषि को व्यवहारिक दृष्टि प्रदान की है। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का ज्ञान भी हमें उनकी कहावतों की प्रमाणिकता से प्राप्त हो रहा है। यदि आज तीन सौ सालों के बाद किसान उनकी कहावतों का अनुशरण  कर रहे हैं तो यह उनकी नेतृत्व क्षमता को भी प्रमाणित करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी उनकी कहावतें सारगर्भित कही जा सकती हैं। यही कारण है कि घाघ और भड्डरी दैवी प्रतिभा मान लिये गए हैं। उन्होंने अपनी कहावतों में अकाल का दृश्य भी दर्शाया हैः-    
                सावन शुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात।
                बरसै तो झूरा परै, नाही समौ सुकाल।।
            कहने का तात्पर्य यह है  कि यदि श्रावण सुदी सप्तमी तिथि को आधीरात के समय बादल गरजे और पानी भी बरसे तो यह निश्चित है कि सूखा ही पड़ेगा। यदि इसके विपरीत बादल बिन बरसे चले जायें तो किसानों के लिए अच्छा समय होगा। इसी तरह आगे पुनः नक्षत्रों पर आधारित भविष्यवाणी किसानों को दिशा निर्देशित करती प्रतीत होती हैः-
                असुनी नलिया अन्त बिनासै।
                गली रेवती जल को नासै।।
                भरनी नासै, तृनौ सहूतो ।
                कृतिका बरसै अन्त बहुतो।।
            बड़े ही गहन अध्ययन के बाद क हा गया है कि यदि चैत्र  मास में अश्विनी नक्षत्र बरसे तो वर्षा ऋतु के अन्त  में सूखा पड़ेगा। यदि रेवती नक्षत्र बरसे तो वर्षा नाम मात्र की होगी। यदि भरणी नक्षत्र बरसे तो घास भी  सूख जायेगी और कृतिका नक्षत्र बरसे तो अच्छी वर्षा होगी। कौन सी फसल किस फूल के अधिक फूलने से अच्छी होती है इस पर भी घाघ- भड्डरी की नजरें दौड़ी दिखाई पड़ती है वे कहते हैंः-
                आँक से कोदो, नीम जवा। गाड़र गेहूं- बेर चना।।
            यदि आँक अथवा मदार  का फूल अपने पेड़ पर खूब मात्रा में घनेरा फू लता है तो इस बात का संकेत है कि उस बरस कोदो की फसल अच्छी होगी। इसी तरह यदि नीम के पेड़ में खूब फूल और फल लगते हैं तो जौ की फसल अच्छी हाती है और यदि गाडर घास (खस)बहुतायत में निकल आती है तो निश्चित रूप से गेहूं, बेर और चने की फसल हो कर  किसान को लाभान्वित करती है।
            जिस युग मे घाघ-भट्टरी की जन्म का अनुमान लगाया जाता है (1753) उस जमाने मे न ही रेड़ियो का जन्म हुआ था न ही टी.वी. को हम देख पा रहे थे और न ही मौसम विभाग की वैज्ञानिक गणनाएँ किसानो के लिए उपलब्ध थी उस समय घाघ-भट्टरी की कहावतें ही कृषि का उत्तम आधार थीं । जिसे आज भी प्रमाण स्वरूप स्वीकार किया जा रहा है ।
मौलिकता प्रमाणीकरण

    मैं डॉ. सूर्यकांत मिश्रा प्रमाणित करता हूं कि च्च्घाघ की कहावतें किसानों का आईनाज्ज् मेरी अपनी रचना है। इस आलेख का प्रकाशन अभी तक किसी समाचार पत्र/पत्रिका में नहीं कराया गया है। आपकी लब्ध प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशन हेतु सादर प्रेषित है। कृपया यथायोग्य स्थान प्रदान करने का कष्ट करें।   
                                           प्रस्तुतकर्ता
                                       (डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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  1. घाघ की कहावतें मुझे भी बहुत अच्छी और सटीक लगती हैं। .उस समय जब मौसम सम्बन्धी जानकारी किसी को मालूम नहीं थी तब घाघ निश्चित ही किसी वैज्ञानिक से कम नहीं रहे होंगे। .
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति हेतु धन्यवाद

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