रविवार, 7 सितंबर 2014

सुधा गोयल की कहानी - लिफ़्ट

लिफ्ट

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सुधा गोयल

उसका नाम सत्यनाथ था. पश्चिम बंगाल के एक बहुत ही छोटे से गाँव में उसका पुश्तैनी घर था. पिता नारियल और खजूर की खेती करके परिवार का भरण पोषण करते थे। परन्तु  भर-पेट खाना पूरे घर को नसीब न था।  सत्यनाथ अपनी बीबी व् इकलौते बेटे से बहुत प्यार करता था और चाहता था कि उन्हें भर-पेट भोजन के साथ अच्छे कपडे और ऊँची शिक्षा भी नसीब करा सके. पिता चाहते थे पूरा परिवार साथ रहे, चाहे रूखी-सूखी खाये, दुख-तकलीफ आये तो किसी तीसरे का मुँह जोहना न पड़े. लेकिन सत्यनाथ की दलील थी कि बाप पुराने जमाने की बात करता है, दुनिया देखनी है, कुछ बनना है तो घर से बाहर पैर रखना ही होगा।

सत्यनाथ ने एक बिल्डर की कम्पनी में काम पकड लिया जो गाँव-गाँव से मजदूर इकट्ठा करके देश के बड़े शहरों मे भेजा करती थी।  साल में दो बार उन्हें घर जाने की छुट्टी भी मिलती और पगार के इक्ट्ठा किये हुये ढेर सारे पैसे।  मजदूरों के रहने खाने का जिम्मा भी ठेकेदार पर था। पिता ने लाख मना किया, फ़िर जब घर में पैसा आने लगा, बच्चा स्कूल जाने लगा, और अंग्रेजी दवाई भी मिलने लगी तो बाप को बेटे पर गर्व हो आया। सत्यनाथ जब घर आता तो शहरी जिन्दगी के किस्से बढा-चढ़ाकर सुनाता। वह बताता कि शहर में पानी अपने आप चलकर घर-घर जाता है, और जिस रास्ते से जाता है उसे पाइप कहते हैं।  औरतों को पोखर से सर पर नहीँ ढोना पड़ता। वह बताता कि शहर में एक बटन दबाते ही सारा घर रौशनी से भर जाता है, और वहाँ पाखाना जाने के लिये एक किलोमीटर नहीं  चलना पडता। एक बार  सत्यनाथ ने ताश के पत्तों को एक के ऊपर एक सजा कर ऊचा सा घर बनाया और बताने लगा कि शहर में कैसे एक के ऊपर एक पाँच-छः तल्ला घर होते हैं और ऊपर जाने के लिये सीढ़ी तो होती ही है साथ ही एक छोटा सा कमरा होता है, जिसमें घुस कर दरवाज़ा बन्द कर लो और बटन दबा दो तो  वह कमरा सीधे पाँच-छः तल्ला पहुँचा देता है, और उसे लिफ्ट कहते हैं।  सत्यनाथ ने यह भी बताया कि इस बार उसका काम लिफ्ट में लगेगा। यह लिफ्ट सबसे अलग होगी।  शीशे वाली…… . छोटे से कमरे में एक दीवार शीशे की होगी, ऊपर जाते समय नीचे तक सब कुछ दिखाई देगा।  

घर के सारे लोग उसकी बातें आँखें फ़ाड़-फाड़कर सुनते। सत्यनाथ का बेटा सोचता कि उसका बाप अवश्य किसी मायानगरी में काम करता है और जब वह थोड़ा सा बड़ा हो जायेगा तो माँ को लेकर घूमने जायेगा। सत्यनाथ ने बेटे से वादा किया कि वह सबको लिफ्ट से छः तल्ले बिल्डिंग की सैर जरूर करायेगा।

इस बार सत्यनाथ की विदाई हर्षौल्लास से भरी थी।  सभी के लिए वह हीरो था।

हर बार की तरह जैसे-जैसे रेलगाड़ी रफ़्तार पकड़ती और उसका गाँव दूर होता जाता,  सत्यनाथ उदास हो जाता। गाँव में रहता तो रात-दिन बकबक करने, हँसने - हँसाने वाला व्यक्ति एकदम से शान्त- गम्भीर हो जाता और अगली बार उसे  घर क्या-क्या लेकर जाना है, मन ही मन लिस्ट तैयार करने लगता।

“सत्तू  ……………”  मालिक की आवाज से उसकी तन्द्रा टूटी।  हजारों किलोमीटर का सफ़र तय करके गाड़ी दिल्ली पहुंच चुकी थी। सारे मजदूर उतारे जा चुके थे,  सत्यनाथ नहीं  दिखा तब मालिक ने जोर की आवाज लगाई थी।  जब काम नई जगह शुरू होता तब सत्यनाथ का मालिक स्वयं मज़दूरों को ‘साइट’ पर  पहुँचाया करता था, रहने खाने की व्यवस्था और सुरक्षा से लेकर दुनियादारी की सभी बातें कंठस्थ कराने के बाद ही शहर छोड़ता। हँसता खेलता परिवार और  देवता सरीखा मालिक पाकर सत्यनाथ स्वयं को दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान समझने लगा था। उसे क्या पता था कि नियति उसके साथ इतना क्रूर मजाक करेगी।

काम जोर- शोर से चल रहा था।   सत्यनाथ  ने घर एक पत्र भेजा।

माँ बाऊजी ,

हम यहाँ ठीक हैं।  आप लोगन की बहुत याद आती है। दुर्गा पूजा में हम घर जरूर आऊंगा।  लिफ्ट का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है।  मालिक ने कहा है , काम पूरा होने के बाद ही छुट्टी  मिलेगी।  अर्जेंट काम है न।  हम लोग

रात में भी देर तलक काम करते हैं।  शिवा को  देखे बहुत दिन हो गये हैं।  उसकी माँ से कहना हम दुर्गा पूजा में आएंगे और लाल पाड़ वाली साड़ी भी लाएंगे।  बहुत पीछे पड़ी थी इस बार। आप लोग की दवा भी खरीद लिये हैं।  

चरण -स्पर्श

आपका

सत्तू

इंटरनेट और ई-मेल के जमाने में पोस्ट-कार्ड यदि गंतव्य तक पहुंचता भी है तो महीनों बाद। सत्यनाथ की चिट्ठी पहुँचने से पहले उसका एक साथी उसके गांव उसके बाप को लेने पहुँच गया। घर में रोना-पीटना मच गया।

‘’बाऊजी आपको हमारे साथ दिल्ली चलना होगा, भाभी आप भी चलें, आखिरी बार दर्शन कर लें … पुलिस भइया के बॉडी शिनाख्त करायेगी, घर वाले पहचानेंगे तब ही किरिया करम हो सकेगा। पुलिस केस हो गया है बाऊजी इसलिए कोई अस्पताल में भर्ती भी नहीं ले रहे थे। वो हम लोगन रिश्वत की भारी रकम दिये तो भर्ती लिया। लिफट ने जान ले लिया भइया की। वो शीशे वाला कमरा का फिटिंग चल रहा था। रात गहरा गई थी।  दो रात से भइया सोये नही था। काम-काम का भूत चढ़ा था। चक्कर आया कि आँख झपकी नहीं कह सकता हूँ।  एकदम ऊपर से लिफट वाले गड्ढा में गिर गये। मालिक को भी खबर किया हूँ। ’’

बाऊजी रोये, चिल्लाये, कोसे लेकिन जा न सके।  घुटने का दर्द अपाहिज बना रहा था। मोतियाबिंद के चलते ठीक से दिखता भी न था। सत्तू की बीबी बिलखती रह ग़ई। उसने गाँव की हद न पार की थी न पार कर पाई।

समय किसके लिये रुका है जो रुकेगा. घर में आई सुख की क्षीण सी किरण सत्तू के अवसान के साथ विदा हो गई. फिर वही आधा पेट खाना और फटेहाली।

एक साल बाद सत्तू का साथी देबो घर आया तो उसने बताया, कि लिफ्ट समय से बनकर तैयार हो गई थी. मालिक जब आये तो काम की तरक्की से बहुत खुश हुए. सत्यनाथ के बारे में जब बताया गया तो एक नेक, ईमानदार, मेहनती कारीगर खोने का उन्हेँ बहुत अफ़सोस हुआ फिर बोले इस तरह के कामों में ऐसा हो जाता है. आगे से सावधानी बरतने की सलाह दी फ़िर यह भी कहा, बड़ी -बड़ी बिल्डिंग में एक-आध आदमी की आहुति शुभ होती है. फिर लिफ्ट का नया काम था हमारे लिये और उनके लिये भी. मन छोटा नहीं करना चाहिये।  मालिक ने सत्तू के परिवार का पूरा जिम्मा भी लेने की बात कही. देबो ने बाऊजी से पूछा,

“ कितना हर्जाना भेजा मालिक ने?”

“अभी तक तो नहीं मिला है. मजदूर की किस्मत में यही लिखा होता है बेटा …………

किसी ऐसी लिफट का इंतजार है जो मजदूर की किस्मत को छः तल्ला पहुंचा सके.”

बाऊजी निर्विकार भाव से अपना हुक्का गुड़गुड़ाने लगे, जैसे कुछ हुआ ही न था।  

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सुधा गोयल “नवीन”

3533 सतमला , विजया हेरिटेज

कदमा , जमशेदपुर --  831005

 

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