शनिवार, 27 सितंबर 2014

हनुमान मुक्त का व्यंग्य - पेट में दर्द

पेट में दर्द
तहसीलदार जी यथास्थान बैठे थे। मुझे देखा तो पूछा - ‘क्यों नोनसेंस, इस समय यहां कैसे आया?
मैंने कहा, ‘तहसीलदार जी, मैं तो वैसे ही घूमने आ गया था लेकिन यहां ऑफिस-टाइम के बाद इतनी चहल-पहल देखी तो अंदर घुस आया।’
‘क्यों चहल-पहल होने पर पाबंदी है क्या?’


‘नहीं, पाबंदी कैसी? ऑफिस तो ऑफिसर पर डिपेन्ड होता है। जहां खड़े हो जाए वहीं ऑफिस शुरु हो जाता है।’
‘यही तो मैं कह रहा हूँ। लोग-बाग परेशान ज्यादा हैं, काम इतना है कि ऑफिस टाइम में पूरा होता ही नहीं, फिर लोगों की सहूलियत के लिए ऑफिस टाइम बाद काम करना ही पड़ता है।’
इतनी ही देर में कॉमनसेंस कहीं से वहां आ टपके, उसको देखते ही तहसीलदार जी की बांछे खिल गईं। बोले, ‘कॉमनसेंस, यह नॉनसेंस आज कुछ ज्यादा ही बक-बक कर रहा है, जरा इसको संभालना।’
कॉमनसेंस ने इधर-उधर देखा, सारे कार्मिक अपने-अपने स्थान पर बैठकर काम कर रहे थे। तहसील में रजिस्ट्री कराने वाले लोगों का हुजूम था। सारा हुजूम एक ओर एक कोने में इकट्ठा था। उसने नॉनसेंस से कहा, ‘नॉनसेंस, आज तहसील में कैसे आया?’ नॉनसेंस के पास वही पहले वाला जवाब था, ‘घूमने! मैं शाम को खाना खाकर कहीं भी घूमने निकल जाता हूँ। आज यहां आ गया।’
‘ठीक है। घूम लिया, अब तो घर जाओ। इन्हें काम करने दो।’


‘मैं कौनसा इन्हें काम करने से रोक रहा हूँ। खूब काम करो। नॉनसेंस बोला।’


तहसीलदार जी सहित कोने में खड़ा हुआ हुजूम नॉनसेंस के खड़े रहने मात्र से अपना काम नहीं कर पा रहे थे। कॉमनसेंस इस बात को अच्छी तरह समझ रहा था, उसने एक व्यक्ति को इशारा किया। वह व्यक्ति इशारों की भाषा पढ़ने में दक्ष था। तुरन्त समझ गया। नॉनसेंस के पास जाकर बोला, ‘भैया, मेरे पेट में बहुत तेजी से दर्द हो रहा है। मुझे किसी डॉक्टर के पास ले चलो।’
नॉनसेंस उसकी बात सुनकर अचकचा गया। उसके समझ में नहीं आ रहा था कि उसे क्या जवाब दे। उसके चेहरे पर उसने ऐसा क्या देखा कि वह व्यक्ति सारे हुजूम को छोड़कर उससे डॉक्टर के पास ले जाने की गुहार कर रहा है।
नॉनसेंस में कॉमनसेंस नहीं था। वह दुनियादारी नहीं जानता था। उसे कौन बेवकूफ बना रहा है उसे नहीं पता लेकिन उसमें संवेदना थी। वह उस व्यक्ति को लेकर तुरन्त डॉक्टर के पास चल दिया।
रास्ते में नॉनसेंस ने उससे पूछा, ‘भैया, तुम्हारे पेट में इतना तेज दर्द क्यों हो रहा है?’


वह बोला, ‘तुम्हें देखकर।’
‘मतलब’


‘मतलब कुछ नहीं। वैसे ही। अभी शाम को खाना खाकर चला था। पता नहीं जाने क्या हुआ कि पेट में दर्द शुरु हो गया।’
वे डॉक्टर के पास पहुंच गए। डॉक्टर नॉनसेंस के साथ आए व्यक्ति को अच्छी तरह पहचानता था। उसे देखते ही बोला, ‘अरे! खान साहब। आप?  कैसे आना हुआ? क्या आज फिर पेट में दर्द शुरु हो गया?’
खान साहब ने चुप्पी साध ली। डॉक्टर के पास बैठते हुए बोला, ‘भला हो इनका। मुझे आपके पास लेकर आए हैं। मैं तो तहसील में खड़ा था। अचानक इनको देखकर तेजी से पेट में दर्द हो उठा।’
डॉक्टर सारा माजरा समझ गया। नॉनसेंस की ओर मुखातिब होकर बोले, ‘आप बैठो। मैं अभी इनके ड्रिप चढ़ाता हूँ। एक घंटे में आराम मिल जाएगा।’ डॉक्टर ने अपना काम करना शुरु कर दिया। नॉनसेंस पूरे सेवा भाव से उस पेसेन्ट के अटेन्डेन्ट का काम कर रहा था


उधर तहसील में नॉनसेंस के जाते ही काम में तेजी आ गई। दस बीघा जमीन के बीचों-बीच रास्ता दिखाकर भूखण्डों को असिंचित भूमि दिखाते हुए करोड़ों की जमीन के विक्रय के कागजात क्रेताओं ने कुछेक लाखों में दिखा दिए। सभी काम के एक्सपर्ट बैठे थे। क्रेता को लाखों रुपयों का फायदा हो रहा था। नम्बर दो की रकम नम्बर एक में हो रही थी।
तहसीलदार से लेकर, स्टाम्प विक्रेता, पटवारी, रजिस्ट्री बाबू, वकील सहित अन्य सभी कार्मिक तेजी से अपने काम में लगे हुए थे।


ऑफिस समय में होने वाली वास्तविक कीमत की साधारण रजिस्ट्री पर इनको दो फीसदी मिलता था। यह टाइम बाउण्ड काम था। आज ही काम होने पर इस पर मिलने वाला मेहनताना भी पहले से बाउण्ड था। मुश्किल से डेढ़ घंटे में सारा काम हो गया। कॉमनसेंस ने खान साहब को फोन कर दिया। फोन आते ही उनके पेट का दर्द गायब हो गया। वे नॉनसेंस से बोले, ‘अब मैं पूरी तरह ठीक हूँ। पेट दर्द खत्म हो गया है। तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद। तुम अगर तहसील चलना चाहो तो चलो वरना मैं तो जा रहा हूँ।’ यह कहते हुए खान तेजी से तहसील की ओर रवाना हो गया। नॉनसेंस उसको जाता हुआ पीछे से देखता रह गया।

डॉक्टर के चेहरे पर नॉनसेंस को देखकर मुस्कान आ गई।

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