बुधवार, 17 सितंबर 2014

अशोक गुजराती की दो लघुकथाएँ - शहादत तथा असहयोग

॥लघुकथा॥

image

शहादत

 

पुलिस ने उस पर अदालत में फ़ौजदारी नालिश दायर की थी. उसने पिछले तीन महीनों के दरम्‍यान दस क़त्‍ल अंजाम दिये थे. उसे कड़ी से कड़ी सज़ा मृत्‍युदंड या आजीवन कारावास के सिवा क्‍या हो सकती थी..

वह एक आम भला आदमी था- शिक्षक. जी हां, उसने अपने जीवन में कभी एक मक्‍खी भी नहीं मारी थी. फिर अचानक क्‍या हुआ कि वह खून पर खून करता गया...

वह अनवरत देखता रहा कि बड़े से बड़ा गुनहगार या तो निर्दोष छूट जाता है अथवा फिर उसे नाम मात्र का दण्‍ड मिलता है. हत्‍या और बलात्‍कार ज्‍यों लोगों के लिए खेल हो गये हैं. नाबालिग़ तो नृशंस बलात्‍कार- वह भी छोटी-छोटी बच्‍चियों के साथ मज़े से कर गुज़रते हैं- बेखौफ और उनके लिए क़ानून में सिर्फ़ तीन साल की ताज़ीर तय की गयी है ताकि वे बाहर आकर आगामी ज़िन्‍दगी में माह भर की बच्‍ची से लेकर साठ वर्ष की औरत का यौन-शोषण आराम के साथ कर सके.

उसे बहुत ग़ुस्‍सा आता रहा. उसने इस-उससे मालूम कर पिस्‍तौल का बन्‍दोबस्‍त किया. और जेल से या कोर्ट ले जाती पुलिस की गिरफ़्‍त से फ़रार होने वाले, पैरोल पर छूट कर आये या कम सज़ा पाकर आज़ाद घूम रहे सारे खतरनाक मुज़रिमों की टोह में वह रहने लगा. मौक़ा मिलते ही वह उनका काम तमाम करता रहा.

वह जानता था कि वह जल्‍द ही पकड़ लिया जायेगा, वह कोई शातिर अपराधी तो था नहीं. लेकिन तब तक जितने ज़्‍यादा से ज़्‍यादा समाज के दुश्‍मनों को वह- जो हमारा क़ानून नहीं दे सकता -ऐसी सज़ा, खुद तजवीज़ करेगा. उसे फांसी होगी तो क्‍या, वह इस युद्ध में मुट्‌ठी-भर ही सही, क़ातिलों और बलात्‍कारियों को उससे पूर्व फांसी दे चुका होगा.

000

 

 

असहयोग

 

वह रोचक का बचपन का दोस्‍त था. उन्‍होंने दसवीं साथ ही साथ पास की थी. बाद में रोचक पढ़ने के लिए नज़दीक के शहर चला आया था और कालांतर में वहीं नौकरी में लग गया था.

जब रोचक की सेवा-निवृत्‍ति क़रीब थी, वह एक दिन रोचक से मिलने आया. ऐसा नहीं कि इससे पूर्व वे मिलते नहीं रहे थे. कभी-कभार किसी विश्‍ोष अवसर के बहाने उनकी मुलाक़ात होती रहती थी. इस बार वह अपने संग एक युवक को लेकर आया था.

बातचीत के दौरान उसने बताया कि वह युवक अपना कालेज शुरू करने जा रहा है, उसी कस्‍बे में जहां वह स्‍वयं रहता है. अभी शुरुआती काग़ज़ी कार्रवाई चल रही है. वह चाहता था कि महीने-दो महीने पश्‍चात रोचक की निवृत्‍ति होने पर वह उसके कालेज का प्राचार्य बने. रोचक का प्राध्‍यापन का पैंतीस साला अनुभव और पी-एच.डी. इसमें कारगर सिद्ध होंगे. तनख्‍़वाह तो वह ज़्‍यादा नहीं दे पायेगा लेकिन पांच हज़ार प्रतिमाह दे ही देगा. रोचक को लगा- मैं सेवा-निवृत्‍ति के उपरान्‍त यह काम करूं और जैसा कि वह कह रहा है, सप्‍ताह में दो-तीन दिन मेरे शहर से आध-पौन घण्‍टे के फ़ासले पर उस कस्‍बे में जाकर उसका कालेज सम्‍भाल लूं तो क्‍या हर्ज़ है...?

यह सब तो क्षणिक लालच के तहत था पर इससे रोचक का आगे सोचा हुआ प्‍लान डगमगा रहा था. उसने सोच रखा था कि रिटायर होने पर बेटे के पास दिल्‍ली चला जायेगा और वहीं रहकर अपने छिट-पुट लेखन कार्य को गति देगा. उसने उन दोनों को साफ़-साफ़ अपनी भविष्‍य की लगभग तयशुदा योजना के विषय में विस्‍तार से बताया और माफ़ी मांग ली.

वे पुनः आये. कहने लगे कि जल्‍द ही कालेज के निरीक्षण हेतु यूनिवर्सिटी की जांच समिति आने वाली है. यदि रोचक उस वक़्‍त वहां हाज़िर रहे और कालेज हेतु आवश्‍यक संसाधनों तथा विद्यार्थियों की नियमित उपस्‍थिति- जिसका पूरा ख्‍़ााका उन्‍होंने पेपर पर तैयार कर रखा था- की प्रामाणिकता का हवाला देते हुए प्राचार्य के तौर पर उस कमेटी को संतुष्‍ट कर दे तो कालेज को मान्‍यता मिल जायेगी. वह युवक अब रोचक को दस हज़ार मासिक देने को भी राज़ी था. रोचक ना-नुकुर करे इससे पहले उसने जेब से अनुबंध-पत्र निकाला, जिसके अनुसार रोचक ने निर्धारित वेतन पर उस कालेज के कार्यकारी प्राचार्य का पद वर्तमान सत्र के प्रारंभ से अंत तक स्‍वीकारा था. रोचक ने स्‍पष्‍टतः उस अनुबंध पर हस्‍ताक्षर करने से इन्‍कार करते हुए उन्‍हें जतला दिया कि वह नौकरी खत्‍म होने पर अपने बेटे के यहां जाने को तत्‍पर है. उसका दोस्‍त पुराने सम्‍बन्‍धों का वास्‍ता देते हुए उसके पीछे पड़ा रहा कि वह कम से कम एक दिन के लिए आकर और निरीक्षण समिति के प्रत्‍यक्ष उपस्‍थित होकर तमाम औपचारिकताएं निभा दे तो कालेज को निश्‍चित ही मान्‍यता मिल जायेगी. अंततः रोचक ने ‘देखा जायेगा, मगर मेरे भरोसे मत रहना..' कहकर उन्‍हें विदा किया.

और रोचक अपना मकान बेचकर एवं सामान-असबाब लेकर बेटे के घर दिल्‍ली आ गया. पहुंचा ही था और अपने-आपको व्‍यवस्‍थित कर ही रहा था कि उसी दोस्‍त का फ़ोन आया. उसने कह दिया- मैं नहीं आ सकता. दोस्‍त ने इसरार किया कि वह दिल्‍ली से नागपुर प्‍लेन से आये तो वे वहां से कार में उसे लेकर जायेंगे और एक दिन में निरीक्षण का कार्य समाप्‍त होते ही लौटने की व्‍यवस्‍था भी कर देंगे. रोचक ने दो टूक अपनी असमर्थता ज़ाहिर कर दी. सोचता रहा. उसका फ़ोन बारहा बजता रहा लेकिन उसने नहीं उठाया तो नहीं ही उठाया...

000

 

प्रा. डा. अशोक गुजराती,

बी-40, एफ़-1, दिलशाद कालोनी,

दिल्‍ली- 110 095.

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------