बुधवार, 24 सितंबर 2014

अमित कुमार सिंह का आलेख - लव, जेहाद और हिंदुत्व

लव, जेहाद और हिंदुत्व

डॉ अमित कुमार सिंह,आर.एस.एम(पी.जी) कालेज,धामपुर

भारत एक अति-प्राचीन आध्यात्मिक भूमि है.सत्य की खोज का यह अनूठा प्रयोगशाला रहा है और आज भी है.हिंदुत्व इसकी जीवन शैली है.इस आध्यात्मिक धरोहर पर लगातार हमले भी होते रहे हैं.यह हमला अंदर और बाहर दोनों ओर से हुआ है.बाहरी हमले से हिंदुत्व का रंग-रूप और भी निखरा है.परंतु राजनीति में इसके घालमेल ने सदैव हिंदुत्व के आत्मा को हिंदुवाद का चोला पहनाने का प्रयास किया है.यह चोला अनुदार,अक्रामक और असहिष्णु होता है.लव जेहाद का विवादित मसला इसका ताजातरीन उदाहरण है.

लव जिहाद का मसला भी एक राजनीतिक प्लेटफार्म से उठा है.ऐसा नहीं है कि समाज ने इस मुद्दे को वरीयता दी है.हिन्दू और मुसलमान - दोनों ही समुदाय यह जानते हैं कि आंतरिक बुराइयां उनकी सबसे बड़ी दुश्मन हैं.लेकिन समाजिक विवेक पर राजनीतिक तिकड़म हावी होता दिखाई दे रहा है.

लव जिहाद एक विरोधाभासी अवधारणा है.हिन्दू परंपरा में कृष्ण,कबीर ,नानक, मीरा और चैतन्य ने प्रेम को अत्यधिक मूल्य दिया है.दूसरी ओर,जिहाद एक इस्लामिक अवधारणा है.इसका प्रयोग धार्मिक युद्ध के संदर्भ में किया जाता है.लवजेहाद का नारा उछालने का मुख्य कारण वोट –बैंक के लिये उस सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाना है जिसे हम गंगा-जमुनी तहजीब कहते हैं,अन्यथा ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं जब एक हिंदू ने मुस्लिम से विवाह किया हो.मसलन-सुनील दत्त-नरगिस,रितीक रोशन-सुजैन खान,किशन चंदर-सलमा सिद्द्की,अजीत आगरकर-फतिमा धान्दिली,सचिन पायलट-सारा अब्दुल्ला,मनोज वाजपेयी-शबानारजा,पंकज कपूर्-नीलिमा अजीज,किशोर कुमार-मधुबाला,विष्णु भागवत-नीलोफर,के.एन सहगल-जोहरा खान,विक्रम मेहता-तसनीम,पंकज उधास-फरीदा,रविशंकर-रोशन आरा,सीताराम येचुरी-सीमा चिश्ती,आदित्य पंचोली-जरीना बहाव जैसे सैकडों उदहरण हैं.लेकिन इससे पहले इन अंतर-धार्मिक विवाहों पर कोई हंगामा खड़ा नहीं किया गया.

दरअसल, विवाह एक निजी मसला है.प्रेम भी दिमाग नहीं दिल का मामला है.हिंदी फिल्म के गीत का सहारा लिया जाये तो प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है.प्रेम विवाह के विरोध का कारण कुछ और है.भारतीय समाज एक पारंपरिक समाज है.यहां अभी भी करीब नब्बे प्रतिशत विवाह परिवार की रजामंदी से होता है.यद्यपि प्रेम-विवाह का चलन बढ़ रहा है,फिर भी यह परिवार और समाज द्वारा आसानी से स्वीकार्य नहीं होता है.लेकिन,भारतीय समाज भी कई बदलाव से दो-चार हो रहा है.पहला,युवा वर्ग परंपरा की जकड़न को तोड़ रहा है.दिल वाले दुल्हनिया ले जाएगें-फिल्म समूची युवा पीढी का मार्गदर्शक है.दूसरा,नवयुवतियों को भी अब स्वतंत्रता का स्वाद लग गया है.तीसरा,मोबाइल फोन ने अब संवाद को सरल,सहज और सस्ता कर दिया है.चौथा,शिक्षा का अवसर बढा है.लोग घर की दहलीज लांघ कर शहर,नगर और महानगर का रूख करने लगे हैं.पांचवा,युवा वर्ग आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर हुआ है.ऐसे में स्वाभाविक ढंग से प्रेम विवाह का चलन बढा है.इसे देखकर समाज का आंखे दिखाना लाजिमी है.यही कारण है कि सगोत्रीय विवाह हो,अंतरजातीय विवाह हो,या फिर अंतरधार्मिक विवाह.,ऑनर-किलिंग का मसला गाहे-बगाहे सुना जाता रहा है.

लव जिहाद का मसला भी इसी सामाजिक और मानसिक पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए.हम मंगल ग्रह पर जा रहे हैं.इस तकनीकी विकास के युग में, हमें अपने दिमाग की खिड़की को खोलने की जरूरत है.प्रेम पवित्र है.विवाह सुखद हो सकता है,अगर इसे निभाया जाये.बस जबरन धर्म-परिवर्तन नैतिक अपराध है.धर्म छिपाना जज्बातों से खिलवाड़ है.इसकी निंदा होनी ही चाहिए.यही कारण है कि दारुल उलूम ने लव जिहाद की निंदा के है.शिया धर्म गुरू क्ल्बे सादिक ने बेवाकी से कहा है कि लव जिहाद में शामिल लोग इस्लाम के दुश्मन हैं और उन पर कोई रहम नहीं करना चाहिये.आश्चर्य यह है कि उदारवादी हिंदुओं ने बिल्कुल चुप्पी साध ली है.चंद, वोट बैंक के ठेकेदारों ने उदारवादी हिंदुओं का स्पेस ले लिया है.यह प्रवृति खतरनाक है.तभी फली.एस. नरीमन जैसे उदारवादी को यह उलाहना देना पड़ रहा है कि हिंदुत्व अपना उदारवादी चेहरा खो रहा है.यह सच भी है क्योंकि कण-कण में परमात्मा को देखने वाले और समूचे विश्व को अपना परिवार मानने वाले हिंदुओं को लव- जिहाद जैसे राजनीतिक शिगुफे का अनुमोदन नहीं करना चाहिए.

 

AMIT KUMAR SINGH
ASSISTANT PROFESSOR
R.S.M. (P.G.)  COLLEGE
DHAMPUR (BIJNOR)-246761
U.P.

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