मंगलवार, 30 सितंबर 2014

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - पाँच साहित्यिक सुभाषित

पाँच साहित्यिक सुभाषित

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन

 

लेखक चेतना जगाता है

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एम.टी.वासुदेवन नायर लिखते हैं - साहित्य साक्षी होता है मानवीय दुर्गति का,न्यायिक निषेध का। वह समस्त निष्ठुरताओं का गवाह तो है पर उसके पास कोई तैयार निदान या समाधान नहीं है। एक राजनीतिज्ञ कह सकता है - 'तुम मुझे वोट दो, मैं देश को स्वर्ग बना दूँगा।' एक धार्मिक व्यक्ति कह सकता है - 'मेरी राह चलो, निश्चित स्वर्ग मिलेगा।' परन्तु एक लेखक नहीं कह सकता की मेरी रचना पढो, तुम दूसरे ज़हां में पहुँच जाओगे या कि मैं सब कुछ ठीक कर दूँगा। इस विषय में लेखक कुछ भी नहीं कर सकता। वह तो मानवीय यातना की विस्तीर्ण धरती का एक मूक साक्षी है। वह तो केवल अपनी चिंताएँ बाँट सकता है, चेतना जगा सकता है कि देखो यह चीजें हैं जो व्यवस्था को खोखला कर रही हैं, इनसे सावधान रहो

 

हटाने की मानसिकता

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प्रख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी का कहना है - पहले जहाँ लिखा था : 'बीवेर, नैरो ब्रिज अहेड',अब वहाँ आ गया है : 'सावधान, पुलिया संकीर्ण है।'उस पुल से गुजरने वाले बहुतेरे लोगों के लिए'सावधान, पुलिया संकीर्ण है' भी उतना ही अंग्रेजी जितना कि 'नैरो ब्रिज अहेड' था। अगर अंग्रेजी की ज़गह हिन्दी इसलिए लिखी गई कि लोग पुल सेगुज़रने के पहले जान लें कि वह संकरा है तो यह इरादा पूरा नहीं हुआ है। हिन्दी ने अंग्रेजी को सिर्फ़ हटाया है।हिन्दी के जन संचार की प्रभावी भाषा न बन पाने के पीछे सबसे बड़ा कारण हिन्दी और अंग्रेजी वालों की यह हटाने की मानसिकता है।

 

मन तो ताजा करने वाली यादें

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आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने क्या खूब लिखा है -प्रभावित होना और प्रभावित करना जीवंतता का लक्षण है। कुछ लोग हैं, जो प्रभावित होने को दुर्बलता मानते हैं। मैं ऐसा नहीं मानता। जो महत् से, साधारण में छिपे असाधारण से प्रभावित नहीं होते, मैं उन्हें जड़ मानता हूँ। चेतन तो निकट सम्पर्क में आने वालों से भावात्मक आदान-प्रदान करता हुआ आगे बढ़ता जाता है। जिस व्यक्ति या परिवेश से अन्तर समृद्ध हुआ हो, उसे रह-रहकर मन याद करता ही है...करने के लिए विवश है। जब चारों तरफ़ के कुहरे से व्यक्ति अवसन्न होने लगता है  तब ऐसी यादें मन को ताजगी दे जाती हैं।

 

महावीर के मौन का रहस्य

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अमृता प्रीतम की लेखनी समझती है - दुनिया में एकमात्र रचना है, जो एक लम्बी खामोशी से तरंगित हुई थी.ओशो बताते हैं कि महावीर बरसों खामोश रहे। कोई सूत्र उन्होंने लिख-बोलकर नहीं बताया, पर उनके ग्यारह शिष्य हमेशा उनके क़रीब रहते थे। उन्होंने महावीर जी की खामोशी को तरंगित होते  हुए देखाऔर उसमें से जो अपने भीतर सुना,अकेले-अकेले वह एक जैसा था। ग्यारह शिष्यों ने जो सुना वह एक जैसा था। उन्होंने वही कलमबद्ध किया और उसी का नाम जैन सूत्र है।

 

मुगालते से कोसों दूर

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हिन्दी ग़ज़लों के बेताज बादशाह दुष्यंतकुमार अपने संग्रह साये में धूप में सचेत करते हैं -  ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसा दौर आता है जब तकलीफ गुनगुनाहट के रास्ते बाहर आना चाहती है. उसमें फँस कर गमें जानां और गमें दौरां तक एक हो जाते हैं. मुझे अपने बारे में मुगालते नहीं रहे. मैं मानता हूँ मैं गालिब नहीं हूँ. उस प्रतिभा का शतांश भी मुझमें नहीं है. लेकिन मैं यह भी नहीं मानता कि मेरी तकलीफ गालिब से कम है या मैंने उसे कम शिद्दत से महसूस किया है. हो सकता है,अपनी-अपनी पीड़ा को लेकर हर आदमी को यह वहम होता है.लेकिन इतिहास मुझसे जुड़ी हुई मेरे समय की तकलीफ का गवाह ख़ुद है.बस अनुभूति की इसी जरा-सी पूंजी के सहारे मैं उस्तादों और महारथियों के अखाड़े में उतर पड़ा।

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प्राध्यापक, दिग्विजय कालेज, राजनांदगांव

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