बुधवार, 17 सितंबर 2014

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - महिला सशक्तिकरण पर सामाजिक परिवेश का प्रभाव

महिला सशक्तिकरण पर सामाजिक परिवेश का प्रभाव

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

हिंदी की नामचीन लेखिका सुधा अरोड़ा ने एक चर्चा के दौरान जो कुछ कहा वह वास्तव में सोचने के लिए विवश कर देने वाला है। उन्होंने कहा कि महिलाओं पर हो रहे अत्‍याचार के संदर्भ में दामिनी कांड के बाद ऐसा लगा कि अब कुछ कड़े कानून बनेंगे और महिलाएं सुरक्षित जीवनयापन कर सकेंगी। लेकिन इसी माह अखबार के पहले पन्ने की एक खबर पढ़कर मन उचाट हो गया। इतनी भीड़ वाले इलाके में भी कोई उसे रोक या पकड़ नहीं कर पाया और वह एक जिंदगी बर्बाद कर फरार हो गया। 22 साल की मासूम-सी दिखती लड़की प्रीति ने सैनिक अस्पताल में नर्स की नियुक्ति के लिए पहली बार मुंबई शहर में कदम रखा था और 15 मई से उसे अपनी पहली नौकरी की शुरुआत करनी थी। 

न्याय में देर से बढ़ता दुःख

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उसके पत्रों की भाषा जिस तरह से हताशा और चिंता से भरी हुई थी, वह न केवल दिल दहलाने वाली थी बल्कि एक स्त्री के जीवन में आजीविका के समानांतर किसी और विकल्प के गैरजरूरी होने का भी सबूत देती थी। एक लड़की अस्पताल में जीवन और मृत्यु से जूझ रही है लेकिन जब भी उसे होश आता है, तो वह अपनी नौकरी के बचने और छोटी बहनों के सुरक्षित रहने की चिंता व्यक्त करती है। 

महिलाओं पर बलात्‍कार की घटनाएं और न्‍यायिक प्रक्रिया के संदर्भ में तीखी प्रतिक्रिया देते हुए श्रीमती अरोड़ा ने कहा कि हमारी न्यायिक प्रक्रिया इतनी धीमी है कि पीड़ित को न्याय मिलना लगभग असंभव है। कमजोर स्त्री अपने अधिकारों के प्रति न तो जागरूक है, न उसे अपने अधिकारों की जानकारी है। कहीं कुछ रास्ता दिखे भी, तो उसके पास इतना साहस नहीं है कि अपने लिए न्याय की गुहार लगा सके। 

विरोध का खामियाज़ा कब तक ?

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देश की न्यायिक प्रक्रिया उसके लिए एक ऐसी अंतहीन यंत्रणा बन जाती है जो अपराध से अधिक आतंकित करने वाली और डरावनी होती है। बहुत कम मामले ही मीडिया द्वारा हमारे सामने आ पाते हैं अधिकांश तो दर्ज ही नहीं हो पाते क्‍योंकि पुलिस में मामले को ले जाना एक यातनादायक प्रक्रिया है। फिर पूछताछ और तफ्तीश से पीड़ित को इतना तोड़ दिया जाता है कि वह आगे जाने की हिम्मत ही नहीं करती। इस देश में भंवरी देवी के मामले को हम देख चुके हैं जिसे सारे महिला संगठनों की कोशिश के बावजूद न्‍याय नहीं मिल पाया। 

सुधा अरोड़ा ने कहा कि स्त्री के संबंध में हमारा सामाजिक पर्यावरण कैसा है और उसमें लोकतंत्र की सभी संस्थाएं-विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका स्त्री के प्रति व्यवहार की कैसी नजर पेश कर रही हैं? इससे हमारे युवा किस तरह की सीख ले रहे हैं? इसे हम कुछ सामान्य उदाहरणों के माध्यम से समझ सकते हैं। कार्यस्थल पर यौन-शोषण और दुर्व्‍यवहार भारत में एक जाना-पहचाना मामला है। आमतौर पर स्त्रियां इससे बचती हुई अपनी आजीविका को बचाने की जुगत में लगी हैं। अमूमन वे या तो चुप्पी साध लेती हैं या समझौता करते हुए वहां बनी रहती हैं। लेकिन जो इस मामले के खिलाफ खड़ी होती हैं और इसे बाहर ले जाने का साहस करती हैं उन्हें सबसे अधिक खामियाजा सामाजिक रूप से भोगना पड़ता है। 

चरित्र-हत्या और कुप्रचार के सहारे उन्हें इतना कमजोर कर दिया जाता है कि वे अक्सर अपनी लड़ाई अधूरी छोड़ देती हैं या बीच में ही थक कर बैठ जाती हैं। इसका सबसे नकारात्मक असर यह है कि जन-सामान्य, स्त्री के प्रति हुए अन्याय के खिलाफ खड़े होने की जगह, अपनी धारणा में उसे ‘चालू’ मान लेता है। यही धारणा लगातार विकसित होती रहती है जो अपने जघन्य रूप में स्त्री के प्रति अपराध को रोजमर्रा की एक सामान्य-सी घटना बना देती है।

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