शनिवार, 27 सितंबर 2014

राजकुमार यादव का आलेख - अंग्रेजों की अग्रेजी भाषा ने ही अंग्रेजों को भारतवर्ष से खदेड़ दिया

------------हिंदी पखवाड़ा------------

अंग्रेजों की अग्रेजी भाषा ने ही अंग्रेजों को भारतवर्ष से खदेड़ दिया

गौरतलब है कि बारहवी सदी में शेख निजामुद्दीन औलिया के भारत भक्त शिष्य अमीर खुसरो की इजाद की हुई खड़ी बोली का सौन्दर्य सतत छः सौ वर्षों में निखरते-निखरते १८५०-१९०० के भारतेन्दु युग से कुछ कदम पीछे हिंदी अपनी जाज्वल्मान भाषा-शैली की रूप-लावण्यता को सम्पूर्ण भारतवर्ष में सुशोभित करने का प्रयास कर ही रही था कि, तभी अचानक जैसे देवभूमि और काश्मीर में सुनामी जैसा ज़लज़ला आया। ऐसा ही लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा-पध्दति और देश के क्रांतिकारियों के विरुद्ध बनाया इन्डियन पेनल कोड अधिनियम का तूफान सन १८३४-१८३८ तक सम्पूर्ण भारतवर्ष के हिंदी के चमन को बुरी तरह तहस-नहस करता रहा। जिससे प्रबंधन, तकनीकी, चिकित्सा, अर्थ-शास्त्र आदि विषयों पर लेखन का विकास अवरूध्द हो गया। हिन्दुस्तानियों को अंग्रेजी शिक्षा देने की वकालत करने वाले लार्ड मैकाले का यह कथन था कि - हिन्दुस्तानियों को अंग्रेजी शिक्षा देकर - "एक ऐसे लोगो के वर्ग का निर्माण करना चाहिए , जो कि रंग और रक्त में तो हिन्दुस्तानी हो, किन्तु उसकी रूचियां, उसका चिंतन, चरित्र और बुध्दि एकदम खालिस अग्रेजी हो।” इसके पीछे ऊसका मूल उद्देश्य समस्त भारतीयों का क्रिस्तानिकरण करना था। गौरतलब है आदिकाल में विज्ञान,भौतिकी, रसायन, चिकित्सा, गणित एवं ज्योतिष विज्ञान आदि विषयों के अध्ययन के लिए सैकड़ों विदेशी विद्यार्थी तक्षशिला एवं नालंदा आदि अन्य प्रसिध्द विश्वविद्यालयों में भारतवर्ष में पढ़ने आते थे।

मैकाले तो सन १८३८ में भारतवर्ष से वापस चला गया। किन्तु उसके जाने बाद उसकी बनायी अंग्रेजी नीतियों का प्राचर-प्रसार सम्पूर्ण भारतवर्ष में बड़ी तीव्र गति से होने लगा। जिससे विलायत में पढाई करने के आकर्षण में तथा अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव में अनेक औद्योगिक राजघरानों और संपन्न परिवार के लोग ब्रिटेन में जाकर शिक्षा लेने लगे। यह वह दौर था जबकि सम्पूर्ण यूरोप के देशों जिसमे नीदरलैंड,जर्मनी, कोरिया , फ़्रांस, इटली, आस्ट्रिया आदि देशों में राजनीतिक एवं गणतांत्रिक एकाधिकारों को लेकर क्रांतिकारी आंदोलनों की हलचलें इंग्लैंड के अख़बारों की सुर्खियाँ बनी हुई थी। जब सन १८५७ की ग़दर के बाद से क्रांतिवीरों को पकडकर कालापानी एवं अन्य जगह की जेलों में बंद कर यातनाएं दी जाने लगी। इसी समय देश और विदेश में अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीयों का अंग्रेजों के विरोध में स्वदेशी स्वाभिमान का पौरुष धधक उठा।

आगे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक खुदीराम बोस, चंद्रशेखर आजाद , सुखदेव एवं वीर सावरकर आदि की धधकती ज्वाला में आहुति देने वालों में महात्मा गाँधी, मोतीलाल नेहरु, जवाहरलाल नेहरु, सरदार पटेल, सुभाषचंद्र, मदन मोहन मालवीय, आदि अनेको के बलिदानों से आप सभी पाठक परिचित होंगे ही। अंततः अंग्रेजो की अंग्रेजी भाषा ने ही अंग्रेजो की हुकूमत के हलकों में तूफान मचाकर उन्हें भारतवर्ष से खदेड़ दिया। किन्तु इस पराधीनता से मुक्ति में हिंदी भाषा के अविस्मरनीय योगदान के लिए भारतवर्ष सदा ऋणी  रहेगा। इसी सन्दर्भ में जब सम्पूर्ण भारतवर्ष में स्वतंत्रता आंदोंलन अपने चरम पर था। उन्हीं दिनों भारत के महान साहित्यकारों में महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचन्द, रामचन्द्र शुकल, जयशंकर प्रसाद एवं रामधारीसिंह दिनकर आदि हिंदी साहित्य के इन सभी महापुरुषों ने भारतीय जनमानस के सामाजिक सरोकारों, स्वतंत्रता-संग्राम, धर्म-दर्शन तथा रूढ़िगत कुप्रथाओं आदि पर सृजनात्मक लेखन से सम्पूर्ण भारतवासियों के चिंतनशील विचारकों को इंसानियत के प्रति झझोड़कर हिंदी भाषा साहित्य को उच्चतम सोपानों पर प्रतिष्ठित कर दिया था।

इसी के सामानांतर सामाजिक एवं धार्मिक आन्दोलनों द्वारा अपने विचारों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए एवं आर्यसमाज के जन्मदाता महर्षि दयानंद द्वारा प्रकाशित ‘सत्यार्थप्रकाश’ की पुस्तकों तथा ब्रह्म समाज के प्रवर्तक राजा राममोहन राय के ‘उदंतमार्तंड’ हिंदी पत्र के अमूल्य योगदान से जहाँ हिंदी भाषा को अखिल भारतीय भाषा की प्रतिष्ठा मिली। तो वहीँ दूसरी ओर यह कहना प्रासांगिक होगा कि गुरु रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी विवेकानंद के धार्मिक सुधार आन्दोलनों द्वारा हिन्दू धर्म के पुनर्जागरण और हिंदुओं को ईसाई धर्मांतरण से बचाने में जो प्रचार-प्रसार हिंदी भाषा में किया , उनके इस महान योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता। इन्हीं सब महापुरूषों के समानांतर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सम्पूर्ण स्वतंत्रता आन्दोलन में लाखों जन-सैलाब को हिंदी भाषा के माध्यम से ही जन-जन को एकता के सूत्र में बाँधा और इस धर्मनिरपेक्ष हिंदी भाषा को राजभाषा होने का गौरव प्राप्त कराने में महान योगदान दिया था।

मित्रों, अंग्रेजी भाषा का दंभ भरने वाले संभवतः इस बात से अनभिज्ञ है कि अंग्रेजी भाषा में तो मात्र दस हजार ही मूल शब्द हैं, किन्तु हिंदी भाषा में ढाई लाख से अधिक मूल शब्दों का खूबसूरत खजाना है। यूरोपीय देशों के साथ-साथ अन्य अधिकाँश मुल्कों में भी अंगरेजी भाषा का कोई वजूद नहीं है। सबकी अपनी-अपनी भाषाएँ है। यदि देश के राजनेता और उद्योग जगत के लोग दृड़ इच्छा शक्ति से हिंदी को अनिवार्य करना चाहें तो अन्य भाषाओँ के तकनीकी शब्दों को हूबहू अपनाकर हिंदी शिक्षा देश की समृधि और विकास में वरदान सिद्ध हो सकती है। हम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी से यह आशा अवश्य कर सकते हैं कि हमारी सांस्कृतिक-सभ्यता, परम्पराओ की धरोहर और गौरवशाली इतिहास को सहेजती राजभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में आदरणीय स्थान मिल सकेगा

 

राजकुमार यादव

ईमेल : rkysg5497@gamil

पता : डी-३७/२, आर. आर. केट कॉलोनी, इंदौर - ४५२०१३

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------