शनिवार, 27 सितंबर 2014

गीता दुबे की लघुकथा - नजरिया

गीता दुबे, जमशेदपुर, झारखण्ड

नजरिया

सड़क किनारे बनी पार्किंग एरिया में कार पार्क कर वह जैसे ही जाने लगा म्युनिसिपैलिटी का लड़का अपनी हाथ में रसीद और पेन लिए दौड़ा-दौड़ा उसकी ओर आया और उसकी गाड़ी का नंबर नोट करते हुए कहा--- 5 रु साहब, 5रु .........

रसीद लेने से इंकार करते हुए उसने कहा----'काहे का पाँच रूपए!' अरे पाँच मिनट के लिए ही तो गाड़ी लगाई है, मैं वह पास वाली दुकान में बस यूँ गया और यूँ  आया।

'नहीं साहब रसीद तो लेनी ही पड़ेगी, पाँच मिनट हो या पाँच घंटे’| मुझे ऑफिस में पैसे जमा करने पड़ते हैं न साहब ! लड़के ने रसीद देते हुए कहा।

यह सुन वह आग बबूला हो गया और चिल्लाते हुए बोल|---

'मुझे कानून सिखाता है तू, मैं खूब जानता हूँ तुम जैसों को, इसी तरह पैसे लेकर अपनी जेब गरम करते हो'|

  लड़के ने कहा—‘साहब गुस्सा बाद में होना, पहले यह रसीद ले लो’|

   लेकिन उसने लड़के की न सुनी और यह कहकर चला गया कि लौटकर देता हूँ| वापस आने पर उसने अपनी कार स्टार्ट की और जाने लगा, मुनिसिपैलिटी का वह लड़का आवाज लगाता रहा ---- साहब पांच रु ---,साहब पांच रु --- लेकिन वह उसे अनसुनी कर चलता बना|

   दफ्तर में कुछ देर काम करने के बाद वह चाय पीने कैंटीन पहुंचा, चाय पी लेने के बाद उसने चाय वाले से कहा---‘अरे, चाय तो मैंने पी ली लेकिन पांच रु छुट्टे नहीं हैं मेरे पास| इसपर चाय वाले ने कहा---‘ कोई बात नहीं साहब, नहीं है, मत दो या कल दे देना, पांच ही रु की तो बात है, कौन सी बड़ी बात हो गई|  

                                            गीता दुबे

जमशेदपुर, झारखण्ड

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