मंगलवार, 23 सितंबर 2014

राजकुमार यादव का यात्रा संस्मरण - अंडमान निकोबार : देश के महान क्रांतिकारियों की तप-स्थली

देश के महान क्रांतिकारियों की तप-स्थली कालापानी यात्रा संस्मरण

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राजकुमार यादव

 

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प्रकृति की खूबसूरत वादियों में पहाड़ों से झरझर कर झरते झरने, बहती नदियों के प्रवाह मार्ग में चट्टानों से टकराकर कलकल करती जलधाराएँ , प्राकृतिक निर्मल और शांत झीलों तथा नैसर्गिक वनांचलों में भ्रमण करने के लिए प्रायः हम सभी का दिल सदा मचलता रहता है  यद्यपि ऐसे तो अनेक खूबसूरत पर्यटन स्थलों पर भ्रमण करने का अवसर मिला है। किन्तु इस बार समुद्री यात्रा से अंडमान – निकोबार द्वीप समूह के द्वीपों के तट पर पसरे पड़े आकर्षक बीचों को देखने के लिए मेरा मन हिचकोले मारने लगा। इसके लिए हम तीन मित्र परिवारों के बच्चों सहित ११ लोगों ने १७ जन. २०१४ की रात्रि को इंदौर से उड़ान भरी। सीधी हवाई यात्रा नहीं मिलने से हमें मुंबई और चेन्नई में ठहरना पड़ा। तीन टुकड़ों की उड़ान के बाद हम १९ जन. को सुबह पोर्ट ब्लेयर के स्वच्छ एवं पारदर्शी कांच समान नीले पानी के समुद्री तट पर पहुच गए।

पोर्ट ब्लेयर की प्रसिद्ध सेलुलर जेल : सर्वप्रथम हम अंडमान – निकोबार द्वीप समूह की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में पराधीन भारतवर्ष के ऐतिहासिक ९० वर्षों के कालापानी के भयावने और रूह कंपकपाने वाले काले अध्याय से रूबरू हुए। गौरतलब है कि अंग्रेजों की हुकूमत के खिलाफ १० मई १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की ग़दर के बाद देश के २०० क्रांतिकारियों का पहला जत्था १० मार्च १८५८ को सजा के लिए कालापानी भेजा गया था। यहीं वह सेलुलर जेल है जहां चप्पे-चप्पे पर देश के अनेक क्रांतिवीर सूरमाओं की अनमोल जवानी में वतन पर मर-मिटने की अमिट निशानियाँ हैं। प्रारम्भ में यह सेलुलर जेल केन्द्र के टॉवर से सात षटकोणीय शाखाओं में विभक्त होकर तिमंजिला विशालकाय ईमारत थी। अब यहाँ तीन मात्र शाखाएँ हैं। इस जेल की ७ बाय १३ फिट और दस फिट ऊंची कोठारी में छत से एक फिट नीचे 3 बाय एक फिट का उजालदान है। यहाँ अनेक पीड़ादायक यातनाओं के साथ-साथ रात्रिकाल में बंदियों को मूत्र-विसर्जन के लिए कोठरी से बाहर निकलने की इजाजत नहीं दी जाती थी। उन्हें इस कार्य के लिए एक कटोरा दे दिया जाता था तथा नित्य-कर्म के लिए मात्र दिन में ही इजाजत थी। इस इमारत की ६९८ कोठरियों में महिला कैदियों सहित समस्त बंदियों को कारागृह में रखा जाता था। इमारत की एक कोठरी में महान क्रांतिकारी वीर सावरकर की तस्वीर को देख मैं अत्यंत अभिभूत हुआ और उन्हें सेल्यूट कर धन्य हुआ। दूसरे विश्वयुद्ध के समय आजाद हिन्द फौज के स्व. नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने यहाँ 30 मई, १९४३ को आजादी का तत्कालीन ध्वज फहराया था। ११ फर. १९७९ को भूतपूर्व प्र. मंत्री मोरारजी देसाई ने देश के क्रांतिकारियों की तप-स्थली इस जेल को राष्ट्रीय स्मारिका के रूप में राष्ट्र को समर्पित किया। इस स्मारक के संग्रहालय में देश के क्रांतिकारियों की ज़िल्लत से भरी जिन्दगी की प्रतिमाएं तथा रात्रि को लाइट एंड साउंड शो प्रोग्राम के बेक ग्राउंड में अभिनेता ओमपुरी, नसीरुद्दीन शाह तथा रजा मुराद की ओजस्वी आवाज हमें स्वाभिमानपूर्वक अपने इतिहास और संस्कृति की संरक्षा की अविचल प्रेरणा प्रदान करती है।

हेवलॉक द्वीप यात्रा : पोर्ट-ब्लेयर के पश्चात हमारा अगला पड़ाव रहस्य और रोमांच से भरी जहाज यात्रा द्वारा हेवलॉक द्वीप था। हेवलॉक द्वीप के समुद्री गर्भ में भी रहस्य से भरी अनेक खौफनाफ़ घटनाओं से सनी निस्सहाय कैदियों की बेदर्द आह और तड़प की मौजूदगी उफनती लहरों के कोलाहल के रूप में आज भी गुंजायमान है। कतिपय इतिहासकारों का मानना है कि जब समुद्री जहाजों से व्यापार-व्यवसाय का प्रसार प्रारंभ हुआ। प्रारंभ में पुर्तगीज, चीनी तथा अरब जहाजी व्यापारियों द्वारा अफ्रीकन दास-गुलामों को अपने जहाजों के दुर्घटनाग्रस्त होने पर यहाँ छोड़ दिया जाता था। आगे चलकर १७ वीं सदी में ब्रिटिश इंडिया कंपनी का इन द्वीपों की ओर ध्यान गया और तत्कालीन लेफ्टिनेंट आर्चिबाल्ड ब्लेयर के शासनकाल में हेवलॉक के चाथम, वाईपर तथा रास द्वीपों पर कब्ज़ा कर यहाँ से जहाजों द्वारा व्यापार करना प्रारंभ किया। सन १७८९ में अंडमान के चाथम द्वीप पर सबसे पहली कैदियों की बस्ती बसाई गई। इसी के समानांतर वाईपर और रास द्वीप पर भी कैदियों की बसाहट की गई। गौरतलब है कि केप्टन हेनरी मान द्वारा २२ जन. सन १८५८ को अंडमान द्वीप में यूनियन जैक पताका को फहराया गया था। तभी से भारतवर्ष में अंग्रेजो के शासनकाल की शुरुवाद हुई थी। द्वित्तीत विश्व-युध्द के समय विश्व की सार्वभौम सत्ता वाले ब्रिटेन को सन १९४२ में जापानियों ने करारी शिकस्त देकर उन्हें यहाँ से श्रीलंका तक खदेड़ दिया था। clip_image006

प्रतिशोधस्वरूप सन १९४५ में ब्रिटेन के बम-वर्षक विमानों ने श्रीलंका से उड़ान भरकर जापानी जहाजों को बुरी तरह ध्वस्त करना प्रारंभ कर दिया। जापानियों को उनके अधीन पराधीन हुए अंडमान के भारतवासियों पर जासूसी का संदेह हुआ। परिणामतः हजारों भारतियों को कैदी बनाकर कारागृहों में डाल दिया गया। जब ब्रिटेन के दबाव और खाद्यान्य संकट से भुखमरी फ़ैलने लगी। तब तिलमिलाते जापानियों ने अपनी जान बचाने के उद्देश्य से हेवलॉक के समुद्र में दिल दहलाने वाली खौफनाफ घटना को अंजाम दिया। जापानियों ने तीन जहाजों में ७०० से ज्यादा भारतियों को भरकर बंदुकों की बट से मार-मारकर समुद्र में जिन्दा फेंक दिया था तथा उनके मुख्यालय रास द्वीप पर ४४ भारतियों को गोलियों से बुरी तरह भूंन डाला था। ब्रिटेन के सेनानियों ने जापानियों की धज्जियाँ बिखेरने के पश्चात उन्हें वहा से भगाकर पुनः अंडमान पर कब्ज़ा कर लिया। इसी बीच अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर किये गए परमाणु बम विस्फोट से सम्पूर्ण विश्व थर्रा उठा। करोड़ों मानव और जीव-जगत का नरसंहार होने के पश्चात् विश्व- संधि से युध्द विराम हुआ। तभी ब्रिटेन ने भी उनके द्वारा गुनाहगारों को बंदी बनाने के ‘पीनल कोड अधिनियम’ को वापस ले लिया और समस्त भारतीय बंदियों को पराधीन जीवन की दासता से मुक्त कर दिया था।

अंडमान में देखी अनोखी बाराटांग की गुफा

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हिन्द महासागर के आगोश में बसा अंडमान-निकोबार द्वीप समूह दक्षिण-पूर्वी हिमालय पर्वतमाला की शृंखलाबद्ध पहाड़ियों का वह अभिन्न अंग है, जहाँ इस शृंखला की ५७२ पहाड़ियां समुद्री-जल में ऊपर उभरकर सुन्दर-सुन्दर द्वीपरूपों में मन को मोहित करती हैं। कहने को तो इस प्रदेश को कालापानी कहा जाता है, किन्तु पर्यटन की अभीप्सा रखने वाले सैलानियों को यहाँ के लुभावने नीले समंदर के तटों पर बिखरता अद्वित्तीय नैसर्गिक सौन्दर्य अन्तःस्थल की गहराइयों में अपनी विशुद्ध छाप छोड़कर मन को असीम आनंद की तृप्ति से भर देता हैं। वैज्ञानिकों और भूगर्भ शास्त्रियों के मतानु सार यह पृथ्वीरूप सृष्टि लगभग दो अरब वर्ष पूर्व अस्तित्व में आई। कालांतर में पृथ्वी दो भागों जल और भूमि में विभक्त हो गई। हिम-युग काल के तदनंतर यह धरती प्राणी और वनस्पति जगत से फलीभूत होती गई। इस कायनात को बनाने वाले की अदृश्य शक्ति और उसकी मंशा को आज तक कोई नहीं जान पाया। यद्यपि वह सदैव प्राणी और वनस्पति जगत के हित में जीवन-दायिनी प्रेम की प्रसन्नता बरसाता आया है। किन्तु कभी-कभी यह मतवाला उग्र होकर जलजले, आंधी-तूफ़ान अथवा भूकम्पों के रूप में आकर जगत का विनाश करने से भी पीछे नहीं रहता। उसके दिए हुए भूकम्पों के झटकों के कारण ही यह भूमि सात टुकड़ों में तिड़ककर तथा आपस में दूर-दूर होकर समुद्र में सात महाद्वीपों के नाम से तैर रही है तथा इन महाद्वीपों के आसपास के सात अलग-अलग विविधताओं वाले जल के कारण ये सभी सात महासागरों का प्रादुर्भाव हुआ। संभवतः सदियों पूर्व पोर्ट ब्लेयर से लगभग १०० कि.मी. दूर भूगर्भिक हलचलों से धधकती हुई विस्फोटक ज्वाला से बना चूना पत्थर का लावा धरती का सीना चीरकर अंडमान के बाराटांग द्वीप क्षेत्र में खदबदाता हुआ आज भी जीवंत नजर आता है। गौरतलब है कि युगों-युगों पूर्व धरती में आई दरार से उद्भूत हुई यह बाराटांग द्वीप की गुफा लगभग आधा कि.मी. लम्बी, ७ से १५ फिट चौड़ी तथा लगभग ५० फिट ऊंची अँधेरी गुफा है। किन्तु कहीं-कहीं ऊपर से खुले झरोकों से झरते प्रकाश में कायनात द्वारा निर्मित विविध मूर्तिरूप आयामों को मिश्रित रंगों के शिला-खण्डों में इस अद्भुद और अद्वतीय गुफा का साक्षात्कार अपने आप में एक अलग ही दिव्य अनुभूति है | इस चित्तार्षक अनुभूति से मेरा अभिप्राय यह है कि कुछ शिला-खण्डों की मूर्ति-रूप आकृतियों में सदियों से हमारे मन में बिठाये देवी-देवताओं की झलक प्रकट होती है। एक शिला-खण्ड झूमर की भांति लटका हुआ है और ऐसा आभास होता है जैसे कि इंद्र-देव के एरावत के माथे से सात सूँडे निकल रही हैं। गौरतलब है कि अनेक भू-गर्भ शास्त्रियों तथा मनस्विदों ने गुफाओं में स्वमेव निर्मित आकृतियों के रहस्यों को उजागर करते हुए व्यक्त किया है कि, चूना पत्थर के पहाड़ों में ‘स्पिलियोथेम’ नामक पदार्थ दो तरह का होता है। जिन्हें स्टैलक्टाईट तथा स्टैलग्माईट कहा जाता है। वर्षा काल में गुफा की छत पर जमा हुआ चूना जब घुलकर गुफा की दरारों में से रिस-रिस कर कन्दराओं की गड्डे-खोचड़ों में परत दर परत जमता रहता है , तब इस जमावट से निर्मित आकृति को स्टैलक्टाईट कहा जाता है। यह प्रक्रिया निरंतर चलते रहने से ये आकृतियाँ धीरे-धीरे जमीन की ओर लम्बवत स्तम्भ के सदृश्य बढ़ती जाती है। इसी भांति जब ऊपर से चूना-पानी बूंदों के रूप में निरंतर टपक-टपककर जमीन पर पड़ने के पश्चात् यह चूना परत-दर-परत जमीन पर अपना अंश छोड़कर नीचे से ऊपर की ओर बढ़ता जाता है। तब यह प्रक्रिया स्टैलग्माईट कहलाइ जाती है। वैज्ञानिकों के मतानुसार गुफाओं में बनी आकृतियों में २० मिलीमीटर की परत जमने के लिए लगभग सौ वर्ष लग जाते है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऐसी गुफाएँ कितने युगों-युगों से विद्यमान हैं। कायनात को बनाने वाले इस अदृश्य शिल्पज्ञ की तराशी हुई इन अद्भुद आकृतियों की महिमा अपरम्पार और अकथनीय है। महू के पास शीतलामाता मंदिर तथा कजलीगड़, पचमढ़ी और शिलॉंग के पास चेरापूंजी आदि की गुफाओं में निर्मित आकृतियाँ इसी तथ्य को बयां करती हैं।

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अंडमान द्वीप की अदभुद सामुद्रिक जल-क्रीड़ाएँ

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पर्यटन स्थलों की अनुपम सौन्दर्यता के साथ यदि वहां सैलानियों के लिए कुछ खेल-क्रीड़ाओं की सुविधाएँ उपलब्ध हो जाएँ तो सैलनियों के आनंद में और भी इजाफा हो जाता है। अंडमान के पोर्ट-ब्लेयर और हेवलॉक द्वीपों पर सहल करते समय हम इस बात से अनजान और अनभिज्ञ थे कि यहाँ बोट राइडिंग के अलावा स्नोर्क्लिंग, स्कूबा डायविंग, सी-वाक् तथा ग्लास बोट के द्वारा गहरे समुद्र की तलहटी में विचरण करता रंगबिरंगा जल-संसार अपने दर्शन के लिए प्रतीक्षारत हो हमें बेसब्री से निहार रहा है। फिर क्या था, हम सब उतर गए हेवलॉक के एलिफेंटा बीच के पारदर्शी नीले समंदर में। यहाँ सबसे पहले ‘स्नोर्क्लिंग’ का लुत्फ़ उठाया। इस स्नोर्क्लिंग जलक्रीडा में हमें फ्लोटिंग ट्यूब पहनाकर आँखों पर एक चश्मा चड़ा दिया जाता है तथा मुख में जबड़ों के बीच विंड पाईप को दबाकर रखना पड़ता है। साथ में ले जाने वाला गोताखोर हमें समुद्र में लगभग आधा कि. मी. दूर तक सिर को पानी में डुबोये ले जाया जाता है। जहाँ हमें दिखाई देती है डिस्कवरी चैनल पर दिखाई देने वाली समुद्र के नीचे की अजब-गजब दुनिया | इसी अजब-गजब दुनिया का दर्शन ‘सी-वाक्’ द्वारा भी किया जाता है। इसमें सिर के ऊपर आक्सीजन से भरा हेलमेट पहना दिया जाता है तथा आँखों पर चश्मा और आप समुद्र की तलहटी में विचरते रहिये वहां का जलमग्न रंगीन मछलियों का नजारा देखने को। और हाँ, जो सैलानी पानी में उतरना नहीं चाहते, उन्हें मोटरबोट की तलहटी में 4 बाय ८ फिट की ग्लास लगी बोट में बैठाकर समुद्र तल पर घुमाया जाता है। तो, जनाब बिना पानी में उतरे भी सागर की पारदर्शी गहराई में झाँका जा सकता है। सागर की गहराई का अदभुद और आकर्षक जलसंसार देखना हो तो ‘स्कूबा डायविंग’ सर्वश्रेष्ठ है। किन्तु यह मात्र जवां और ज़ांबाज लोगो के लिए ही श्रेयस्कर है। इस स्कूबा डायविंग के लिए सर्वप्रथम लगभग २० मिनिट की मौखिक ट्रेनिंग में समुद्र के लगभग ४० फिट नीचे रहने पर अनेक तरह के दिशा-निर्देशों में विभिन्न हस्त-मुद्राओं के इशारों द्वारा आपस में वार्तालाप करने के कार्य को समझाया जाता है। समुद्र के तापमान से आपके शरीर के तापमान में तादात्म्य स्थापित हो सके। इसलिए पहले से ही गीला स्वीमिंग कास्च्यूम पहना दिया जाता है। इसके पश्चात् मुख पर मास्क, चश्मा तथा मुख को विंड पाईप के सहारे पीठ पर बंधे आक्सीजन सिलेंडर से लैस कर दिया जाता है। कुछ देर तक समुद्री पानी से अनुकूलता हो जाने पर गोताखोर आपको पकड़कर सहारा देते हुए ४० फिट नीचे जल-जगत की दिव्य दुनिया का दर्शन कराता है। इस अदभुद जल संसार की भीतर की तलहटी में लहराती रंगबिरंगी सुन्दर-सुन्दर कोरल रीफों , मछलियों तथा अनेक जल-जीवों को निहारने तथा स्वयं छूकर समुद्र के भीतर के रहस्य और रोमांच से भरे आनंद का अनुभव द्विवा-स्वप्न जैसा सा ही लगा। हेवलॉक के आप-पास के टापुओं में – नील द्वीप, ज्वाली बॉय, नार्थ-बे तथा स्वम हेवलॉक के अलग-अलग समुद्री तटों पर ‘स्कूबा डायविंग’ का लुत्फ़ उठाने के लिए विश्व स्तरीय अत्य-आधुनिक सुविधाओं से संपन्न हैं।

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हमें सागर से घिरे इस द्वीप के तटों पर फैले कार्बियन कोव तथा वंडूर बीचों पर उफान लेती समुद्री लहरें जहाँ आ-आकर मन को मोहित करती है, वहीँ अनेक तरह की सामुद्रिक जल-क्रीड़ाएँ मन में अदभुद रोमांच पैदा करती है। गौरतलब है कार्बियन कोव समुद्र तट एशिया के सात सर्वक्श्रेष्ठ बीचों में से एक है। इसके साथ ही इसके समुद्री तट को साँपों का बसेरा भी कहा जाता है। हम यह जानकार सिहर गए कि विश्व के ४६ जहरीले सापों की प्रजातियों में से १३ प्रजाति के विषैले सांप जिसमें प्रसिध्द लातोकोडा भी यहाँ पाया जाता है। पोर्ट-ब्लेयर की अप्रितम सुन्दरता में चिड़िया टापू , ज्वाली बॉय आदि द्वीपों के पानी में विभिन्न प्रकार के रंगीन कोरल रीफ तथा विभिन्न प्रकार के संग्राहलयों से समुद्र के जल संसार में पाए जाने वाले जीव-जंतुओं की प्रजातियों तथा वनस्पतियों आदि की अदभुद जानकारियों से मन बड़ा प्रसन्न हुआ।

कालापानी: जनसामान्य में अंडमान – निकोबार प्रदेश अंग्रेजो के शासनकाल में कालापानी के नाम से जाना जाता था। संभवतः यहाँ के द्वीपों के चारों ओर दूर-दूर तक अत्यंत गहरे और लहराते समुद्र का ऊपरी तल गहरे नीले पानी जैसा दिखाई के कारण यह प्रदेश कालापानी के नाम से मशहूर हुआ। इस प्रदेश की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि माले देश से जुडी हुई है। पूर्व काल में यहाँ से दास - गुलामों का व्यापर होता था। माले भाषा में इन द्वीपों का नाम हंडूमान से चलकर हंदुमान और आगे चलकर अंडमान प्रचलित हुआ। ऐतिहासिक संदर्भोंनुसार प्रसिद्द चीनी यात्री ईत्सिंग ने ६७२ ईसवीं में यहाँ की यात्रा की थी। ईत्सिंग तथा अन्य यात्रियों के संस्मरणों द्वारा इतिहासकारों ने यहाँ के निवासियों को पाषाण युगीन नरभक्षी व्यक्त किया है। इस प्रदेश में छोटे-बड़े कुल ५७२ द्वीप है। जिसमे से मात्र 38 द्वीपों पर मनुष्यों का निवास है। आधुनिक मानव सभ्यता से वंचित इस द्वीप समूह के तीन जिलों – अंडमान, नार्थ एंड मिडिल अंडमान तथा निकोबार में यहाँ छः प्रकार की – जारवा, सेंटीलिटीज, शौम्पेन, ओंगी, अंडमानीज तथा निकोबारी आदिम जनजातियाँ रहती हैं। इन सभी का मुख्य भोजन सूअर, मछली, सीपी, केंकड़ा और कंदमूल है। आज भी इन खूंखार आदिम जनजातियाँ का प्रमुख हथियार धनुष, तीर-कमान है।

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