रविवार, 7 सितंबर 2014

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - शिक्षक दिवस बना सीख, संवाद और सरोकार का अनोखा संगम

शिक्षक दिवस बना सीख, संवाद

और सरोकार का अनोखा संगम

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सन्दर्भ - प्रधानमंत्री का मर्मस्पर्शी सम्बोधन 

- डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शिक्षक दिवस पर देश भर के स्कूली छात्रों को सैम मानेक शॉ ऑडिटोरियम से सम्बोधन स्वतन्त्र भारत के इतिहास का एक यादगार दिन बन गया। गौरतलब है कि स्वतंत्रता दिवस पर श्री मोदी ने लाल किले से स्वयं को देश का प्रधान सेवक कहा था। इधर शिक्षक दिवस पर उन्होंने यह कहकर सबका दिल जीत लिया - मैं एक हेड मास्टर नहीं हूँ किन्तु टास्क मास्टर जरूर हूँ। अगर मेरे दफ्तर के लोग 11 घंटे काम करकरते हैं तो मैं 12 घंटे समय देता हूँ। उनका कहना था कि सपने देखने से बेहतर है कुछ करके दिखाना। छोटे-छोटे कार्यों में आपका समर्पण आपको मदद करता है। इस दौरान मोदी ने छात्रों को कई प्रेरणादायक कहानियां भी सुनाईं। उन्होंने छात्रों से स्वस्थ गुरु-शिष्य परंपरा को स्थापित करने का आग्रह किया। मोदी ने छात्रों के सवालों के जवाब भी दिए। सब मिलाकर, हुआ यों कि किताबों की दुनिया के लोगों के नाम पर मनाये जाने वाले दिवस पर प्रधानमंत्री विद्यार्थियों और देशवासियों को सम्बोधित करते हुए अपनी ज़िंदगी की किताब के कई अनछुए पहलू सहज भाव से साझा कर गए। 

देश के इतिहास में पहली बार ऐसा देखा गया कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मुखिया ने गज़ब की सादगी और अद्भुत सहजता के साथ बहुत बड़ी काम की बातें बड़े ही निराले और हलके पुलके अंज़ाज में कह दीं। ये बातें सिर्फ शिक्षा, शिक्षक,शिक्षार्थी तक सिमटकर नहीं रह गईं बल्कि उनके प्रभाव क्षेत्र में पूरे हिन्दुस्तान को ज्ञान और कर्म में एकरूपता लाने के उपाय भी बरबस समा गए थे। दरअसल प्रधानमंत्री जी बच्चों के बड़प्पन के ज्यादा बड़ो के बचपने को बचाने पर फोकस दिख रहे थे, ताकि वे हमारे नौनिहालों की पुकार और दर्द को उनकी जगह पर खड़े होकर देखें, समझें और उनके समाधान की ज़मीनी पहल करें। लगा जैसे वे कह रहे हों कि बच्चों को सिर्फ सुनाना मुनासिब नहीं है,उन्हें सुनना भी ज़रूरी है। यही कारण है कि उन्होंने खुद देश भर के बच्चों से सीधे संवाद किया। उन्हें अपने बचपन की कहानियाँ सुनाई। चुटकियाँ भी लीं। नसीहत भी दी। यानी वे खुद बच्चों तक पहुंचकर उनसे बोलते- बतियाते हुए दिखे। सचमुच ऐसा पहली बार हुआ। 

प्रधानमंत्री ने सिर्फ मोबाइल, इंटरनेट और 'गूगल गुरू' की शरण से कभी परे जाकर प्रकृति से सीधे सरोकार और संवाद के लिए बच्चों को आवाज़ दी। पर्यावरण और प्रकृति के अवदान से उन्हें जोड़ने के लिए श्री मोदी ने बेहद मौज़ूं बात कही कि कभी चांदनी रात में धागा पिरोकर देखें, कभी सूर्योदय या सूर्यास्त के नज़ारे का लुत्फ़ उठायें। देखें कितनी बार पसीना बहाते हैं। कभी किताब, कभी टीवी इसमें जिंदगी नहीं दबनी चाहिए, इससे भी बड़ी दुनिया है, इसीलिए ये मस्ती हमारे जीवन में होनी चाहिए। जो खेलता नहीं, वह खिलता नहीं। जिनका भी पसंद हो उनका जीवन चरित्र पढ़ना चाहिए,उससे हम इतिहास के करीब जाते हैं। ज्ञान के संसार से व्यापक नाते के अलावा संस्कृति और प्रकृति की जुगलबंदी के इन अल्फ़ाज़ों ने ज़ाहिर है कि बच्चों को भावविभोर कर दिया, साथ ही बड़ो को सोचने के लिए मज़बूर कर दिया कि वे कैसे बच्चों को प्रकृति के अनमोल खजाने को पाने और उसकी सुंदरता का रस पीने के लिए आगे लाएं। प्रधानमंत्री जी  सुनते हुए कोई आश्चर्य नहीं कि वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी वाला तराना याद आ गया। 

दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अध्यापन पेशा नहीं, बल्कि जीवन धर्म है और उम्मीद की कि अध्यापकों के प्रयास भारत के भविष्य का निर्माण करने को बढ़ावा देंगे। प्रधानमंत्री ने आज शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा पुरस्कृत किए जाने वाले लगभग 350 अध्यापकों से अपने आवास पर अनौपचारिक बातचीत में कहा कि किसी भी छात्र के जीवन में अध्यापक की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। कहना न होगा कि इससे श्री मोदी की गुरु गुण ग्राहकता का परिचय मिलता है। उनके विचारों में गुरु की महत्ता के स्वाकार की संस्कृति की गुरुता साफ़ झलक रही थी। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि अध्यापक कभी भी रिटायर नहीं होता है और हमेशा नयी पीढ़ी को ज्ञान देने का प्रयास जारी रखता है।

प्रधनमंत्री श्री मोदी ने समाज जीवन में शिक्षक के महत्व के प्रति गौरव का भाव पैदा करने की ज़रुरत पर बल दिया। शिक्षण कर्म को प्राणवान,तेजस्वी कैसे बनाया जाए,इस पर चिंतन, बहस करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने दो टूक लहज़े में सवाल किया कि सामर्थ्यवान विद्यार्थी टीचर बनना पसंद क्यों नहीं करते, इस सवाल का जवाब हम सबको खोजना पड़ेगा। ज़ाहिर है कि श्री मोदी ने शिक्षक दिवस के बहाने शिक्षकीय कर्म की चुनौतियों की तरफ भी ध्यान देने की हिमायत की।  उन्होंने बड़ी माकूल बात कही कि जो लोग साल का सोचते हैं वो अनाज बोते हैं, जो दस साल का सोचते हैं वो फलों के वृक्ष बोते हैं लेकिन जो लोग पीढ़ियों का सोचते हैं वो इंसान बोते हैं, मतलब शिक्षकों के जरिए नए विद्यार्थी बनाना।

प्रधानमंत्री श्री मोदी ने एक दफे फिर पंद्रह अगस्त की बात का हवाला देते हुए कहा कि कहा कि कोई स्कूल ऐसा न हो जहां बालिकाओं को लिए अलग टॉयलेट न हो, आज कई स्कूल ऐसे हैं जहां अलग टॉयलेट नहीं हैं, यूं लगेगा कि ये कोई ऐसा काम तो नहीं कि प्रधानमंत्री ने कहा है, लेकिन मुझे लगता है कि इस काम को करना होगा। मुझे हर स्कूल से मदद चाहिए,एक माहौल बनना चाहिए। दरअसल, यह कहकर श्री मोदी शिक्षक दिवस पर बालिका शिक्षा और उनकी तरक्की को देश के समग्र विकास से जोड़कर देखने के लिए लोगों को आहूत कर गए। 

प्रधानमंत्री ने एक और पते की बात कही कि मैं देश के गणमान्य लोगों से भी आग्रह करना चाहता हूं, डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएफस। क्या आप अपने निकट कोई स्कूल पसंद कर, सप्ताह में ज्यादा नहीं एक दिन एक पीरियड में बच्चों को पढ़ा सकते हैं, विषय आप तय कर लीजिए स्कूल के साथ मिलकर। अगर आप कितने भी बड़े अफसर क्यों न हों, अगर आप बच्चों के साथ रहेंगे, उन्हें पढ़ाएंगे, क्या आप हालात बदल नहीं सकते। यह वास्तव में शिक्षा के व्यापक अर्थ और सामजिक सरोकार के रिश्ते की समझ को झकझोर देने वाली बात थी। 

बहरहाल,इसमें दो मत की कोई संभावना नहीं कि शिक्षक दिवस को पहली बार देशवासियों ने इतनी गहराई से  महसूस किया,उसे जीकर भी देखा। इससे शिक्षा जगत का गौरव तो बढ़ा ही, हमारी सोच को एक नया आयाम भी मिला। बच्चों को अपने गुरुजनों के प्रति जिम्मेदार बनने की प्रेरणा मिली तो बड़ों को बच्चों से अपने सलूक में तब्दीली की सीख भी अनजाने में मिली होगी। इधर, प्रधानमंत्री जी के बाद चुनौती यह भी है किस तरह सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों की तर्ज़ पर सुविधायुक्त और आकर्षण का केंद्र बनाया जाय। सभी बच्चों को सामान अवसर कैसे मिले। इस बार का शिक्षक दिवस इस लिहाज़ से भी शायद यह कह गया - नई सुबह के लिए माहौल बनाये रखिये। 

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प्राध्यापक, दिग्विजय कालेज, राजनांदगांव

MO.09301054300

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