बुधवार, 17 सितंबर 2014

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक समीक्षा
अंधेरे पर उजाले के जीत की दास्तां-''केरवस''
वीरेन्द्र 'सरल'
निराशा के घटाटोप अंधेरे के नेपथ्य में छिपी उम्मीद की एक किरण को तलाश कर जनमानस में आशावादिता का संचार कर देना ही साहित्य का धर्म और साहित्यकार का कर्म है। साहित्य सबका हित चाहता है। एक ओर जहां वह निर्बल के भीतर बल का संचार करता है वहीं दूसरी ओर सबल को आत्मचिन्तन के लिए प्रेरित करता है। साहित्य जहाँ अकर्मन्य को कर्त्तव्यनिष्ठा का पाठ पढ़ाता है, वहीं पथ से भटके पथिक को सही राह दिखाने के लिए शिक्षा की मशाल लेकर आगे-आगे चलता है

 
जैसे चिड़िया तिनका-तिनका जोड़कर इस उम्मीद से घोसला बनाती है कि उसमें नई पीढ़ी अपने आप को तैयार कर अपने बुलंद हौसलों के साथ खुले आसमान पर लम्बी उड़ान भर कर अपनी मंजिल को पा सके और सफलता के नये कीर्तिमान गढ़ सके ठीक वैसे ही साहित्यकार भावों के महीन धागे पर शब्दों के मोती गूँथकर एक ऐसा शब्द संसार रचता है जिसकी आभा से युवा पीढ़ी एक ऐसी दुनिया का सृजन कर सके जिसमें 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' और 'सर्वजन हिताय, बहुजन सुखाय' का स्वप्न साकार हो सके अर्थात एक सुखी और सन्तुष्ट समाज का निर्माण कर सके। छत्तीसगढ़ी और हिन्दी के ख्यातिलब्ध लेखक श्री मुकुंद कौशल की लेखनी से निसृत स्याही से बेहतर मनुष्य और मानव समाज के निर्माण के लक्ष्य को साधती हुई ऐसी ही कृति का जन्म हुआ है जिसे लेखक ने 'केरवस' का नाम दिया है। इस उपन्यास को गंभीरतपूर्वक पढ़ने के बाद इसे 'अंधेरे पर उजाले की जीत की दास्तां कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा।


मुकुंद कौशल साहित्य जगत में किसी परिचय के मोहताज नहीं है। कौशल जी का व्यक्तित्व बहुआयामी है, वे कभी एक निश्चित फ्रेम में बंधकर नहीं रहे बल्कि साहित्य की सभी विधाओं में समान रूप से अपनी लेखनी चलाकर साहित्यकोश में श्रीवृद्धि करते रहे हैं। वे हमेशा एक गीतकार, चिन्तक, विचारक और कवि के रूप में अपनी छवि बनाकर रखने में कामयाब रहे हैं। कौशल जी साहित्यिक गोष्ठियों में जहां अपने गभीर लेखों के माध्यम से श्रोताओं के मन को जीत लेते हैं वही कवि सम्मेलन के मंचो पर अपनी ओजस्वी कविता और तेजस्वी शैली से मुर्दो में भी प्राण फूंक देने का हुनर जानते है।

अभी-अभी प्रकाशित उनका उपन्यास 'केरवस' छत्तीसगढ़ी साहित्य को उनकी अमूल्य देन है। इस उपन्यास को एक व्यापक परिपेक्ष्य में लिखा गया है। जिसमें जीवन के विविध रंग उद्धृत है। इस कृति की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें अपनी भाषा की मिठास और माटी की सौंधी महक का समावेश तथा जीवन के इन्द्रधनुषी रंगो का आकर्षण है।

अंधियारपुर ग्राम के अंजोरपुर में बदलने की कथा को लेखक ने इस अंदाज में पिरोया है कि पाठक इस उपन्यास को पढ़ते हुए सम्मोहित हुए बिना नहीं रह सकता। कृति के माध्यम से लेखक का स्पष्ट संकेत है कि युवाओं की सकारात्मक सोच धर्य, शौर्य और साहस के साथ जब संगठित होकर समाज के सामने आता है तो बड़े से बड़े साम्रराज्य के सूर्यास्त होने में देर नहीं लगती। संगठित समाज की शक्ति किसी भी आततायी को धूल चटाने के लिए पर्याप्त है बशर्ते इसमें मातृशक्ति की समान भागीदारी हो। रमा मास्टरिन की भूमिका इस उपन्यास में इसी बात का संकेत है कि शिक्षित नारी ही वह आधारस्तंभ है जिस पर खुशहाल समाज अवलंबित रह सकता है। बालिका शिक्षा और समाज में बेटियों के महत्त्व को जिस शिद्दत से लेखक ने कृति में रेंखांकित किया है इसे मैं इस उपन्यास की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मानता हूँ।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि 'केरवस' कालिमा का प्रतीक अवश्य है पर यह उसका स्थायी स्वरूप नहीं है। श्रम, शिक्षा और संगठन की शक्ति से इस 'केरवस' को धोकर साफ किया जा सकता है। स्वार्थ के केरवस के साफ होते ही मानव हृदय की उज्जवलता और स्वस्थ तथा सुदृढ़ समाज की चमक से देश-दुनिया को आलोकित किया जा सकता है। इस उत्तम कृति के लिए लेखक को हार्दिक बधाई और उनकी लेखनी की निरन्तरता के लिए अशेष शुभकामनाएं-


वीरेन्द्र सरल
बोड़रा( मगरलोड़)
जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)
birendra.saral@gmail.com

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