बुधवार, 17 सितंबर 2014

वीरेन्द्र सरल का व्यंग्य - रावण की पीड़ा

रावण की पीड़ा

वीरेन्द्र सरल

अभी सुबह हुई ही थी। मैं बिस्तर छोड़कर बस मुँह धो ही रहा था। तभी भिक्षाम् देहि की आवाज सुनाई दी। सामने देखा तो एक बाबा जी खडे मुस्करा रहे थे। उसकी दाढ़ी घनी, श्वेत और लम्बी थी। वे श्वेत वसन धारी थे मगर श्वेत परिधान पर बहुत ज्यादा दाग धब्बे दिखाई दे रहे थे। कमल के समान मुख अभी कुम्हलाया हुआ था। हाथ आशीर्वाद की मुद्रा के बजाय भिक्षाम्देहि की मुद्रा में थे। मुझसे नजर मिलते ही उन्होंने कहा-''बच्चा तेरा कल्याण हो। तेरे मस्तक पर एक लेखक की लकीर दिख रही है। करकमल पर अदृश्य रूप से कलम शोभायमान है। तुम्हारी पाँचों अंगुलियां स्याही में है और सिर डायरी के पन्नों पर। तुम इतना अच्छा लिखते हो कि लोग उसे यह सोचकर नहीं पढ़ते, कहीं उनके पढ़ने से तुम्हारा लिखा खराब ना हो जाये ।''

प्रशंसा की आँच में तपकर मेरा चेहरा दमकने लगा और छोटा लेखक होने का भ्रम इस आँच में जलकर भस्मी भूत हो गया। मैं मन-ही-मन गाने लगा पल भर के लिये कोई मुझे बड़ा लेखक मान ले झूठा ही सही और मैंने सचमुच अपने आप को एक बड़ा लेखक मानकर खुशी-खुशी उसकी ओर दस रूपये का नोट बढ़ाया। मगर बाबाजी ने कहा-''बच्चा ये क्या है? भिक्षाम्देहि।'' अब की बार मैंने पचास का नोट उसकी ओर बढ़ाया पर उसने फिर वही कहा-''ये क्या है बच्चा? तुम्हारा कल्याण हो जायेगा।'' उसे उच्च क्वालिटी का बाबा समझकर इस बार मैंने सीधे सौ का नोट उसकी ओर बढ़ाया पर उसने क्रोधित होकर ऊँची आवाज में चीखा-''ये क्या कर रहे हो बच्चा, गड़बड़ करोगे तो तुम्हारा सर्वस्व कल्याण हो जायेगा, समझ गये । भिक्षाम्देहि।''

उसका रौद्र रूप देखकर मैं डर के मारे उसके चरणों पर दंडवत गिर पड़ा। मैंने हाथ जोड़कर रूआँसे स्वर में पूछा-''बाबाजी आप मुझे श्राप दे रहे है या आशीर्वाद, अभी तक मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ। आखिर आप भिक्षा में चाहते क्या है? स्पष्ट करने की महान कृपा करें नहीं तो डर के मारे मेरा हार्टफेल हो जायेगा।''

उसने मुझे उठने का इशारा करते हुये कहा-''बच्चा मैं तो बाबा हूँ। कागज के इन टुकड़ों को लेकर क्या करूँगा? आज तो भिक्षा में तुम मुझे सलाह दो, राय दो, मशविरा दो और मत दो ।

मेरी खोपड़ी घूम गई। दिमाग फ्यूज होते-होते बचा। मैंने कहा-''बाबा जी आप बड़ी रहस्यमयी बातें करते हैं। इधर आप भिक्षा भी माँगते हैं और उधर मत दो भी कहते हैं। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आपकी इन उल्टी-पुल्टी बातों का आखिर क्या मतलब निकालूँ।'' बाबाजी ने मुझे खा जाने वाली नजरों से घूर कर देखा तो मेरा दिमाग ठिकाने आ गया। मुझे ध्यान आया कि सामने चुनाव है। बाबाजी मत दो भी कह रहे हैं। बाबाजी के मत का मतलब कहीं वोट से तो नहीं है? मैंने विन्रमतापूर्वक कहा-''अच्छा तो हमारे बाबाजी चुनाव प्रचार के लिये आये हैं? अच्छा बाबाजी! आप किस दल से और किस क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं? दूसरी बात यह है कि यदि आप इस तरह अकेले-अकेले चुनाव प्रचार कर वोट माँगेंगे तो आप की तो जमानत जप्त हो जायेगी। आपके चेले चपाटे सब कहाँ हैं बाबाजी?''

मेरी बातें सुनकर बाबाजी का गुस्सा शेयर बाजार की तरह उछलने लगा था और मैं सोने के दाम की तरह धडाम से बस गिरने ही वाला था। तभी उन्होंने मुझे सम्हालते हुये कहा-''देखो बच्चा, मैं बड़ी मुसीबत में हूँ। इसलिये भिक्षा में आजकल सलाह माँग रहा हूँ। यदि तुम मुझे कुछ समय के लिये अपने घर में बैठने के लिये थोड़ी-सी जगह दे दो तो मैं तुमसे कुछ बात करना चाहता हूँ। मैं तत्काल स्वागतम् की मुद्रा अपनाते हुये उन्हें अपने बैठक कक्ष में ले आया और ससम्मान उनसे बैठने का निवेदन किया। यह सोचकर बाबाजी पर मेरी दिलचस्पी बढ़ गई थी कि सबको सलाह देने वाले और सबकी नैया पार लगाने का दावा करने वाले बाबाजी की नैया किस मंझधार में फँसी हुई है। वे मुझ अंकिचन से आखिर क्या सलाह लेना चाहते है? बाबाजी को सामने बैठाकर मैं एक जिज्ञासु भक्त की तरह उन्हें निहारने लगा ।

बाबाजी कुछ समय तक मौन रहकर शून्य में आँखें टिकाकर कुछ सोचने लगे। फिर अपना मुँह मेरे कान के पास लाकर फुसफुसाते हुये कहने लगे-''बच्चा! आज मैं अपनी असलियत और एक गूढ़ रहस्य तुम्हारे सामने प्रकट करने जा रहा हूँ। पर ध्यान रहे ये राज हम दोनों के बीच ही रहना चाहिये। यदि किसी तीसरे तक यह बात पहुँच गई तो समझ ले तेरा सर्वथा कल्याण हो ही जायेगा। शायद तुमने सुना होगा कि त्रेतायुग में श्रीराम ने वनवास के समय पंचवटी मे असली सीता को अग्नि प्रवेश कराकर छिपा दिया था और रावण ने साधु वेष में नकली को ही असली सीता समझकर उसका अपहरण किया था। अब तुम्हीं बताओ चार वेद, छै शास्त्र और अटठारह पुराण का ज्ञाता रावण क्या इतना नासमझ रहा होगा जो असली और नकली में भेद नहीं कर पाया होगा?'' मैंने कहा-''बाबाजी अब रावण भेद नहीं कर पाया तो इसमें मेरी क्या गलती है। इस झमेले में आप मुझे क्यों फँसाते हैं? और आपको भी इससे कोई मतलब नहीं होना चाहिये कि रावण नासमझ था या बुद्धिमान। बुजुर्ग लोग कहते है कि बीती ताहि बिसार के आगे की सुधि लेय।''

बाबाजी ने कहा-''मतलब है बेटे, मतलब है क्योंकि मैं ही वह रावण हूँ। यह सुनकर मेरी चीख निकलने ही वाली थी लेकिन उसने अपने हाथों से मेरा मुँह बंद कर दिया। मेरी चीख भीतर-ही-भीतर घुट कर रह गई। उसने मुझे धमकाते हुये कहा-''तुम्हें अपना कल्याण कराना ही है क्या? समझ में नहीं आया, ये रहस्य बताने से पहले मैंने तुमसे क्या कहा था? डरो नहीं वत्स, आराम से बैठो और मेरी बातें ध्यान से सुनो। विश्वास करो, मैं तुम्हारा किसी भी प्रकार से अहित नहीं करूँगा। मैं तो सिर्फ ये बता रहा था कि मुझे उसी समय पता चल गया था, सीता नकली है पर मैं श्रीराम के हाथों मरकर अपनी दुष्प्रवृत्तियों से मुक्त होना चाहता था। इसलिये मैंने सीता हरण किया। उन्हें अशोक वाटिका में सुरक्षित रखा। उनसे किसी भी प्रकार की बदतमीजी नहीं की। लेकिन जब युद्ध शुरू हुआ तो उसकी विभीषिका देख मेरे मन में प्राण भय पैदा हो गया। मैं अपने प्राण बचाने का उपाय ढूँढने लगा और चालाकी करते हुये मैंने भी युद्ध के मैदान में नकली रावण को भेज दिया जो श्रीराम के हाथों मारा गया। लोगों में खुशी की लहर छा गई कि रावण मारा गया।

अरे! मैं तो युद्ध के मैदान में गया ही नहीं था तो मेरे मरने का सवाल ही नहीं उठता। मरना तो दूर मुझे कहीं खरोच तक नहीं आई थी। मैं पूर्णतः सुरक्षित था। मैं अपनी चालाकी से मरने से बच तो गया पर भीतर-ही-भीतर डर रहा था कि कहीं श्रीराम की नजर फिर से कभी मुझ पर पड़ गई तो वे मुझे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे। इसलिये मैं इस समस्या का स्थायी समाधान सोचने लगा। बहुत सोच-विचार के बाद मैं अंतिम रूप से इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि श्रीराम साधु संतों के रक्षक हैं, यदि मैं भी सीता हरण के समय का साधु वेष फिर से धारण कर लूँ तो आसानी से बच सकता हूँ। बस मैंने वही किया साधुवेश धारणकर लंका से सुरक्षित बाहर निकल आया। वहाँ से निकलते हुये सब लोग मुझे देख रहे थे पर किसी ने पहचाना नहीं बल्कि बहुत से लोग मुझे असली संत समझकर मेरे पीछे-पीछे चलने लगे। आज करोड़ों लोग मेरे पीछे हैं औेर मैं बिल्कुल सुरक्षित हूँ।

अब मेरी मुख्य समस्या यह है कि जिस माया मंत्र से मैं अपना रूप बदलता हूँ अर्थात रावण से साधु और साधु से रावण। उस मंत्र को मैं भूल चुका हूँ। इसलिये चाहते हुये भी मैं फिर से अपने असली रूप में प्रकट नहीं हो पा रहा हूँ। मेरा स्वरूप जरूर बदल गया है पर मेरी प्रवृत्ति ज्यों-की-त्यों हैं। वही भोग की लिप्सा, एकछत्र राज्य की चाहत, दुनिया को अपने कदमों में झुकाने की कामना, सोने की लंका जैसी समृद्धि और वैभव पाने का लोभ, अपने आप को ही भगवान समझने का अंहकार। अब तुम्हीं बताओ, इन दुष्प्रवृत्तियों से मुक्त होने के लिये मैं क्या करूँ? मेरी आत्मा मुझे धिक्कारती है मेरा वेश देख लोग क्यों बेवजह मेरे झांसे में आ जाते हैं। क्यों अपना धन और समय मेरे कारण बर्बाद करते है। समय-समय पर मैं अपनी असलियत और अपनी पीड़ा व्यक्त करता भी हूँ तो वे इसे अंधश्रद्धा के कारण मेरी लीला और महानता समझते हैं। मैं उन्हें कैसे समझाऊँ कि वे जो मुझे समझते है वह मैं नहीं हूँ।''

''एकांत में बैठकर जब मैं सोचता हूँ तो मुझे बड़ी आत्मग्लानि होती है कि क्यों लोग केवल मेरा बाह्य स्वरूप ही देखते हैं? उनकी नजर मेरी दुष्प्रवृति पर क्यों नहीं पड़ती? काश! मुझे मेरा वह मंत्र याद आ जाये, जिससे मैं उनके सामने अपने असली रूप में प्रकट हो सकूँ तो इनकी श्रद्धा मुझ पर से टूट जाये। मैं बहुत व्यथित हूँ वत्स, बस मुझे मेरा वह माया मंत्र याद दिला दो, ताकि देश और समाज का भला हो सके। लोगों की दिव्य चक्षु खुल जाये, उन्हें असली और नकली में भेद करना आ जाये।'' यह सब बताते हुये रावण की आँखें भर आई थी और आँसू टपकने लगे थे।

उसकी बातें मैं दम साधे सुनता रहा। मैं स्वयं विस्मित हो गया था, आज इतना बड़ा रहस्योद्घाटन मेरे सामने हुआ था। मेरे मुँह से बोल नहीं फूट रहे थे। उसने कहा-''कहाँ खो गये वत्स, कुछ तो सलाह दो आखिर मैं करूँ तो क्या करूँ? मैं शर्म से डूबकर मर भी तो नहीं सकता क्योंकि मेरी नाभि में अमृतकुंड जो भरा है। बस, मुझे मेरा वह मंत्र याद दिला दो।'' रावण अपनी पीड़ा से छटपटा रहा था। जमाने भर का दर्द उसके चेहरे पर सिमट गया था।

मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं उसे क्या सलाह दूँ। मैंने विन्रमतापूर्वक कहा-''मुझे माफ कीजिये। जब तक आप कम-से-कम एक बार अपने असली रूप में प्रकट नहीं होंगे तब तक इस समस्या का समाधान होना संभव नहीं है ।''

उसने मुझे एक बार कातर दृष्टि से देखा और अपने भूले हुये माया मंत्र को याद दिलाने वाले किसी दूसरे व्यक्ति की तलाश में निकल पड़े

 

वीरेन्द्र सरल

बोड़रा (मगरलोड़)

पोष्ट-भोथीडीह

व्हाया-मगरलोड़

जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)

1 blogger-facebook:

  1. Bahut badhiya . Aaj sadhu ke bhesh mein anek rawan ghum rahe hai. Sara aakash unke attahash se gunj raha hai. Ab to wo sarv vyapi ho gaye lagte hai. Umda chitran birendra saral ji

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