सोमवार, 29 सितंबर 2014

सुरभि सक्सेना की लघुकथा - माफ़ी

माफ़ी
सुरभि सक्सेना

"ज़रूर मेरे ही प्रेम में कोई कमी रह गयी होगी तभी न इतनी वफ़ा और प्यार समर्पित करने के बाद भी तुमने दी तो बस बेवफाई, झूठ और दुःख .... जाओ देव जाओ .... एक बार और मैं तुम्हें माफ़ करती हूँ पर याद रखना की इस बार के बाद न तो तुम मुझे दोबारा देख पाओगे न सुन पाओगे न महसूस कर पाओगे !!! हाँ मैं ही ग़लत हूँ, क्योंकि मैंने ही एक ग़लत इंसान से ... हर बार ग़लत उम्मीदें लगाईं हैं - यह सारी बातें याद करते करते देव की आँखें छलक पड़ी !! अचानक, माँ की आहट पाते ही जल्दी जल्दी अपनी नम आँखों को साफ़ करते हुए देव ने कहाँ - ना जाने मेरी आँख में ये क्या पड़ गया .. उफ़ मैं अभी आया माँ !!
इतना कह कर देव कमरे से निकल कर खुले आँगन में निकल आया - जहाँ बैठ कर घंटों वो शुभी के साथ बातें, किया करता था और बातों बातों में जब लड़ाई हो जाती तो गुस्सा करके फ़ोन भी काट देता था, टेबल पर एक विस्की की बोतल और हाथ में गिलास ... ये कौन सा पैग था देव को याद ही नहीं ... याद है तो बस शुभी की.... देव को न जाने क्या हो गया था उसे अब शुभी की इतनी याद क्यों आ रही थी - उसकी बातें इतनी याद आती हैं जब वो साथ नहीं सामने नहीं पास नहीं !! ..

अरे तुम इतनी गलतियां करते ही क्यू हो , करने के बाद माफ़ी मांगने बैठ जाते हो देखो देव ये सब मुझे दुःख देता है अच्छा बाबा आज की बार माफ़ कर दो, फिर कभी नहीं होगा .... हाँ कभी नहीं होगा बस ये रोज़ रोज़ के तुम्हारे बहाने हैं .. देव कभी मुझे भी तो मौका दो ग़लती करने का, और मैं भी तो देखूं तुम्हारा दिल कितना बड़ा है ये कहकर खिलखिलाकर हंस देती शुभी और देव को भी हंसा देती, शुभी के चेहरे पर खिली भरपूर मुस्कान के साथ जैसे कोई बिजली चमकी तो यादो के भवंर से निकल कर देव ने देखा तो उसे मोबाइल की बजती रिंग सुनाई दी .... पर ये शुभी का फ़ोन नहीं था ... होता भी कैसे देव ने एक बार फिर शुभी को धोखा जो दिया था ...

देव ने हर बार की तरह इस बार भी शुभी के वापस आने का बहुत इंतज़ार किया मगर वो वापस नहीं आई ... शुभी जाते जाते बस इतना ही कह गयी देव आख़िर मैंने तुम्हे क्या नहीं दिया ... मैंने तुमसे इतना प्यार किया उसकी कीमत ये धोखा .... शराब जुआ और ये लड़कियों का शौक तुमको कहीं का नहीं छोड़ेगा देव .. तुम मेरे नहीं अपने साथ ग़लत कर रहे हो ... सुन रहे हो तुम देव मैं तुम्हारी हर ज्यादती बर्दास्त कर रही हूँ और भी कर सकती हूँ ... पर तुम जो ये धोखा बार बार देते हो ये अब और नहीं ... हाँ ये सब मेरे शौक है शुभी पर मैं प्यार तो बस तुमसे करता हूँ -- देव तो तुम अपना प्यार भी अपने शौक के साथ रखो और इतना कह कर शुभी चली गयी हमेशा के लिए !!!

देव फिर अपनी उसी बेमतलब, बेपरवाह ज़िन्दगी में उलझ गया ... जैसे मकड़ी के जाल में कोई मक्खी फंस गयी हो .... देव के पास न तो अब माफ़ी मांगने के लिए कोई था न माफ़ी देने के लिए ... थी तो बस एक घुटन भरी तनहा ज़िन्दगी जिसे देव ने अपने लिए खुद चुना था !!!! #Surabhi

#Surabhi Saxena

Geetkar , Actress, poetess, Radio jockey 

1 blogger-facebook:

  1. अच्छी सार्थक रचना जब बार बार गलती करने और
    माफ़ी मांगने की आदत पड़ जाये तो बेचारी शुभी क्या
    करती उसने देव को उसके हाल पर छोड़ ठीक ही
    तो किया

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------