शनिवार, 27 सितंबर 2014

राजकुमार यादव का आलेख - भारतीय भाषाओँ के माध्यम से शिक्षा के हितैषी अंग्रेज गवर्नर एल्फिंस्टन

भारतीय भाषाओँ के माध्यम से शिक्षा के हितैषी अंग्रेज गवर्नर एल्फिंस्टन

गौरतलब है कि चौहदवी सदी में अनेक यूरोपीय देश अपने-अपने व्यापार-व्यवसाय को विस्तारित करने के उद्देश्य से तथा अपने नए-नए उपनिवेशों को अन्य देशों में स्थापित करने को निकल रहे थे। इसी कड़ी में १४९८ में भारतवर्ष की खोज करने वाले वास्कोडिगामा के देश पुर्तगाल से पुर्तगालियों का तेरह जहाजों में १२०० यात्रियों से लदा–फदा सबसे पहला जत्था सन १५५० में भारत आया। इसके बाद सन १६०९ इंग्लैंड की ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारतवर्ष में पदार्पण किया। सबसे अंत में सन १६६४ में फ्रांस के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ कोल्बेयर ने भारतवर्ष में फ्रेंच ईस्ट इण्डिया कंपनी की स्थापना की थी। किन्तु तीनो यूरोपीय देशों की आपसी व्यापारिक एवं उपनिवेशिक प्रतिस्पर्धा में अंग्रेजो के समक्ष पुर्तगाली और फ़्रांसीसी भारतवर्ष में अपना दीर्घ काल तक प्रभुत्व जमाने में असफल रहे। लिहाजा उन्हें नए ठौर तलाशने पर विवश होना पड़ा था।

समय आगे बढता गया और धीरे-धीरे अठारवीं सदी के आते-आते अंग्रेज भी सम्पूर्ण भारतवर्ष में अपने पैर पसार चुके थे। गौरतलब है कि सन १८५७ में देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के क्रान्तिकारियों की बुलंद हुंकार को अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों ने बड़ी बेरहमी से दबाकर सम्पूर्ण भारतवर्ष को अपने आधिपत्य में लेने के पश्चात १ नव. १८५८ को भारत के शासन की बागडोर इग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के हाथों में चली गई थी। भारतीय शासन-व्यवस्था अंग्रेजों के अधीन हो जाने पर, अंग्रेजो के समक्ष यह बड़ी विकट समस्या थी कि – यहाँ के संसाधनों के दोहन और व्यापार-व्यवसाय के लिए कम्पनी में स्थानीय कर्मचारियों को रखने के लिए उन्हें किस भाषा में शिक्षित किया जाये। भाषा-संवाद और शिक्षा पद्धति को लेकर विद्वान लेखक स्व. एम्. आर. परांजपे के कथनानुसार सन १८२१ में तत्कालीन मद्रास के गवर्नर सर थामस मुनरो ने जो सर्वेक्षण करवाया था। उससे पता चला था कि मद्रास और उसके आसपास के क्षेत्र की सवा करोड़ जनसँख्या में ढाई लाख लोग विद्यालयों में पढ़ रहे थे। उस समय प्रत्येक गाँवों के मदरसों में अरबी, फारसी और उर्दू में शिक्षा दी जाती थी तथा पाठशालाओं और गुरुकुलों में संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओँ में इतिहास, गणित, विज्ञानं, विधि, तर्कशास्त्र एवं धर्म आदि विषय पढाये जाते थे और प्रशासनिक कार्यों के लिए मुगलकालीन फ़ारसी और उर्दू भाषा का प्रचलन था।

भारतवासियों को अंग्रेजी से शिक्षा दी जाये, यह विचार पहले-पहल सर चार्ल्स ग्रांट के मष्तिष्क में सन १७९२ में आया था। आगे चलकर सन १८६५ तक शिक्षा-पद्धति की भाषा को लेकर अथक मंथन चलता रहा। इस उलझन भरी कसमकस को सुलझाने में तत्कालीन लॉर्ड हेस्टिंग्स, मिन्टो, वार्डन, मुनरो, चार्ल्स ग्रांट, एल्फिंस्टन और मैकाले की अहम् भूमिकाएं थीं। इसमें लॉर्ड हेस्टिंग्स, मिन्टो, चार्ल्स ग्रांट, वार्डन और मैकाले अंग्रेजी भाषा पद्धति के प्रबल समर्थक थे। इसके विपरीत तत्काल्लीन मुंबई के गवर्नर एल्फिंस्टन ने १८२४ में अपना मत स्पष्ट करते हुए कहा था कि, यदि यूरोप के नए-नए ज्ञान को भारतीय जनता तक ले जाना है तो, यह कार्य यहाँ की जनता की आधुनिक भाषाओँ के माध्यम से ही किया सकता है। उन्होने पुरजोर शब्दों में इस बात पर भी बल दिया था कि – नैतिक और प्राकृतिक विज्ञानों की पुस्तकें भारत की आधुनिक भाषाओँ में तैयार करवाई जाएँ और उन्हीं भाषाओँ के माध्यम से भारत की जनता को शिक्षित किया जाए तथा जो लोग अंग्रेजी सीखकर यूरोपीय ज्ञान के सीधे संपर्क में आना चाहते हैं, उनके हित के लिए अंग्रेजी के स्कूल ख़ास तौर पर खोले जायें। किन्तु वार्डन, लॉर्ड हेस्टिंग्स, मिन्टो और मैकाले ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। वे भारतीय जनता के हितचिन्तक नहीं थे। उनका उद्देश्य तो मात्र भारत को बदलकर उसे नकली इंग्लिश्तान बनाना था।

प्रकांड विद्वान रामधारीसिंह दिनकर कथनानुसार एल्फिंस्टन उन थोड़े से अंग्रेजों में भी श्रेष्ठ थे, जिनका लक्ष्य भारत को आत्मनिर्भरता प्रदान कर उसे अपने पांवों पर खड़ा होने के योग्य बनाना था। इसी परिप्रेक्ष्य में माउंट स्टुअर्ट एल्फिंस्टन ने जनशिक्षा के लाभ के लिए सन १८२४, मुंबई में “बम्बई नेटिव एजुकेशन सोसायटी की स्थापना की थी।” उनके उत्कृष्ट विचारोंनुसार भारतीय जनता की मानसिक और नैतिक उन्नति के कार्य में अंग्रेजी का स्थान मात्र गौण ही नहीं है। अपितु भारत में पाश्चात्य ज्ञान का प्रचार-प्रसार केवल अंग्रेजी के माध्यम से होना असंभव भी है। एल्फिंस्टन की शिक्षा नीति के समर्थन में कैप्टन कैंडी का भी स्पष्ट कथन है कि – भारत के नैतिक और बौद्धिक विकास के लिए अंग्रेजी को आवश्यकता से अधिक महत्त्व देना व्यर्थ है। भारतीयों की शिक्षा क्रम में अंग्रेजी केवल विषय और विचार दे सकती है, किन्तु शिक्षा का माध्यम नहीं बन सकती। जिस भाषा के द्वारा जनता शिक्षित की जायेगी, वह भाषा जनता की मातृभाषा ही हो सकती है, अंग्रेजी नहीं। इसी भांति सन १९३८ में विलियम बेन्टिंग ने भी इसी मत का प्रतिपादन किया था। किन्तु इसे भारतवर्ष का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि वार्डन, हेस्टिंग, मिन्टो और मैकाले के समक्ष एल्फिंस्टन की नीति नहीं चल सकी। यदि वह चल गयी होती तो भारत उस कठिनाई में नहीं फंसता, जिसमे आज वह गिरफ्तार है। यह बड़े दुःख की बात है कि, मैकाले ने जिस नकली इंग्लिश्तान का निर्माण किया था, वह असली हिन्दुस्तान को आज भी दबाये हुए है और तब भी हम कहते है कि भारत स्वाधीन है।

 

राजकुमार यादव

ईमेल : rkysg5497@gamil

पता : डी-३७/२, आर. आर. केट कॉलोनी, इंदौर - ४५२०१३

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