शनिवार, 27 सितंबर 2014

राजकुमार यादव का आलेख - हिंदी और संस्कृत भाषाओँ के विकास पर कुछ बातें

हिंदी और संस्कृत भाषाओँ के विकास पर कुछ बातें

पलकें खुलीं, नजर पड़ी और अनायास जुबां पर स्पंदन होते ही स्वमेव शब्द का प्रस्फुटन हो जाता है। इन्हीं शब्दों के गठजोड़ से बने वाक्यों से विचार जन्मता है। विचारों को संकेतों, बोली अथवा लिखित रूप में प्रकट करने की अभिव्यक्ति को हम भाषा कहते हैं। बहरहाल भारतवर्ष में भाषा के उदभव की बात करें तो आदिकाल में सर्वप्रथम दो भाषाओँ का प्रादुर्भाव हुआ। सर्वप्रथम ऋषि-मुनियों ने देवगणों की वाणियों को वेद संहिताओं एवं पुराणों में संस्कृत भाषा में लिपिबद्ध किया । अतः यह देवभाषा कहलाई गई। इसी भांति आदिकाल में विन्ध्य प्रदेश दक्षिण भारत के आदिम नरभक्षी वनवासियों को शिक्षित करने के उद्देश्य से शिवजी ने अगस्त्य मुनि के समक्ष अपना डमरू बजाकर तमिल भाषा को उत्पन्न कर उन्हें इस भाषा के ज्ञान से दीक्षित किया था। अतः तदसमय अगस्त्य मुनि ने ‘अगस्त्य व्याकरण’ की रचना कर यहाँ के निवासियों को तमिल भाषा से आदर्श ज्ञान दिया था। दक्षिण भारत का समग्र संगम साहित्य तमिल भाषा से ही फलीभूत हुआ। गौरतलब है कि वर्तमान अफगानिस्तान के गांधार में ईसा से ५०० वर्ष पूर्व जन्मे महर्षि पाणिनि संस्कृत भाषा व्याकरण के प्रथम रचियता थे। जिन्होंने चार हजार सूत्रों को आठ अध्यायों में आबध्द कर अष्टाध्यायी नामक ग्रन्थ की रचना की थी। प्रकारांतर में तत्कालीन सम्पूर्ण भारतवर्ष के समग्र सामाजिक स्वरूप का रूपांकन विज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र, चिकित्सा एवं धर्मशास्त्रों के उदभट कीर्ति स्तंभों में आर्यभट्ट, पातंजलि, वराह मिहिर, चार्वाक एवं चाणक्य आदि के ज्ञान का प्रचार-प्रसार इसी भाषा के महात्म्य से प्रकटित हुआ।

यह कहना प्रासंगिक होगा कि देशकाल और प्रकृति-प्रदत्त परिस्थियों के अनुरूप जीवन-शैली के साथ-साथ भाषा-संस्कृति भी सदा विभिन्न अदभुद नए-नए आयामों में परिवर्तित होती रही है। यही कारण है कि सहस्त्रों वर्ष पूर्व के प्राचीन आर्य और द्रविड़ों की वैदिक भाषा से उपजी समस्त भारतीय भाषाएँ भी चरणबद्ध अनेकों आवर्तन लिए हुए हैं। यह अनोखा परिवर्तित स्वरूप १४०० ईसा पूर्व से लेकर सन १८०० तक का कालखंड चार चरणों - आदिकाल, रीतिकाल, भक्तिकाल एवं आधुनिक काल में विभाजित माना गया है। ईसा से ६०० वर्ष पूर्व मध्ययुग में महात्मा बुद्ध और महावीर जैन के उपदेशों में पाली और मागधी भाषाओं का प्राधान्य भी देखने को मिलता है। तदनंतर मध्यकाल के अलग-अलग राज्य खण्डों में विभिन्न भाषाओँ के विकसित रूप को शौरसेनी, ब्रज, मैथिलि, अवधि, कन्नौजी, भोजपुरी, मागधी, अर्द्ध-मागधी, पैशाची इत्यादि बोलियों के अपभ्रंश शब्दों के गठजोड़ को मिलाकर लिखी अथवा कही जाने वाली ‘प्राकृत’ भाषा का विकास हुआ। आधुनिक युग से पूर्व लगभग एक हजार वर्षों तक मुगलकाल में अरबी, उर्दू और फारसी का बोलबाला रहा। कालान्तर में आधुनिक उत्तर भारत की आर्य भाषाओँ में हिंदी, मराठी, गुजराती, एवं बंगला, उड़िया आदि भाषाओँ का विकास हुआ और आज भी निरंतर विकासरत है। इसी विकासक्रम में गुजरे २०० वर्षों के पड़ाव में आधुनिक हिंदी साहित्य के गद्य और पद्य सृजनता में विभिन्न विचारधाराओं का अदभुद विकास हुआ । जहां काव्य में इसे छायावादी युग, प्रगतिवादी युग, प्रयोगवादी युग और यथार्थवादी युग - इन चार नामों से जाना गया। वहीं गद्य में इसको भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, रामचंद‍ शुक्ल व प्रेमचंद युग तथा अद्यतन युग का नाम दिया गया । जिसमें हिन्दी साहित्य के आधुनिक इतिहास काल में १८५० से १९०० तक का कालखंड ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र युग’ माना जाता है ।

जब हम हिंदी भाषा की बात करते हैं तो - वर्तमान में हिंदी भाषा की ‘खड़ी बोली’ को परिष्कृत स्वरूप प्रदान करने का महानतम श्रेय सन १८८० में हिंदी साहित्य के पितामह ‘भारतेंदू’ की उपाधि से विभूषित साहित्यकार ‘हरिश्चंद्र’ को जाता है। भारतेन्दुजी आधुनिक हिंदी भाषा-शैली के मात्र प्रथम रचनाकार ही न थे, अपितु इसके साथ ही उनमें हिंदी, मराठी, गुजरती, पंजाबी, बंगला, उर्दू और अंग्रेजी आदि भाषाओ के ज्ञान से समृद्ध बहुआयामी विलक्षण प्रतिभा भी बेजोड़ थी। वे एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार के होने के साथ-साथ वे लेखक, कवि, संपादक, निबंधकार, एवं कुशल वक्ता भी थे । भारतेंदु हरिशंद्र का जन्म ९ सित, १८५० काशी में एवं निधन १८८५ में हुआ था। भारतेन्दु जी ने अपने मात्र ३५ वर्षों के जीवनकाल में ही विशाल हिंदी साहित्य की प्रत्येक विधा में लिखी रचनाओं का जिस उत्कृष्टता से रूपांकन किया, उससे उनका समूचा रचनाकर्म हिंदी साहित्यकरों के लिए पथ-प्रदर्शक बन गया। संभवतः इस युग प्रवर्तक की हिंदी के प्रति अमूल्य योगदान से ही जन-जन को जोड़ने वाली हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

 

राजकुमार यादव

ईमेल : rkysg5497@gamil

पता : डी-३७/२, आर. आर. केट कॉलोनी, इंदौर - ४५२०१३

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