चन्द्रकुमार जैन का आलेख - आज़ादी की खुशी और विभाजन के दर्द की दमदार कहानियाँ

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आज़ादी की खुशी और विभाजन के दर्द की दमदार कहानियाँ

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

चर्चित आलोचक आनन्‍द प्रकाश के सम्‍पादन में कथाकार मार्कण्‍डेय के वैचारि‍क लेखन की पुस्‍तक हि‍न्‍दी कहानी : यथार्थवादी नजरि‍या  प्रकाशि‍त हुई है। 2 मई 1930 को जन्‍मे कथाकार मार्कण्‍डेय अब संसार में नहीं हैं ,किन्तु उनकी इस पुस्तक की भूमिका को पढ़कर उनके वैचारिक तेज का स्पर्श किया जा सकता है -

1950 का दशक मार्कण्डेय के साहित्यिक व्यक्तित्व का निर्माणकाल कहा जा सकता है। इस दशक में मार्कण्डेय देशव्यापी परिवर्तनों के साक्षी बने जिनके दायरे में राजनीतिक मतों की टकराहट, सामाजिक उथल-पुथल, जाति-विभाजन की कड़वी सच्चाइयाँ, धर्म और संस्कृति की रूढ़ियों पर होनेवाले प्रहार तथा दूसरी तरफ परम्परा समर्थकों की एकबद्ध हिंसक प्रतिक्रिया आदि आते हैं। उस समय मार्कण्डेय युवा थे और अपने समवयस्कों से सहानुभूति और शक्ति ग्रहण करने के हामी थे, साथ ही, कुछ आदर्श और मूल्य भी अवश्य होंगे जिन्हें अपनाने और पाने का युवा मार्कण्डेय ने प्रयास किया, या कम-अज-कम सपना देखा। अचानक ही देश में ऐसा युवा वर्ग प्रकट हो गया था जो स्वतन्त्र विचार को तरजीह देता था और रूढ़ियों की काट करता था। असल में वैचारिक स्वतन्त्रता और रूढ़ि-विरोध मुख्य रूप से समाज-चिन्तन एवं साहित्य के विषय हैं और जो युवा वर्ग के माध्यम से जीवन में अपने लिये जगह बनाते हैं।

लेकिन युवा होने के साथ-साथ मार्कण्डेय अध्यवसायी थे। यह विचार और कथा की दुनिया में भूमिका-निर्वाह के लिए आवश्यक था। मार्कण्डेय न केवल अलग से विचारक और कथाकार थे, बल्कि विश्‍लेषण में प्रयोगशील भाषा और तर्कशीलता ले आते थे। यह जितना स्वयं मार्कण्डेय के लिए सही जान पड़ता है उतना ही उन पात्रों चरित्रों के बारे में भी कहा जा सकता है जिनका मार्कण्डेय ने अपनी रचनाओं में सृजन और गठन किया। उनके पात्र विचार में दिलचस्पी लेते हैं और अन्य के साथ बहस में उलझते हैं। फिर, जितना वे सहमत होना चाहते हैं, उतना ही असहमत होना भी जानते हैं। मार्कण्डेय का वैचारिक गद्य इस तथ्य का गवाह है। दूसरी ओर उनके यहाँ कहानी का गद्य बेहद तीखा, दिलचस्प, तर्कवान और व्याख्यापरक है।

लेकिन हम पाते हैं कि मार्कण्डेय पचास के दशक में, जो आजादी के बहुत करीब था, स्वाधीनता आन्दोलन और भारत की वर्तमानता के बीच लकीर खींच रहे थे। इससे यह दिखता है कि चाहने पर अवश्य मार्कण्डेय स्वाधीनता आन्दोलन और सामाजिक संघर्ष का हवाला देते हैं, लेकिन सामान्य प्रवृत्ति के स्तर पर उससे बचते हैं। कहानी का सन्दर्भ लेकर कहें तो वह किस्सागोई, जिसके लिए प्रेमचन्द मशहूर थे, मार्कण्डेय में न के बराबर है। बल्कि मार्कण्डेय किस्सागोई की आलोचना करते हैं। मार्कण्डेय प्रस्तुति की बात करते हैं, क्षण को बाकी से ऊपर रखते हैं, पात्रों की मानसिकता को उकेरते हैं, उनकी भावनाओं और अनुभूतियों का आन्तरिक तर्क  गढ़ते हैं, लेकिन घटनाओं को प्राय: कथा से बाहर एवं असंगत मानते हैं। क्या यह सही है और क्या अकारण ही मार्कण्डेय कथा की मूल गतिकी से अलग नहीं हो जाते? यह गम्भीर सवाल है। प्रस्तुत पुस्तक इस सवाल के बरक्स सक्रिय जिज्ञासा के तौर पर खड़ी नजर आती है।

पचास के दशक की पृष्ठभूमि में ब्रिटिश साम्राज्यवाद-विरोधी व्यापक आन्दोलन तो था ही जहाँ मनुष्य-मनुष्य के बीच बराबरी का रिश्ता, धर्म निरपेक्ष सोच एवं आधुनिक मानव-मूल्यों का महत्त्व प्रतिष्ठित था, लेकिन साथ ही निकट अतीत की साम्प्रदायिक हिंसा और विभाजन का गहरा अहसास भी था। दोनों चीजें परस्पर विपरीत थीं और इस विपरीत का सम्बन्ध भारतीय जीवन के अनेकानेक गलत-सही पक्षों से था। फिर भी जल्द ही, विशेषकर प्रथम आम चुनावों (1952) के बाद तत्कालीन समाज का ध्यान उन नीतियों की तरफ गया था जिनमें आर्थिक विकास का मुद्दा अहम् था। यह भी कहा जा सकता है कि आर्थिक विकास मात्र आर्थिक स्थिति को सम्बोधित न होकर अन्य वस्तुओं को जन्म देता है, या प्रभावित करता है। यह पचास के दशक में देखा जा सकता है—उस समय उत्साह का संचार था और विशेषकर देश का शहरी मध्यवर्ग प्रगति के सपने देखता था। लेकिन क्या उस समय प्रस्तावित प्रगति सामाजिक न्याय और बराबरी की अपेक्षा को उपयुक्त आधार देने में समर्थ थीं? मार्कण्डेय के विश्‍लेषण अथवा कथा-चित्रण इस सवाल पर निरन्तर रोशनी डालते हैं।

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