मंगलवार, 30 सितंबर 2014

राजीव आनंद की कहानी - दलित-हरिजन पैकेज

कहानी दलित-हरिजन पैकेज

विधानसभा चुनाव सर पर आ गया था․ नेताओं को अपने-अपने पार्टी हाईकमानों से गाँव दौरा का निर्देश मिल चुका था जिसमें शामिल था ‘दलित-हरिजन पैकेज'․

चुनाव के समय ही गाँवों के दिन फिरते है जब नेता लोग गाँव की रूख करते है वरना तो गाँव आधारित फिल्‍मों और धरावाहिकों के सीडी से ही नेता लोग काम चला लेते हैं․ खैर फिलहाल तो पवन पांडेय उर्फ पीपी को अपने विधानसभा क्षेत्र के गाँवों में जाकर दलित-हरिजन पैकेज पर काम करना था․ पीपी वैसे हैं तो छुटभैया नेता पर अपने को तोप से कम नहीं समझते हालांकि बीस सालों से पार्टी के बड़े नेताओं की चापलूसी करते आ रहे है पर विधायक या सांसद का टिकट तो दूर की बात है, नगरपालिका चुनाव के लिए भी टिकट हासिल करने में सफल नहीं हो सके हैं․ इस बार का विधानसभा चुनाव में अपने खालीश चापलूसी की पूंछ हिलाते-हिलाते टिकट तो हासिल कर लिया पीपी ने लेकिन दलित-हरिजन पैकेज पर गाँव जाकर कार्य करना अग्‍निपरीक्षा की तरह लग रहा था उसे․

बहरहाल पीपी अपने प्रिय चमचा दामोदर रजक उर्फ डीआर को लेकर विधानसभा क्षेत्रा के सभी गाँवों में जाने की योजना बना लिये थे․ डीआर पिछले पांच सालों से राजनीति के अखाड़े में दंड पेल रहा था और पीपी को तेल लगा रहा था․ डीआर शहर, गाँव से ही आया था लेकिन पांच सालों में उसे शहर की वो हवा लगी कि गाँव के प्रति घनघोर वितृष्‍णा रखता था․ पीपी की गाँव जाने की योजना सुनकर डीआर कहने लगा था कि मुझे समझ में नहीं आता पीपी भैया कि इंटरनेट ने जमाने को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया, लोग चाँद और मंगल पर घर बनाने की कवायद कर रहे हैं और हमारी पार्टी है कि दलित-हरिजन पैकेज बना रही है․

अरे डीआर जितना भेजा है उतना ही इस्‍तेमाल कर, हमरा तो गाँव तभीए छुट गया था जब हम पार्टी जोन (ज्‍वाइन) किए थे․ अब पार्टी का पैकेज है तो उसपर तो काम करना ही पड़ेगा․तुमको पता भी है डीआर कि संसद भले दिल्‍ली में हो पर वहाँ तक पहुँचने का कच्‍चा रास्‍ता गाँव-देहात होकर ही जाता है इसलिए कल भोर तुम्‍हारे गाँव ‘फुसरीटांड़' चलेंगे वहीं से दलित-हरिजन पैकेज पर कार्य शुरू किया जायेगा․ हाँ साथ में लैपटॉपवा लेना नहीं भूलना, गाँव के अनपढ़वेन को लैपटॉपवा दिखा-दिखा कर और माउसुआ घुमा-घुमा कर चमकावेंगे, तभीए देहतीअन को पता चलेगा कि बेज्ञान, (विज्ञान) कहाँ से कहाँ पहुँच गया है․ जी, ठीक है पीपी भैया․

भोर में दोनों मारूती भान से ‘फुसरीटांड़' गाँव के लिए रवाना हो गए और जब वे गाँव पहुँचे तो फुसरीटांड़ निवासी मारूती भान के चारो तरफ भीड़ लगा दिए․ गाँव का मुखिया धरनी साव डीआर को पहचानने की कोशिश करता रहा, डीआर ने पूछा, काहे हमको घूर रहे हो भाई ? मुखिया अब डीआर को पहचान गया था, अरे भाईयों, ये तो हमरे गाँव की फेकनी धोबिन का बेटवा है रे, काया ही पलट गया है इसका, चार-पांच साल शहर में क्‍या रहा, पूरे शहरी हो गया है․ डीआर कभी पीपी को देखता रहा कभी मुखिया ध्‍रनी साव को․ पीपी भी मुँह खोले डीआर का वंशावली सुन रहा था और भीतर से खुश भी हो रहा था कि अब इस गाँव में दलित-हरिजन पैकेज पर कार्य करना आसान हो जाएगा जिससे पैकेज का अपना हिस्‍सा आसानी से गटका जा सकता है․ हाथ पकड़ कर पीपी ने मुखिया से पूछा था कि यहाँ दास जाति के कितने घर हैं ? मुखिया थोड़ी देर चुप रहा फिर तपाक से बोला लगभग पच्‍चीस घर होगा, नेताजी․ चलिए ले चलिए मुझे दास बस्‍ती में, पीपी ने मुखिया को लगभग आदेश सा दिया था․

डीआर अंदर ही अंदर सुलगते हुए कहा कि काहे पीपी भैया, हमारी धोबी जाति दास से कहीं उपर है, दास लोग हरिजन है जबकि हमलोग दलित, तो दलित-हरिजन पैकेज हमारे यहाँ से काहे नहीं शुरू करते ?

अरे डीआर इसिलिए हम कहते है न कि तुम अभी तक नेता नहीं बन सका है, रहेगा साला चमचा का चमचा ही․ तुमको समझ में नहीं आता है डीआर हम नेता लोग जात-पात से उपर उठे हुए लोग हैं․ हमारे लिए क्‍या दास और क्‍या रजक, लेकिन तुम तो हमें उंची-नीची जाति बतलाने लगा रे․ खैर इसमें कोई मुसीबत नहीं है, चलो तुम्‍हारे यहाँ से ही पैकेज की शुरूआत किए देते है․

पीपी-डीआर आगे-आगे और पीछे-पीछे गाँव की भीड़․ डीआर एक घर के सामने ठीठका, कई सालों बाद आने के कारण उसे फूस का अपना घर पहचान में ही नहीं आ रहा था, सामने बरामदा जहाँ एक खटिया पड़ा था जिसपर लाश की तरह एक गेंदरा पड़ा था․ गेंदरा को डीआर जल्‍दी से हटाकर पीपी को बैठने का कहा, भैया यहीं पर बैठो․ डीआर की माँ फेकनी धेबिन अपने उम्र से कहीं ज्‍यादा उम्रदराज, गरीबी ने अपना काम फेंकनी पर कर दिया था, हो-हल्‍ला सुनकर बाहर आयी और देखकर हतप्रभ रह गयी, बोली अरे दमोदरा किसे साथ लेकर आ गया है रे ?

अगे माइ, ये पीपी साहेब है, बहुत बड़े नेता, तुमसे मिलने और कुछ बात करने आएं हैं, चुनाव आने वाले हैं न, बोट इन्‍हें ही देना․

तब तक पीपी तैयार हो चुके थे पैकेज की बात करने के लिए․ पीपी ने कहा माँ जी हम समझाते है आपको विस्‍तार से․ देखिए माँ जी हमरी पार्टी है न, उसके मन में दलित और हरिजन लोगों के लिए बड़ा हमदर्दी और दया भरा हुआ है, तभीए तो हमलोग शहर से आप सभी का हाल-चाल पूछने चले आयें हैं․

लेकिन बेटवा, फेंकनी ने कहा, याद तो हमरी इलेक्‍शनवे के समय आयी न ? इतने में डीआर की पत्‍नी बासमतीया भी अपने बिछुड़े पति से मिलने बाहर चली आयी․ डीआर अपनी पत्‍नी को गाँव में ही छोड़कर शहर गया था क्‍योंकि उसे शहर में रखने में काफी खर्च होता इसलिए उसे गाँव में ही छोड़ गया था․ खर्च तो बहाना था, शहर में डीआर बेचलर की तरह ही रहना चाहता था जिससे इधर-उधर मुँह मारने में कोई रोकने-टोकने वाला न हो․ खैर डीआर की पत्‍नी का जैसा नाम वैसा रूपरंग था बिल्‍कुल बासमती चावल की तरह इकहरी वदन की, साँवला रंग रूप, कपड़ा धेते रहने के कारण पैर और हाथ की उंगलियों में पानी लग गया था पर कोई भी देखकर बासमतीया को साँवली खुबसूरत औरत ही कहेगा․ पीपी बसमतीया को पोस्‍टमार्टमी नजर से देख रहा था, साँवला इकहरा गठा वदन और भरी-भरी छातियाँ․ पीपी से रहा नहीं गया, अरे डीआर, उसने कहा, तोहरी पत्‍नी तो बालीउड की अच्‍छी-अच्‍छी हिरोइन को मात देने वाली है, रे․․․․हा, हा, हा कर पान से सनी लाल दांतों को दिखाता हुआ, बसमतीया की तरफ मुखातिब हुआ था․ पहली बार डीआर को एहसास हुआ कि पत्‍नी पर बुरी नजर डालने से पति को कैसी तिलमिलाहट होती है․ डीआर अपनी पत्‍नी को कहा काहे वास्‍ते भकलोल की तरह मुँह उठाए खड़ी हो, जा जाकर नेताजी के लिए चाय-नाश्‍ता लाओ․ बसमतीया नजरें नीचे झुकाए अंदर चली गयी थी․ हाँ तो माँ जी बताइए आपलोगों को क्‍या-क्‍या तकलीफ है ? पीपी ने बात शुरू की․ बस हुजूर, फेंकनी ने कहा, दो टेम का दाल-रोटी और किरासन तेल का इंतजाम हो जाता तो हम सब निहाल हो जाते․

अरे डीआर, चुपचाप काहे खड़ा है रे, तुमरा घर है तो क्‍या, पैकेज तो देना है, नोट कर माँ जी की बात को लैपटॉपवा के दलित पैकेज फाइल में․

डीआर सोच रहा था कि रास्‍ते में पीपी ने लैपटॉपवा पर जो डिरामा करने की बात कही थी अब वह अपनी माँ और पत्‍नी को उल्‍लू कैसे बनाए․ इसलिए डीआर ने सचमुच का दलित पैकेज फाइल में अपनी माँ की शिकायत नोट कर लिया था․

ठीक है माँ जी, पीपी ने डीआर की माँ को कहते हुए उठ खड़ा हुआ था, खटिया के चिंचियाने से पीपी चौंका था, डीआर खिसियानी हँसी हँसते हुए कहा था, ससुरी पूरानी हो गई है, अबकी बार आयेंगे तो नयी कॉट लेते आयेंगे․ दोनों हँसते हुए घर से बाहर निकल गये, पीपी एक पूरानी फिल्‍मी धुन ‘दिल ले गयी रे धोबिनिया रामा कैसा जादू डाल के' गुनगुनाते हुए बाहर आ गये थे․ फुसरीटांड़ निवासी फिर उन दोनों के पीछे हो लिए․ अब दास टोला चलना है, डीआर, किधर है बताओ, पीपी ने पूछा था․

डीआर थोड़ा गर्व से बता रहा था, भैया फुसरीटांड़ में कोई दास टोला नहीं है यहाँ तो डोमटोली' है, जिसका प्रधान गुही तूरी है, चलिए गुही तूरी से मिलते हैपीपी और डीआर गुही तूरी के घर पहॅुंचे, गुही अपने मिट्‌टी के घर की चारदीवारी पर बैठा बाँसूरी पर एक पूरानी फिल्‍मी धुन बोले रे पपीहा रे' बजा रहा थाडीआर को देखते ही गुही बाँसुरी बजाना छोड़ खड़ा हो गया था, डीआर ने पीपी को बताया कि यही गुही तूरी हैकैसे हो गुही भाई, लपकर पीपी ने उसे गले लगाना चाहा, गुही नेताओं के गिरगिटिया रंग को समझते हुए अनमने ढ़ंग से गले लगा, तब तक जिज्ञासावश गुही की पत्‍नी शिलवा भी वहाँ आ गयी थीघुटने तक की साड़ी पहनी भरे-भरे वदन की शिलवा की तरफ नमस्‍ते करते हुए पीपी ज्‍यों ही बढ़ा था कि उसने नमस्‍ते का बिना जबाव दिए ही वहाँ से ऐसे भाग खड़ी हुई मानो उसने कोई शिकारी कुत्‍ते को देख लिया हो

हाँ तो गुही भाई, क्‍या-कया समस्‍याएं है डोमटोली में, हमको विस्‍तार से बतलाओ क्‍योंकि हम सब पार्टी की ओर से दलित-हरिजन पैकेज पर काम कर रहें हैं․

गुही खखारते हुए कहा, नेताजी एक ठो समस्‍या रहे तो न, यहाँ तो समस्‍या ही समस्‍या है․

मनरेगा में काम नहीं मिलता ? पीपी ने पूछा था․

काम नहीए के बराबर मिलता है, ज्‍यादातर काम कागजे पर होता है․ गुही हाथ के इशारे से पीपी को दिखाया, वो देखिए नेताजी वहाँ जो गडढ़ा दिख रहा है न, वह मनरेगा का पोखर है जिसमें तनको पानी नहीं रहता है․ पूरा धांधली है नेताजी․ उपर से नीचे तक सब बंदरबांट करते हैं․

डीआर लैपटॉपवा में हरिजन पैकेज फाइल में गुही तूरी की शिकायत और समस्‍या नोट करो․

तब तक शिलवा मट्‌टी से मल-मल कर नहा-धेआ कर बढि़या पीला रंग का साड़ी पहन कर फिर आ गयी थी․ पीपी की पोस्‍टमार्टमी नजर शिलवा पर टिक गयी थी, वह धीरे से डीआर को बोला, अरे डीआर, यहाँ समस्‍या ही समस्‍या है पर डोमटोली की औरतें इतनी तंदरूस्‍त कैसे लगती है रे ? गदराया बदन, भरी-भरी छातियाँ, एक रूपए किलो चावल खा-खा कर बना है न, सरकार तो महिलाओं के लिए बरदान साबित हुई है रे डीआर․

डीआर गाँव के बारे में बताते हुए कहा कि उ बात नहीं है नेताजी, खाने को जो भी कोदो, मडुवा मिलता है, उसे खाकर दिनभर काम करती है ये औरतें, इसलिए बदन में चर्बी नहीं चढ़ता․

ठीक है ठीक है, डीआर, अब चलो, पीपी ने उक्‍ता कर कहा, शहर जाकर बीडियो, सीडी भी बनवाना है और आज के आज ही हाईकमान को दलित-हरिजन पैकेज का रिपोर्ट भी भेजना है। कल फिर किसी दूसरे गाँव का दौरा करेंगे․

‘फुसरीटांड़ दौरा' का वीडियो सीडी बनवा कर तथा अखबार-पत्रिकाओं में रिपोर्ट छपवाकर पार्टी हाईकामन को पीपी ने भेज दिया था․ किरासन तेल और दो-वक्‍त के भोजन के लिए पार्टी ने सरकारी मद से करोड़ो मुहैया करा दिये थे और निर्देश भी दिया था कि दलित-हरिजन लोगों को चावल, दाल और किरासन तेल वितरित करवा दिया जाएं․ पीपी और डीआर ने मिलकर कागजों पर चावल, दाल और किरासन तेल का वितरण फुसरीटांड़ में करवा दिया था․

 

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंडा

गिरिडीह-815301

झारखंड

1 blogger-facebook:

  1. ये तो कहानी नहीं हकीकत है राजीव भाई एक
    चिरंतन सत्य को बिना लाग लपेट पेश्कारने का
    आपका प्रयास सराहनीय है बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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