मंगलवार, 30 सितंबर 2014

गीता दुबे की कहानी - आतिफ हुसैन से अखिलेश साहू

 

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गीता दुबे

कहानी -

आतिफ हुसैन से अखिलेश साहू

 

“हलो तिवारी जी, जमशेदपुर से हरीश शुक्ला बोल रहा हूँ।”

‘हाँ सर कहिए, क्या सेवा कर सकता हूँ’---- उधर से तिवारी जी ने जवाब में कहा।

“कल स्टील एक्सप्रेस से हावड़ा पहुँच रहा हूँ, गाड़ी चाहिए थी।”

‘ठीक है,मिल जाएगी,कौन सी गाड़ी लेंगे?’

“इस बार बड़ी गाड़ी इनोवा दीजीएगा, हम छह लोग हैं”

‘ठीक है सर, लेकिन आप हावड़ा उतरने के बजाए पहले वाली स्टेशन ‘संतरागाछी’ उतर जाइयेगा, वहीँ से हमारा ड्राइवर आपको पिक कर लेगा। हावड़ा में गाड़ी को लाइन पर आते-आते काफी समय लग जाता है। मैं इनोवा का नंबर और ड्राइवर का मोबाईल नंबर SMS कर देता हूँ’ कहकर तिवारी जी ने फोन रख दिया।

कोलकाता में तिवारी जी की करीब एक दर्जन गाड़ियाँ चलतीं हैं। मिर्जापुर से रोजगार की तलाश में तिवारी जी कोलकाता आये थे। रोजगार न मिलने पर उन्होंने मारुती800 खरीदी और खुद ही ड्राइवर बन कोलकाता में गाड़ी चलाने का काम करने लगे। और आज पैंतीस वर्ष बाद तिवारी जी के पास सभी तरह की गाड़ियाँ इनोवा, इंडिका, ऐम्बेसडर, टवेरा, इंडिगो....... करीब एक दर्जन से भी ज्यादा गाड़ियाँ हैं, ड्राइवर हैं। बासठ वर्षीय तिवारी जी अब घर पर ही रहते हैं और फोन से ही अपना कारोबार सँभालते हैं। हरीश जब भी कोलकाता आते हैं तिवारी जी की ही गाड़ी लेते हैं। हरीश शुक्ला घूमने के शौक़ीन हैं। यात्रा के दौरान भांति-भांति के लोगों से मिलना, भांति-भांति की संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान के बारे में जानना वे पसंद करते हैं। पति-पत्नी दोनों कमाऊ हैं, अच्छी-खासी आमदनी है। आमदनी का कुछ भाग वे अपनी शौक पूरा करने में खर्च करते हैं और साल में एक बार कहीं न कहीं यात्रा पर परिवार सहित निकल ही जाते हैं। लेकिन इस छुट्टी में उन्होंने सोचा कि माँ-बाबूजी की अब उम्र हो चली है, पता नहीं कब......क्यूँ न इन्हें तीर्थ करवा दूँ! और उन्होंने परिवार सहित गंगा-सागर जाने का प्लान बना डाला।

अगली सुबह निर्धारित समय पर ट्रेन ‘सान्तारागाछी’ पहुँच गई और बड़ी आसानी से शुक्ला जी ने ‘इनोवा’ और ‘ड्राइवर’ दोनों ढूंढ लिया। होटल पहुँच कर उन्होंने ड्राइवर को अगली सुबह भोर चार बजे गंगा-सागर के लिए बुला लिया। हरीश शुक्ला जी चार बजे भोर में  अपने माता-पिता, पत्नी और दोनों बच्चों के साथ इनोवा पर सवार होकर गंगा सागर के लिए निकल पड़े। खुद ड्राइवर की बगलवाली सीट पर इतमीनान होकर बैठ गये और लगे ड्राइवर से बतियाने,

‘तब कितने दिनों से कोलकाता में गाड़ी चला रहे हो’?

“बहुत दिन हो गये साहब, बीस साल से ज्यादा हो गये होंगे।”

‘कहाँ के रहने वाले हो?’

“गिरीडीह” साहब

‘अरे तो तुम तो अपने ही तरफ के निकले झारखंडी, हम जमशेदपुर से हैं’ और फिर दोनों हंसने लगे। साथ- साथ पीछे बैठे हरीश शुक्ला के माँ, बाबूजी, पत्नी और दोनों बच्चे भी मुस्कुराने लगे। शुक्ला जी फिर शुरू हो गये।

‘तब घर में कौन-कौन है?’

‘सभी हैं साहब, माँ, बाप, भाई, बच्चे और घरवाली लेकिन....

‘लेकिन क्या?’ शुक्ला जी ने उत्सुकता वश पूछा।

‘सब गिरिडीह में रहते हैं’

‘क्यों यहाँ परिवार क्यों नहीं लाये’

‘नहीं साहब हमारा काम ही ऐसा है। कभी-कभी हफ्ता-हफ्ता गाड़ी लेकर बाहर रहना पड़ता है। ऐसे में परिवार को कौन देखेगा... ठीक है गाँव पर माँ-बाप हैं, देखने के लिए।

‘तब तो गिरिडीह हमेशा जाते होगे’

‘हाँ साहब’...........

इसी तरह शुक्ला जी और ड्राइवर के बीच बातें होतीं रहीं, पीछे बैठे सभी लोग भी उनकी बातों का आनंद लेते रहे और रास्ते का पता ही नहीं चला, गंगा-सागर घाट आ गया। सभी गाड़ी से उतरने लगे। शुक्ला जी की माता को घुटने में हमेशा दर्द रहता  है। वह काफी संभल-संभल कर उतर रहीं थीं लेकिन फिर भी उनका पैर मुचक गया और वह जैसे ही गिरने को हुईं ड्राइवर जो कि वहीँ खड़ा था, लपका और उन्हें सहारा देकर गिरने से बचा लिया। ड्राइवर को पैसे देते वक्त शुक्ला जी ने उससे कहा-----‘चलो अच्छा लगा तुमसे बातें कर... अरे लेकिन मैंने तो अभी तक तुमसे तुम्हारा नाम नहीं पूछा, क्या नाम है तुम्हारा?

“आतिफ हुसैन” साहब

शुक्ला जी की माता ने जैसे ही उसके नाम सुने शुक्ला जी पर बिगड़ गईं,जोर जोर से कहने लगीं---‘ अरे बबुआ हम त अशुद्ध हो गईनी... उ मुसलमनवा हमरा के छू देलस..... उ काहे के छुअलस ह....., उ कुजात ....( मुझे उस मुस्लमान ने छू दिया, अब मैं तो अशुध्द हो गई)

शुक्ला जी अपनी माता पर खीजते हुए बोले ----‘ये क्या बक रही हो माँ, उसने तो तुम्हे बचाया नहीं, तुम बड़ी जोर से गिर पड़ती, पैर टूट जाते तुम्हारे’ लेकिन उनकी माता सुनने वाली न थीं, वह बोले जा रहीं थीं।

फिर शुक्ला जी ने कहा---‘गंगा जी में डुबकी लगा लेने पर सब-कुछ शुद्ध हो जाता है।

‘काहे के बबुआ, अबकी त हम ना डुबकी लगाइब, गंगा मईया खिसिया जाईहें। घरे जाईब सतनारायण जी के पूजा करवाईब तब ही गंगा मईया मनीहें।’ (इस बार मैं गंगाजी में डूबकी नहीं लगाउंगी गंगा माँ नाराज हो जाएँगी, घर जाकर सत्यनारायण जी का पूजा करवाऊंगी तब ही गंगा माता खुश होंगीं।)

ड्राइवर आतिफ हुसैन ने जैसे ही यह सब सुना वहाँ से ओझल हो गया।

इस घटना को हुए पूरे छह साल बीत चुके थे। इस बार शुक्ला जी अपने दोनों बच्चो और पत्नी के साथ केरल घूमने जा रहे थे। जमशेदपुर से कोलकाता, फिर कोलकाता से बैंगलोर की उनकी फ्लाईट थी। उन्होंने तिवारी जी से फोन कर हावड़ा इंडिका गाड़ी भेज देने के लिए कह दिया था। शुक्ला जी के कहेनुसार तिवारी जी ने इंडिका गाड़ी हावड़ा भेज दी थी। हावड़ा पहुंचकर शुक्ला जी इंडिका में बैठ चुके थे। खुद आदतन ड्राइवर की बगलवाली सीट पर जा बैठे और पत्नी एवं दोनों बच्चे पीछे वाली सीट पर। इंडिका कार अब ‘नेताजी सुभाष चन्द्र बोस हवाई अड्डा’ की तरफ बढ़ रही थी। ड्राइवर ने तो शुक्ला जी को पहचान लिया, शुक्ला जी ड्राइवर को पहचान पाए कि नहीं पता नहीं। शुक्ला जी ने फिर ड्राइवर से बतियाना शुरू किया।

‘क्यों तुम्हारा क्या ख्याल है, नरेंद्र मोदी के आने से क्या सचमुच हमारे अच्छे दिन आने वाले है?’

ड्राइवर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया -----‘क्यों नहीं साहब, अच्छे दिन तो अवश्य आयेंगे। कमल खिल चुका है।’

शुक्ला जी ने भी मुस्कुराते हुए कहा---‘अच्छा तो तुम भी मोदी सपोर्टर निकले।’

कुछ ही देर में वे नेताजी सुभाषचंद्र बोस कोलकाता एअरपोर्ट पहुँच चुके थे। शुक्ला जी ने ड्राइवर को पैसे देते हुए कहा----‘अरे भाई हमने तुमसे इतनी बातें कीं लेकिन तुम्हारा नाम नहीं पूछा। ‘क्या नाम है तुम्हारा’?

‘अखिलेश साहू’ साहब। कुछ रूककर फिर उसने पूछा ‘माँ जी इस बार साथ नहीं आई?’

हरीश शुक्ला की आखें उस ड्राइवर को बड़े गौर से देख रहीं थीं शायद उनकी आखें उस ड्राइवर को पहचानना चाह रहीं थीं

 

गीता दुबे, जमशेदपुर

झारखण्ड

1 blogger-facebook:

  1. सुन्दर कहानी अच्छा है जो समय के साथ साथ सब
    भ्रांतियों की दीवारें ढहती जा रहीं जो लगभग सभी के लिए असह्य हो चली जिस ड्राइवर ने माँ जीको गिरने
    से बचाया नाम जानकर उन्होंने ही उसका अपमान किया इससे ज्यादा पीड़ा की बात क्या हो सकती है
    गीताजी बधाई

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