सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

दामोदर लाल जांगिड़ का व्यंग्य - सठियाए साहित्यकार

सठियाये साहित्यकार

सठियाना आदमी की ज़िन्दगी का एक जरूरी दौर है। अपनी सरकार भी तो साठ पूरा होते होते बिना एक दिन की भी जोखिम उठाए घर भेज देती है । अमूमन इन साठ पार सठिया गये लोगों को हमारी स्थानीय भाषा में ‘ साठिया बन्नाठिया ’ कहते हैं और इनकी बातों,हरकतों व यहां तक कि इनके राय मशवरों को भी और तो और इनके खुद घर वाले भी आया गया कर देना ही मुनासिब समझते हैं। इनको कहीं भी कोई भाव नहीं दिया जाता । कभी कभार अगर कोई सठियायी सरकारें किन्ही सठियाए सेवानिवृतों को यदि सरकारी आयोगों के अध्यक्ष आदि बना देती हैं तो उस आयोग की तो खैर ही नहीं या तो आयोग की रिपोर्ट समय रहते आती ही नहीं हैं और देर सवेर आ भी जाती है तो किसी के भी काम की नहीं होती ।

गनीमत है कि सरकार तो अपने अंग्रेजों के ज़माने के बने कड़े नियमों का हवाला दे कर अपने कर्मचारियों को साठ का होते होते ही अलविदा कह देती हैं मगर यह साहित्य का क्षेत्र तो बिना मालिकों का मेड़ विहीन खेत हैं,जहां कोई भी रोकने टोकने वाला नहीं,बस सींग उठा कर घुसो और चरते जाओ ,चरते जाओ । इस क्षेत्र में घुसने वालों के लिए वैसे भी कोई न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता,किसी डिग्री ,डिप्लोमा की कतई कोई जरूरत नहीं होती ,जिसने जब जो चाहा,बस रगड़ दिया,सांठ गांठ से छप भी लिए और मान लिया खुद को साहित्यकार । अगर किसी ने भी इनके साहित्यकार होने पर शक किया और लेखन में कोई मीनमेख निकाली तो उस पर लट्ठ लेकर चढ़ दौड़ते हैं। ये जो कुछ भी जैसा भी लिखते हैं वो अपने आप को एक वरिष्ठ साहित्यकार मान कर के ही लिखते हैं और इनकी भाषा व लेखन में भी सारी साहित्यिक जिम्मेदारियों का समूचा भार अकेले इनके ही बूढ़े कन्धों पर स्पष्ट दृष्टिगोचर होता हैं,कई कई तो इस दुःख के कारण दुबले भी पड़ जाते हैं । इस स्थिति को प्राप्त होने पर इनके लिखने की गति भी एकाएक ही बढ़ जाती है ,कारण इनको यह डर सताने लग जाता होगा कि क्या पता कब क्या हो जाए और क्या क्या अधलिखा छूट जाए और किसी को शोक संवेदना में श्रद्धांजलि के रूप में कहीं यह न कहना पड़े कि बेचारा कौन जाने और क्या क्या लिखने की हसरत ले कर चला गया ।

एक खास किस्म के साहित्यकार जब सठिया जाते हैं तो और भी ख़तरनाक हो जाते हैं । मामला इस हद तक पहुंच जाता है कि ये खुद ही एक वरिष्ठ लेखक से अपनी मन मर्जी से खुद ही पदोन्नत हो कर के समीक्षक बन लेते हैं और लिखना शुरू कर देते हैं समीक्षा कम बिरदवालियां ज्यादा । पेश है इनकी बतौर एक समीक्षक के लिखी एक छोटी सी समीक्षा की एक बानगी । ‘अमुक जी का जन्म बदकिस्मती से एक छोटे से कस्बे में एक बिलकुल ही गरीब दिहाड़ी श्रमिक के घर में हुआ था,इनके पिताजी तो मजदूरी करते ही थे इनकी माताजी भी नरेगा में कम करने जाती थी यानी कि इनका बचपन नरेगा की साइड्स पर ही गुज़रा था । इनकी शिक्षा दिक्षा भी गाँव एक छोटे से सरकारी स्कूल में हुई थी जहां अध्यापक तो क्या ढंग का श्यामपट्ट भी नहीं था। इन सबके बावजूद आपकी हिंदी, आंग्ल, उर्दू, अरबी, फारसी, पश्तो,राजस्थानी,गुजराती ,बंगला ,संस्कृत ,असमियाँ ,डोगरी ,पंजाबी ,बृज ,भोजपुरी,मराठी ,उड़िया ,कन्नड़ ,मलयालम व अन्य कई भाषाओं पर आपकी पूर्ण व समान रूप से खासी पकड़ है । मगर आज तक मेरे अलावा इनको व इनके साहित्य को किसी ने सिलसिलेवार समझा तो क्या पढ़ा भी नहीं । इनकी अमुक अमुक किताबें छप चुकी हैं और इनका अभिनय व गायन पर भी अच्छा अधिकार है। और अंत में साहित्य की जितनी भी खूबियाँ होती हैं ये प्रशंसित कलमकार के खाते में जमा करते हुए लिख देते हैं कि इनको पढ़ कर अमुक शायर की याद आती है ।

एक बार मैंने एक ऐसे ही हज़रत को पकड़ लिया और थोड़ी तारीफ का मस्का लगाया और उसके एक लेख की कतरन सामने रख कर पूछा कि ज़नाब इसमें जिसे आपने दुष्यंत जी के समतुल्य माना है और जो हवाले की पंक्तियां लिखी है उनमें विशेषण दोष है । आप और आप के कवि दोनों को ही ‘मुल्जिम’ ‘मुजरिम’ लफ्जों का फर्क मालूम नहीं । और हां यहां देखिये जहां सारा ही गुड़ गोबर कर दिया हैं । जुल्म तो मज़लूमों पर होता आया है फिर यहां पूरे जहां की पीड़ा को लिखने का क्या औचित्य । जनाब को कुछ और तो कहते बना नहीं बस इतना ही बोले की तुम क्या जानो साहित्य क्या होता हैं । दामोदर लाल जांगिड़

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