रविवार, 12 अक्तूबर 2014

अशोक गुजराती की कविताएँ

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आपाद-बाहु

रोज़ अख़बार पढ़ती है वह
टीवी भी देखती है
जी हां, वही सब हत्या, बलात्कार, लूट-पाट, डकैती की ख़बरें
जिसके सिवा गंदी राजनीति को छोड़ दें
तो और कुछ भी नहीं मिलता समाचारों में
और फिर अगले या उसके अगले दिन पकड़े जाते हैं अपराधी अक्सर
तब वह करती है सवाल मुझसे बारंबार
क्या नहीं है इनको अक्ल
आज न कल पकड़ लेगी पुलिस इनको
डरते नहीं जो वे ज़ुर्म करने से पेश्तर

क्या दूं मैं उसको इसका जवाब
क्या आपके ज़ेहन में है कोई...

उन तथाकथित बेवक़ूफ़ गुनहगारों का इस क़दर बेख़ौफ़ होना
जबकि क़ानून है आजानु-बाहु
अपने लम्बे हाथों लेता है उन्हें पकड़
वे जानते हैं- इसीलिए हैं निडर
कि समय है आपाद-बाहु
आ जायेंगे इस गुंजलक से बाहर वे हंसते हुए
कालांतर में निरपराध होकर साबित
और-और करने यह या वह- इससे भयंकर गुनाह
कहां है वह तंत्र कि उन्हें अविलम्ब दे सके सजा...
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अनिषाद


मैं निषाद नहीं हूं
शास्त्रों के अनुसार निषाद वह वर्ग है
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र के अलावा
पंच-जन में समाहित
ब्राह्मण पिता और शूद्र मां के समागम- अर्थात् अवैध -से उत्पन्न
बेचारा-सा व्यक्ति : वर्णातीत एवं बहिष्कृत
स्त्री हो याकि पुरुष
जिसे शूद्र से भी गया-बीता माना गया
मैं वह नहीं हूं
कदापि नहीं
यह प्रश्न यक्ष कि इतिहास में मेरे उल्लेख से बचते रहे लोग
हालांकि था तब भी
चलो, मैं वर्तमान ही सही
मुझे भी तो जन-सामान्य में करो सम्मिलित
मैं पैदा हुआ- फिर वही तथाकथित नाजायज़ संतान के रूप में
पर इस बार मेरा पिता है शूद्र और मां ब्राह्मणी
हे शास्त्रियो, मुझे क्यों वर्जित रखा तुमने पहले इसके ?
कितने चालाक हो तुम !

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बेबस चांदनी का उजलापन

मसजिद के पीछे से ऊपर उठा दूज का चांद
पंडित की पीली पोथी, साधु के फ़ीके पड़ गये
गेरुआ वस्त्रों-सा, कृष्ण के पुराने पड़ गये पीताम्बर जैसा
गेंदे के मुरझाये फूलों की रंगत से होड़ करता

क़रीब ही था मंदिर, जहां से कुछेक को वह दीखा
हमारे देश के औसत मुसलमान की
ग़रीबी से भी कमज़ोर पीलापन लेकर
यहां तक कि मसजिद की प्राचीन दीवारों से भी
धुंधला अक्स लिये
याकि धर्म-ग्रंथ के जर्जर पड़ गये वरक़ों की तरह

निर्धन के उदास चेहरे-सा म्लान
ज्यों गुंबद पर लगी जीर्ण-शीर्ण पीत झंडियां
चहबच्चे में जमा पानी की निस्तेज आभा लिये
बरसाती सूरज की धूप की मानिन्द
मानो मलिनता के आवरण से आच्छादित हृदय हो
या गर्भस्थ कन्या का अनिश्चित भविष्य
पूनम की प्रतीक्षा में विकल
कटा-कटा ज्यों मुफ़लिस के कपड़े
नकली सोने की चमक से प्रतिद्वन्द्विता करता
प्रदूषित नदी, धुआं-धुआं पर्यावरण के मानी बताता

यह कैसा था आगमन
उस बुढ़िया के चर्ख़े वाले चन्द्रमा का
जिसे शुभ संकेत के रूप में किया ग्रहण
परिवार द्वारा विभाजित सम्पत्ति के दो हक़दारों
की मायूस सम्पन्नता के अर्थों में
समान रंग-रसायन का लहू धारण करते
दो विभिन्न समुदायों ने
इसने मनायी भाई-दूज और उसने ईद
एक ही दिन, एक ही तारीख़ अथवा तिथि पर
तवारीख़ के पन्नों में संभवतः पहली बार
हां, दोनों ख़ुश थे
ख़ुश थे इसलिए ठीक है
कि कोई दंगा नहीं, फ़साद नहीं हुआ
कोई निरपराध निष्पाप मारा नहीं गया
और गले मिले
ज्यों बिछड़े हुए चांद-सूरज हों !
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चट्टे-बट्टे

कहते हैं, आपदा अकेली नहीं आती
दुख मोर्चे की शक्ल में आते हैं
आती है या आते हैं, प्रवाह होता है अनवरत
यह पहलू हुआ एक, सोच का हमारी
करवट बदल कर देखो तो
जीवन में किसी के हो सकता है, सब के नहीं
हमेशा कदापि नहीं- सुख भी तो यूं ही आते हैं
शाम को बसेरे की ओर जा रहे पंछियों-से
लगातार आ रही बारिश जैसे, झड़ी कहते हैं उसे
वह दोनों तरफ़ मुड़ सकती है, अपने-आपको कर दे परिवर्तित
बाढ़ नामक विपदा में याकि फिर फ़सलों को दे दे नया हौसला
उसके आवेग पर है निर्भर, मनुष्य की उत्तेजना की तरह
ग़ुस्सा भी और प्यार भी- दोनों छोरों को छू सकती है वह
फिर जब आते हैं दोनों एक-सार
फ़र्क़ क्या रह गया औरत-आदमी की मानिन्द
यही न कि खट्टे-मीठे पर स्वादिष्ट करौंदे
अथवा बचाते हुए तोड़ना उनको कंटीली टहनियों के बीच से
अहसास जो मन की उंगलियों को हो रहा स्पर्श से
ज्यों सुंदर-सी युवती भी लगे देह की ज़ुबान को कसैली
और दे यूं ही-सी ठीक-ठाक, तृप्ति- शरीर को, आत्मा को...

सुख भ्रम है, क्षणिक है, बाह्य है...
नहीं, पहुंचता है वह भी अंतरात्मा तक
झूठलाते क्यों हो भइया सच को, सत्य तो यही है 
सुख सुख देता है, दुख दुख देता है
दुखों के जमघट में एक अकेला सुख
शुरुआती, वर्ना क्यों लगता प्यारा-प्यारा-सा
दोनों सगे भाई हैं, आते हैं तो आते हैं, जाते हैं तो जाते हैं
दोनों को सकते हैं भोग,
ब-हर-सूरत दुख में मुस्कराहट और सुख में भी बनी रहती है
किसी आसन्न अवसाद की अनचाही सम्भावना
केवल हम महसूस करते हैं चीत्कार, चीख-चिल्लाहट, कराह-सी
ऊंची आवाज़ में इस को जबकि उसे आहिस्ता-आहिस्ता
जज़्ब करते हैं सुस्वादु भोजन जैसा, डकार लेते तो हैं
पर वह दर्द की ऊंचाई को नहीं लगा पाती अपना हाथ
पूछो उनसे जो मज़ा ले रहे ज़िन्दगी का मानो खिलौना हो कोई
और वे, बावजूद सारी ख़ुशियों के हलकी-सी लगी खरोंच को
रोने का बहाना लेते हैं बना
इसीलिए निरपेक्ष हो जाना है सबसे बेहतर
सुख को दुख का और दुख को सुख का
लेना मान पर्याय!
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परवलय



लंगड़ी हो गई है वह, उसके घुटनों में दर्द है
कतिपय नहीं मानेंगे हार- शमशेर की मानिन्द
ये जो उम्र है, इसे जियेंगे ही
पगडण्डी समझ कर ही करेंगे पार
दूसरी तरफ़ वे हैं, लम्बा रास्ता है उनकी
सुरक्षा-सुविधा से जुड़ा, चाहते हैं जिसे भुनाना
उनकी आयु को न घुटने सताते हैं
ना जोड़ों का दर्द
काल भी हो जाता है उनके मुक़ाबिल सर्द
और अचानक बन भी जाता है मर्द
अलावा वे जो हो चुके पराजित
ना कोई आकांक्षा ना हेतु, उनसे रूठी रहती मौत
बनी रहती दूर की कौड़ी छकाती-सी प्रेयसी
आराधना से अविचलित
कैसा तो खेल यह
जीत में निराशा, हार भी नहीं देती आशा
मछली-सी तड़प रेत में
ज्यों आयी तो आयी, न भी आयी फ़सल खेत में
यह चिड़िया है
अभी रही फुदक
और लो, उड़ भी गयी अब
उसकी आज़ादी को नहीं कर पाया
इनसान कभी ज़ब्त
अपने ग़लत इरादों की तरह
सबसे क़ामयाब वे, जो भले-चंगे सोये रात में
न उठ पाये सुबह- क्या तो लेना-देना
इस पार्थिव संसार से
किसी निरासक्त साधु जैसा
उनको कैसे भुलाएं सपने जिनके चकनाचूर
कर देती मात्र एक दुर्घटना बुलबुले-सी ध्वस्त 
मौसम की अकाली मार फीकी जिसके आगे
आतंकवादी के निर्घृण आक्रमण को लजाती
ज़िन्दगी का सच यही है!
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सहचर


भयंकर दर्द था बायें पैर में
सूजन आ गयी थी पंजे में
उसे कुछ ऊंचाई पर रखने के इरादे से
मैंने टेबिल का सहारा लिया
मेरे जाने-अनजाने
दाहिना पांव उठा और उसके
समकक्ष जा टिका
थोड़ी ही देर में वह बायें से यूं जा लिपटा
ज्यों प्रेमिका का आलिंगन कर रहा हो प्रेमी
हौले-हौले लगा सहलाने
उसकी उंगलियों को
फिर नीचे टखने तक
बायां पंजा भी उसे मानो दे रहा था
स्पर्श का जवाब मौन प्रेयसी-सा
उनका यह आपसी प्यार देख कर
चकित था मैं
हालांकि ये सारी क्रियाएं
करा रहा था मेरा ही अवचेतन मस्तिष्क
गोया वह उनका ईश्वर हो!
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सही वाद



यह एक नया वाद है
समूचे वर्तमान वादों से अलाहिदा
क्यों न करें इसे शुरू
कर्ता कोई भी हो सकता है
क्रिया ज़रूरी है
कर्म के सिवा कुछ हो ही नहीं सकता जीवन में
विशेषण, क्रियाविशेषण की पूरी छूट है
मार्क्स अपनी जगह ठीक थे
लेकिन कहां है ईमानदारी-
न उच्च, न मध्य, न बीपीएल में
मौक़ा मिलते ही सब बन जाते हैं लूट का हिस्सा
रख देते हैं अपनी आत्मा को रेहन
चन्द सिक्कों की ख़ातिर
क्योंकि वैचारिकता बनती है
दिल और दिमाग़ के संयोजन से
यह व्यक्ति के विवेक और सदाशयता पर होती है निर्भर
उलट दिशा में दोनों ख़तरनाक यानी सभी ग़लत राह पर
फिर क्यों न नया वाद करें हम निर्मित
जो इन सारे बेईमानों के हो ख़िलाफ़
और कहलाये सही वाद !
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स्तन कैंसर


(किसी भी अबोध बच्चे के नाम)
कोई समझ नहीं थी उसके पास
हो भी नहीं सकती थी
उस वय में
लेकिन धुंधली अनुभूति थी अवश्य
कि इधर से जब होने लगती है धारा अवरुद्ध
वह रो पड़ता है अधूरी भूख के कारण
तब मां उसे दाहिने से बाएं कर
उसके शिशु होंठ उस तरफ़ के स्तन के पास ले आती थीं
और वह उस स्नेह से ओतप्रोत
अपने लक्ष्य को पा संतुष्टि के साथ
करने लगता था दुग्ध-पान !

दो ही तीन महीनों के अंतराल पर
जिस बीच उसकी छूट-सी गयी थी यह आदत
मां की निकटता से परित्यक्त कर देने पर
उस मां की, जो कहीं दूर अस्पताल में
पीड़ा से रही थी कराह
उसकी बढ़ती आयु ने अन्दर ही अन्दर
बला की ख़ुशी महसूसी
जब वही गोद उसे दोबारा हुई हासिल
उसे पुरानी स्मृतियों ने हलके-से सहलाया
लेकिन यह क्या-
वह कहीं भीतर यह अहसास कर रहा था
कि मां अब उसे अतृप्त रहने पर भी
दायें से बायें नहीं पलटातीं
बल्कि उसके मुंह में दे देती हैं
बोतल की वही नकली चूची
वह इससे नाख़ुश था पर शिकायत करने में असमर्थ
होता वह यदि दुनियादारी से वाक़िफ़ तो कभी ना करता
वह तो जानता नहीं था न
कि कैंसर ने उसके दूध के स्रोत को
कर दिया था आधा !
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थोथा चना...


 

पार्क में सुबह की सैर के लिए
आने वाले एकाध बार
ज़्यादा ही ज़्यादा जोश में तेज़-तेज़
घूमते हैं उलटे-सीधे हाथ-पैर फेंकते हुए
ज्यों मोरनी अपनी अर्धविकसित दुम उठाये
दौड़ती है इधर से उधर
मोर अपने रंग-बिरंगे पंख फेलाये
नाचता है हौले-हौले
जैसे रोज़ नियमित पार्क में आने वाले
क्या ऐसा ही नहीं है
अहंकार के मामले में
होता है जिनके पास ना-कुछ या ज़रा-सा
इतराते हैं अपने-आप पर अपरिमित
गर्दन की हड्डी टेढ़ी हो जाने तक
और वे भरे-पूरे ज्ञानी गुज़र जाते हैं उनके निकट से
शांत-स्थिर-अडोल सोचते हुए-
आज दिन भर या कल या आने वाले समय में
करना है क्या-क्या
उनकी तरह नहीं कि अब और कितना-क्या
मिल तो रहा है दो जून अच्छा खाना, मज़ा ही मज़ा
ऊपर से खड़ी है कार भी किराये के एलआइजी के सामने
और क्या चाहिए ?...
यहीं हो जाते हैं वे संतुष्ट एवं अहम्वादी
यह ज़रूरी भी है वैसे
अन्यथा पृथ्वी पर सभी हो जाते श्रेष्ठ !
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व्यामोह

 

जब सहा नहीं गया
दुख-दर्द पीड़ितों का
उसके दिमाग़ ने कर दी बग़ावत

शाम के धुंधलके में
उसने हथेलियों के आरपार
क्रास पर लगी एक-एक कील
निकाल दी झटके के साथ
मुक्त हुए अपने लहूलुहान हाथों के
सूखे धब्बों पर फेरकर खुरदरी जीभ
पपड़ा चुका खून चाटने लगा स्वयं ही

सदियों बाद आया होश उसके तन को
प्यासा हलक भूखा पेट
ले गया उसे कई देहरियां
सरल सहज बताया अपना सच
मांगा पानी, चाही रोटी
चले आते हैं जाने कहां से, मिला उत्तर-
पेट की ख़ातिर नहीं हिचकते बताने में
ख़ुद को ख़ुदा!

लौट आया वह इस अपरिचित दुनिया से
अपनी सलीब के निकट
लेकिन अब उसकी परेशानी थी यह
किससे कहे वह
वापिस कीलें ठोक देने के लिए...
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कारोबार



मेरी पत्नी मुझ से पूछती है
तुम बैठक के टेबिल पर रखे गुलदान में बिलानागा
अलग-अलग रंग-बिरंगे ताज़ा फूल क्यों सजाते हो
जबकि हमारे घर आता है कोई कभी-कभार
माहाना एक की औसत से
                      लाख कोशिशों के बावजूद नहीं मिल पाता प्यार
                      रत्ती भर लगाव से हो लेते हैं ख़ुश
                      होते हैं ऐसे भी शख़्स इस जहान में
                      क्या छोड़ देते हैं वे औरों पर लुटाना प्रेम
                      प्रतिप्रश्न करता हूं मैं
                      मकड़ी की तरह गिर-गिर सम्भलते पर्वतारोही
                      खाई नहीं आकाश से बोलते अहरह
                      झुठलाते नाक़ामयाबी से जाई तक़दीर की अवधारणा
                      गर नहीं लहरा पाते पताका
                      तलहटी पर झोंपड़ी डाल नहीं रहने लग जाते वे
कई प्रत्याशी नहीं त्यागते हर पांच साल पश्चात हारना
सुचारु संसदीय निर्णय की भी विपक्ष खींचता है टांग
इतनी हैं ख़राब सड़कें लेकिन तुम चलना नहीं छोड़ती
अर्जुन बेवक़ूफ़ थोड़े न था कि गीताई न हो जाता
नद बहाव से रुख़ नहीं मोड़ती
पखेरू आख़िरी सांस तक परवाज़ को बेताब
जानते हुए हश्र, प्रेमी-युगल समाज को बताते धता
धरे जाते किन्तु हत्या-बलात्कार-चोरी नहीं होते बंद
अच्छाई-बुराई की होड़ जारी
                      कहीं कुछ नहीं बदलता फिर क्या है निरंतर परिवर्तन
                      बस यही गत्यात्मकता
                      सूरज की, चांद की, पृथ्वी की
                      और इन्सान की.
                      000


प्रा. डॉ. अशोक गुजराती, बी-40, एफ़-1, दिलशाद कालोनी, दिल्ली- 110 095.
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