सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

चन्द्रकुमार जैन का आलेख -- नज़रें क्या बदलीं, नज़ारे बदल गए !

नज़रें क्या बदलीं, नज़ारे बदल गए !

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

आजकल तनाव हमारे वर्तमान जीवन की परिभाषा बन गयी है। रोजमर्रा की जिन्दगी में हैरान, परेशान होते हुए हम सारा दोष दूसरों के मत्थे होते हुए हम सारा दोष दूसरों के मत्थे मढ़ते रहते हैं और यह पूरी तरह से बिसरा देते हैं कि इसके लिए कहीं हम खुद भी जिम्मेदार हो सकते हैं। जीवन के प्रति हमारा अपना नजरिया-आस-पास के लोगों के प्रति अपना स्वयं का दृष्टिकोण भी जिम्मेदार हो सकता है। 

मनोवैज्ञानिकों की सलाह मानें तो सबसे पहले हमें अपनी खीज-तनाव के कारण खुद में खोजने चाहिए। आस-पास के लोगों, परिस्थितियों के प्रति अपने नजरिए की छान-बीन करनी चाहिए। ऐसा कर सके तो पता चलेगा कि सारी उद्विग्नता का कारण हमारी मानसिकता का बाहरी वातावरण से संगति न बैठना है और इसके लिए वातावरण की अपेक्षा हम खुद जिम्मेदार हैं।

एलन वाट्स ‘प्रेग्रासिंग आँफ द माइन्ड’ में कहते हैं कि वातावरण जड़ है, सोच-विचार रहित है, जबकि हम स्वयं सचेतन हैं। अपने सोचने-विचारने के तौर-तरीकों में फेर-बदल करना हमारे लिए एक आसान बात है। थोड़े से प्रयास के साथ ही हम वातावरण से समस्वरता स्थापित कर सकते हैं। इसी तरह आस-पास के लोगों के व्यवहार पर टीका-टिप्पणी करना, उन्हें अनर्गल प्रलाप करते रहना, रह-रहकर उन पर दोषारोपण करना, समस्या का कोई सार्थक समाधान नहीं है। क्योंकि सभी-अपनी प्रवृत्तियों एवं संस्कारों के वशीभूत हैं, फिर औरों पर अपना क्या वश? ऐसे में उन पर खीजने, झल्लाने से हमारा तनाव कम होने की बजाय बढ़ेगा ही, तब क्यों न हम समस्याओं के समाधान अपने अन्दर खोजें।

एक सत्य और है-बाहरी माहौल को प्रभावित करने वाले घटकों की संख्या भी काफी है। चाह कर भी सब पर एक साथ काबू पा सकना हमारे वश में नहीं है। बहुत कोशिशों के बावजूद हम कुछ हद तक ही परिस्थितियों को बदल सकते हैं। हाँ! अपने आन्तरिक दृष्टिकोण में परिवर्तन करना अपना बिल्कुल निजी मामला है। इसके फेर-बदल में हम पूरी तरह स्वतन्त्र ही नहीं सक्षम भी हैं। स्वस्थ एवं सुखी जीवन का यह एकमात्र कारगर उपाय है। जब हम अपने परिकर के साथ सहअस्तित्व की अनुभूति के साथ रहते हैं तो तनाव अपने आप दूर हो जाता है। लेकिन निषेधात्मक चिन्तन और मन में संचित घृणा, द्वेष, ईर्ष्या और भय के संस्कारों के कारण वातावरण से तालमेल बिठाना थोड़ा मुश्किल जरूर है।

इसके लिए आवश्यक है कि मन से बुरे विचारों का कूड़ा-कचरा निकाल फेंका जाय। लेकिन होता इसका उल्टा है। हममें से प्रायः प्रत्येक व्यक्ति सफलता पाने की तीव्र तृष्णा से ग्रसित है। हर वक्त उसे यह भय सताता रहता है कि कहीं वह असफल न हो जाय। जिससे उसे अपने परिवार तथा परिचितों के बीच शर्मिन्दा न होना पड़े। उसके इस भय को अभिभावक और शिक्षक मिलकर बढ़ा देते हैं। अपनी अस्मिता से जुड़ा यह सवाल इस कदर उसके मन पर छा जाता है कि वह लगातार भर और चिन्ता से ग्रसित रहने लगता है। जीवन का हर कृत्य उसके लिए आपातकालीन कार्य बन जाता है और वह लगातार तनाव में रहने लगता है। ऐसा नहीं हैं कि सफलता के लिए प्रयास कना कोई बुरी बात है। लेकिन यदि अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन किया जा सके तो इसे कर्तव्य भावना से तनाव रहित होकर भी किया जा सकता है। 

तनाव मुक्त होकर किए गए प्रयास में सफल होने की उम्मीदें भी अधिक होंगी। यदि इसके साथ देशहित और लोकहित की उदात्त भावनाएँ जोड़ी  सकें तो मन हर-हमेशा उत्साह एवं प्रफुल्लता से भरा रहेगा। हमारे किए गए काम के सौंदर्य में भी भारी निखर आ जाएगा। इस प्रकार हमारी पूर्व मान्यताएँ जिन्हें साइकोलॉजिस्ट मेण्टल प्रोग्रामिंग कहते हैं, हमारे जीवन का निर्धारण करती है। गलत एवं निषेधात्मक मेण्टल प्रोग्रामिंग हमारे गलत चिन्तन एवं गलत शिक्षा का परिणाम है। इस पर चिंतन ही नहीं, सुविचारित कदम भी उठाये जाने चाहिए। 

सच है न

नज़रें क्या बदलीं, नज़ारे बदल गए, 

कश्ती ने रुख क्या बदला, किनारे बदल गए। 

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राजनांदगांव। मो.9301054300

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