गुरुवार, 23 अक्तूबर 2014

शैलेन्द्र चौहान का आलेख - वैंकूवर की दीवाली

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पिछले कुछ दिनों से वैंकूवर में हूँ। कनाड़ा का वैंकूवर नगर कुछ ऐसा है जहां कुछ दिन घूमने के बाद आप भारतीय संस्कृति (?) से ऐसे अभिभूत हो जाएंगे जैसे आप भारत में रहते हुए भी नहीं हो सकेंगे। संस्कृति के नाम पर तीज त्योहारों के अतिरिक्त गाना बजाना भी शामिल होता है। कला, संगीत, नृत्य या नाटक अक्सर नहीं होते। कुछ भक्ति भाव और कुछ धूम- धड़ाम, बस यही कुछ यहां की संस्कृति है। मैं इन दिनों किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश में हूँ जो सृजनात्मक रुचि का हो। व्यक्ति तो बहुत हैं पर भारत से आए किसी सामन्य व्यक्ति के लिए उनके पास समय नहीं है। अलबत्ता कोई सेलिब्रिटी हो तो समय ही समय होता है।

यहां यूनिवर्सिटी में काम कर रहे दो-तीन भारतीय मूल के लोगों से जब मैंने संपर्क करना चाहा और उन्हें अपना परिचय दिया तो उनका रेस्पोंस चौंका देने वाला था। अक्सर भारत से मध्यम आय वाले लोग यहां आते हैं और स्थानीय भारतीय मूल के लोगों से सहायता की अपेक्षा करते हैं। तो इन लोगों ने मुझे भी कुछ ऐसा ही समझा। एक सज्जन की यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं नामी कवि आलोचक संपादक हैं। पहले तो उन्होंने व्यस्तता का बहाना बनाया फिर बोले क्या आप लोगों को भारत में मौका नहीं मिलता अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का। मैंने कहा लेकिन मैं तो ऐसा कुछ नहीं चाह रहा। मुझे आपसे कोई आर्थिक या व्यावसायिक सहायता भी नहीं चाहिए।  आप साहित्यकार हैं इसीलिए आपसे संपर्क किया। बस आपसे यहां की रचनात्मकता के बारे में बात करना चाहता था। तो बोले देखिये भारत में क्या है कि भारत में सब अपने हाल में मस्त रहते हैं। उनके पास समय भी बहुत होता है। अब पैसा भी आ गया है लेकिन आत्मसम्मान नहीं है।  मैंने पूछा भाईजान आपका क्या मतलब है ? वे सकपकाये बोले नहीं नहीं मेरा मतलब सफाई वगैरह तो वहां बहुत कम है। अब मोदी जी ने शुरू की है। ट्रैफिक डिसिप्लीन भी नहीं है। और उठाईगिरी भी है। मुझे भारत से बहुत प्रेम है पर पता नहीं क्यों मुझे वहां जाना अच्छा नहीं लगता। मैंने चाहा उनसे कह दूं कि न आपको भारत से प्रेम है, न भारतीयों से। आप भारतीय के रूप में अपनी पहचान बचाये रखना चाहते हैं और कुछ नहीं। लेकिन मैंने कुछ कहा नहीं फोन काट दिया।

यहां के एक कॉलेज में कार्यरत एक महिला व्याख्याता ने कहा कि हम प्रवासी भारतीयों के सहायतार्थ एक संगीत का कार्यक्रम रख रहे हैं उसका टिकट सौ डॉलर है। मेरे पास कुछ टिकट बचे हैं। आपको मैं पचास डॉलर में दे दूंगी। मैंने जानना चाहा संगीत का क्या कार्यक्रम है कौन परफॉर्म कर रहा है। तो उन्होंने कहा आप महालक्ष्मी मंदिर आ जाइए शाम छह बजे मैं वहीँ रहूंगी वहां आपको सब विस्तार से पता चल जाएगा। वहां स्वामी जी हैं वे ही सब अरेंज करते हैं।  आप कवि हैं न वे अच्छे कवि भी हैं। उन्होंने यह भी बताया वह वीएचपी से हैं। खैर मैं मंदिर नहीं जा सका। दूसरे दिन मैं अपनी बेटी के साथ यहाँ के उपनगर 'सरी' गया। स्काई रेल से सरी सेंट्रल स्टेशन हमलोग पहुँच गए। बाहर निकल कर देखा तो बड़ी धूम धड़ाम थी। बहुत तेज आवाज में किसी नई हिंदी फिल्म का गाना बज रहा था।    सरी सेंट्रल मार्किट के सामने मंच बना हुआ था। उसपर एक लड़का और एक लड़की अंग्रेजी और पंजाबी में एंकरिंग कर रहे थे। मंच पर कुछ साजो-सामान रखा जा रहा था तब तक जोर शोर से हिंदी गाने बज रहे थे। करीब तीन चार सौ लोग सामने खड़े होकर सुन रहे थे। आमतौर पर वैंकूवर में कहीं पुलिस नहीं दिखी थी वहां पुलिस की एक वैगन कड़ी थी और कम से कम दस पुलिसकर्मी हाथों में वायरलैस पकड़े हुए एकदम सतर्क थे। मुझे कुछ अजीब लगा। इतना शोर !भारत में भी आजकल बहुत शोर नहीं होता कुछ पाबन्दी है।

खैर हमलोग सेंट्रल मार्किट में घुस गए जब तक कोई प्रोग्राम शुरू हो तब तक शोर से बचा जा सके। कोई चालीस-पैंतालीस मिनिट बाद हिंदी गाने बंद हो गए। कुछ देर बाद एक सरदार जी पंजाबी में गाने लगे।  एक दो गाने सुनने के बाद सोचा चलो सरी के भारतीय बाजार से कुछ लाइट वगैरह खरीद लें। लेकिन ऐसा कोई बाजार हमें नहीं मिला। अलबत्ता हम एक मंदिर के पास पहुँच गए जहां दीवाली के लिए लाइटिंग हो रही थी। एक पंडित जी दिखे। मैंने उन्हें नमस्कार किया पूछा दीवाली की तैयारी चल रही है। पंडित जी ने भांप लिया की हम सीधे हिंदुस्तान से आ रहे हैं, वैंकूवर में नहीं रहते।  बोले आप कहाँ से आये हैं ? मैंने कहा दिल्ली से। तो बोले दिल्ली में तो बहुत जोरदार दीवाली मनाई जाती है। लेकिन यहाँ भी काफी प्रोग्राम होते हैं सब मिल जुल कर मनाते हैं। मैंने कहा जी हाँ, और क्या क्या होता है यहाँ दीवाली पर ? बस लाइटिंग होती है कुछ पटाखे छोड़े जाते हैं। बाकी दीवाली से पहले धार्मिक और कल्चरल प्रोग्राम होते हैं। वैंकूवर के अकाली सिख टेंपल (यहां गुरुद्वारा को टेंपल कहते हैं) में हर तीज-त्योहार मनाया जाता है।  मैं बोला हाँ सेंट्रल पर हम एक कल्चरल प्रोग्राम देखकर आये हैं। खैर पंडित जी सजावट में व्यस्त थे उनका अधिक समय लेना उचित नहीं था। मैंने जानना चाहा कि वहां वाशरूम है क्या बोले नीचे बेसमेंट में हाल है वहीँ चले जाइए। मंदिर के अंदर से हाल का रास्ता था सो मैं नीचे आ गया बेटी मंदिर देखने लगी। नीचे हाल में लंगर चल रहा था।  दोपहर के तीन बजे थे।  भूख एकदम बलवती हो गई।  बेटी को मंदिर से बुलाया और सात्विक खाना खाया। बेटी बोली खाना खाया है तो कुछ दान भी दे दो।  मैं बोला भई डॉलर में दान देना तो संभव नहीं है।  देखता हूँ जेब में कुछ रुपये हों। संयोग से एक पचास रुपये का नोट पड़ा था। एक दो डॉलर देने की अपेक्षा पचास रुपये देना ज्यादा संतोषजनक था।

मैं देख रहा हूँ कि धनवान डायस्पोरा और अपेक्षाकृत गरीब डायस्पोरा में भरी अंतर है। गरीबों और मेहनतकशों का संघर्ष कठिन है। ये लोग यहाँ कुछ बेहतर कमाने आते हैं और जी तोड़ मेहनत करते हैं। गरीबी की मार ही इन्हें यहाँ खींच लाती  है।  दुनिया भर में प्रवासी भारतीय समुदाय अनुमानतः 2.5 करोड़ से अधिक है। जो विश्व के हर बड़े क्षेत्र में फैले हुए हैं। प्रवासियों और भारतीय मूल के लोगों के लिए अंग्रेज़ी में इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द ‘डायस्पोरा’ मूलतः ग्रीक भाषा का है। इसका असली अर्थ तो था ईसा पूर्व आठवीं शताब्दी से छठी शताब्दी तक इसराइल से यहूदियों का बाहर निकलना। अब इसका इस्तेमाल आम तौर पर उन लोगों के लिए किया जाता है जो अपना देश छोड़कर दूसरे देशों में स्थाई रूप से बस गए हैं मगर अपनी पहचान के बारे में जानते हैं और उस देश के साथ विभिन्न स्तरों पर संबंध भी रखते हैं। चीन के बाद भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा डायस्पोरा है। भारत को जब से आज़ादी मिली है तब से कुछेक भारतीय अपनी जड़ें खोजने के लिए लौटने लगे हैं। इसके अलावा जब से भारतीय अर्थव्यवस्था खुली है तब से  यह प्रक्रिया और तेज़ हुई है। प्रवासी भारतीय समुदाय सैंकड़ों वर्षों में हुए उत्प्रवास का परिणाम है और इसके पीछे विभिन्न कारण रहे हैं व्यापारिक पूंजीवाद, उपनिवेशवाद और वैश्वीकरण। शुरू के अनुभवों में इनकी कोशिशों, दुःख-तकलीफों और दृढ़ निश्चय तथा कड़ी मेहनत के फलस्वरूप सफलता का आख्यान मौजूद है।

पिछली आधी से अधिक सदी में बड़ी संख्या में भारतीय नौकरी, अध्ययन और अपने परिवारों से जुडऩे के लिए विदेश गए हैं। उनमें से कई इन देशों में बस गए और वे (और उन पर आश्रित अन्य लोग) वहां भारतवंशियों (इंडियन डायस्पोरा) का हिस्सा बन गए हैं। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) के देशों में भारतीय पलायन का एक आश्चर्यजनक पहलू नजर आता है, जहां अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में भारत में जन्मे लोगों की सबसे ज्यादा तादाद है। वास्तव में जिन देशों में विदेशी मूल की शीर्ष 15 श्रेणियों में भारतीय आते हैं, उनमें से दो देश इटली और फिनलैंड यूरोप में हैं। इटली इकलौता यूरोपीय देश है, जहां भारतीय मूल के लोग बड़ी तादाद में हैं। 20-21 वीं शताब्दी के पिछले पांच दशकों में उत्प्रवास का स्वरूप बदलने लगा है और "नया डायस्पोरा" उभरा है जिसमें उच्च कौशल प्राप्त व्यावसायिक पश्चिमी देशों की ओर तथा अकुशल/अर्धकुशल कामगार खाड़ी, पश्चिम और दक्षिण पूर्व एशिया की और ठेके पर काम करने जा रहे हैं। इस प्रकार, प्रवासी भारतीय समुदाय एक विविध विजातीय और वैश्विक समुदाय है जो विभिन्न धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और मान्यताओं का प्रतिनिधित्व करता है। प्रवासी भारतीयों में भारतीय मूल के लोग और अप्रवासी भारतीय शामिल हैं और ये विश्व के शिक्षित और सफल समुदायों में आते हैं। विश्व के हर कोने में, प्रवासी भारतीय समुदाय को इसकी कड़ी मेहनत करने और स्थानीय समुदाय के साथ सफलतापूर्वक तालमेल बनाये रखने के कारण जाना जाता है। अगर देखा जाये तो विकसित देशों का व्यापार, उत्पादन से लेकर विपणन तक तीसरी दुनिया के देशों पर आश्रित है। प्रवासी भारतीयों ने अपने आवासी देश की अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है और स्वयं में ज्ञान और नवीनता के अनेक उपायों का समावेश किया है

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संपर्क : 34 /242, सेक्टर - 3, प्रतापनगर, जयपुर -302033

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