शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

पुस्तक समीक्षा - विश्व मानव

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पुस्‍तक समीक्षा

पुस्‍तक ः विश्‍व मानव

कवि ः सीताराम शर्मा ‘चेतन'

प्रकाशक ः अंश प्रकाशन, एक्‍स-3282, स्‍ट्रीट न. 4, रघुबरपुरा न. 2

गाँधीनगर, दिल्‍ली-110031

मूल्‍य ः 200 रूपए

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आज जब बाजारवाद ने सब कुछ को अपनी जद में ले लिया है, साहित्‍य भी इससे अछूता नहीं रह गया है. हम किसी हारे हुए सैनिक की तरह बैठे हुए, अपनी अस्‍मिता के होते चीरहरण के विरूद्ध बोलने का नैतिक साहस भी नहीं जुटा पा रहें हैं वैसे में कवि सीताराम शर्मा ‘चेतन' ने अपनी कविताओं के माघ्‍यम से एक प्रतिरोध दर्ज किया है.

हम जानते है कि समाज की विसंगतियों एवं व्‍याप्‍त विद्रूपताओं से मुठभेड़ करते हुए कवि अपना रचनाक्रम करता है. समसामयिक विद्रूपता एवं विसंगति कवि के अर्न्‍तमन में गहरा प्रभाव छोड़ते है, परंतु कवि बड़ा वही होता है जो समय की जद में ही नहीं लिखता अपितु वह जाने अनजाने समय का अतिक्रमण भी करता है और भविष्‍य के लिए सोचता और लिखता है. वर्जनाओं को तोड़ने का सही तरीका यही है कि बर्जनाओं को निर्मित करने वाली आधरभूत ढ़ांचे की पहचान हो. कवि जब सामाजिक विद्रूपताओं, विसंगतियों और वर्जनाओं को निर्मित करने वाली आधरभूत ढ़ांचे की पहचान कर लेता है तभी वैसी कविताएँ रच सकता है जो परिवर्तन के मार्ग में विरोधी ताकतों से पूरी शक्‍ति से टकरा सके.

कवि चेतन समकालीन विद्रूपताओं, विसंगतियों एवं वर्जनाओं से इस हद तक मर्माहत हुए है कि उन्‍होंने ‘काश' नामक कविता में लिखा है-

 

‘काश कोई ऐसी दुनिया होती

जहाँ सिर्फ प्‍यार होता

जहाँ का इंसान

सबसे

सिर्फ प्‍यार करता'

 

कवि चेतन की दृष्‍टि में हर मानव विश्‍वमानव है, एक दूसरे का प्रेमी, हितैषी और सहयोगी. दुनिया भर के मनुष्‍यों की एक ही जाति है-मानव जाति और एक ही धर्म है-मानव धर्म, इसलिए उन्‍होंने अपने काव्‍य-संकलन का नाम ‘विश्‍वमानव' रखा है. जाहिर है कवि ने पहली ही नजर में अपने संग्रह का मंतव्‍य स्‍पष्‍ट कर दिया है. जमाने की धूल-धक्‍कड़ से उनके अनुभव समृद्ध हुए हैं.कवि का मानना है कि देश में बुद्धिजीवियों की कोई कमी नहीं है पर दुर्भाग्‍यवश कई कारणों से वे अपने ज्ञान और उर्जा का सदुपयोग कर पाने में असफल रहें है इसलिए कवि चेतन चाहते है कि देश के बुद्धिजीवी, लेखक, चिंतक, पत्राकार, सम्‍पादक और जागरूक लोग राष्‍ट्रीय स्‍तर पर संगठित होकर संस्‍थागत रूप में सामने आयें और अपने सामाजिक और राष्‍ट्रीय कर्तव्‍यों का निर्वाह करें.

कवि चेतन की सोच अच्‍छी और समयानुकुल अवश्‍य हैं परंतु इतिहास गवाह है कि ‘बुद्धिजीवी संगठित होकर संस्‍थागत रूप में सामने आ नहीं सकते क्‍योंकि उनका ‘अंह' उन्‍हें ऐसा नहीं करने देता इसलिए आज कई मठाधीश तो मिल जाएगें लेकिन साहित्‍यकार नहीं. मैंने ‘हँस' पत्रिका में लिखा था जो ‘अपना मोर्चा' में छपा था कि ‘देश के साहित्‍यकारों अपने-अपने आइवरी-टावरों से बाहर आओ'.

बहरहाल कवि चेतन ने कई अच्‍छी क्षणिकाएँ लिखा है, जो घ्‍यान आकृष्‍ट करता है-

 

यह आदमी

समाज सेवक है

घर में

माता-पिता से

रहता अलग है.

कलियुग

अपना असर

दिखा रहा है

मानव

मानव से

खौफ खा रहा है.

यह अजीब नेता है

चुनाव में हमारे दर्द पर

सुबक कर रोते है

चुनाव जीत कर

हमारे दर्द के

बीज बोते है.

‘ राष्‍ट्रीय कानून देख

गवाहों का दिल दहल गया

हत्‍यारा घुम रहा है

कानून गवाह ढूंढ़ रहा है ।'

 

‘विश्‍वमानव' केवल कविता संग्रह का नाम नहीं, यह कवि का मानवता के नाम संदेश है. किसी ने ठीक ही कहा है जैसे प्‍यार चंद्रमा की तरह होता है जो अगर बढ़ता नहीं तो घटने लगता है, उसी तरह प्‍यार की आकांक्षा और समुत्‍सुकता से भरा है यह कवि और उसकी इच्‍छाएँ भी. वह समाज से, देश से, संसार से विलुप्‍त होते प्रेम की भावना को जगाना चाहता है. अपनी इसी प्‍यार की मानवीय इच्‍छा से वह एक ऐसी दुनिया रचना चाहता है जहाँ सिर्फ प्‍यार ही प्‍यार हो.

कवि चेतन की कविताएँ तमाम तरह के षड़यंत्रों के प्रतिरोध में आम आदमी से रिश्‍ता बनाते हुए उनके साथ खड़ी है कंधे से कंधा मिलाकर......‘सबसे सार्थक है

 

हमारे लिए यह उपलब्‍धि

कि हम विश्‍व मानव कहलाएँ

सबसे बड़ा है यह ज्ञान

कि हम सम्‍पूर्ण मानव

हैं एक ईश्‍वर की संतान

यह जाने और बताएँ

एक ईश्‍वर को एक रूप में अपनाएँ'

 

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा

गिरिडीह-815301

झारखंड़

मोबाइल-9471765417

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