यशवंत कोठारी का व्यंग्य - कलम बनाम झाड़ू

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कलम बनाम झाड़ू

दीपावली मंगल मिलन समारोह संपन्न हो गए हैं. पति लोग साफ -सफाई के कामों से फारिग हो गए हैं, पत्नियां शॉपिंग से फ्री हो गयी है, कामवाली बाईया काम पर लौट आई हैं, ऐसे नाजुक, विचित्र किन्तु सत्य समय पर यह परम रहस्योद्घाटन हुआ है कि आप लोगों ने कलम को झाड़ू बनाकर उसका सदुपयोग किया है।

साहित्य में कलम के सिपाही होते हे, लेकिन इधर झाड़ू के सिपाही, दरोगा मंत्री, अफसर और संत्री हो गए हैं. कलम को झाड़ू तक पहुंचाने का पवित्र काम संपन्न हो गया है. सरकार की पींठ पर उद्योगपति का हाथ है व सरकार हाथ मिला रही है। ये कैसा विचित्र संयोग हुआ है। सरकार की पीठ पर रखा हाथ सुरक्षा कर्मी ने हटाया क्यों नहीं।

सुरक्षा कर्मी क्या कर रहे थे? क्या वे कलम ढूँढ रहे थे ? या झाड़ू लेकर सरकार के दिमाग में लगे लगे , झड़ -जांखड साफ कर कर रहे थे? कलम के जादूघर सब चाय -चर्चा में मशगूल थे, सेल्फ़ी खिंच रहे थे प्रश्नो में क्या रक्खा हे, फिर कभी पूछ लेंगे. अभी तो सेल्फ़ी छापो।  कलम को पीछे कर सेल्फ़ी को सोशल साइट पर डालो . सम्बन्ध बनाओ , कभी न कभी काम आयेँगे.

टेंडरों का जमाना आ गया है. सत्ता के गलियारों में सत्ता के नए दलाल कलम ताल के बजाय कदम ताल करने लग गए हैं. लाखों-करोडों के टेंडर कलम के इंतज़ार में टेबल पर पड़े हैं

. कबीर कहता है -मन की गंगा को मैली मत होने दो. तन उजला मन मैला मत रखो, मगर कौन सुनता है.

कभी तोप का मुकाबला करने के लिए अख़बार निकला जाता था अब अख़बार मुकाबिल हो तो झाड़ू निकलवाओ। कभी कलम तलवार से तेज़ व् मारक होती थी अब हालात ये है कि कलम झाड़ू निकलने के काम आ रही हे. सेठ लोग वैसे भी कलम को झाड़ू ही समझते हे  , तू नहीं निकलेगा तो दूसरा , तीसरा निकालेगा। मन कि सफाई कोई नहीं चाहता तन कि सफाई करो. कलम चलने से कुछ नहीं होगा क्योंकि कलम कमल से ज्यादा नहीं हे. कलम छोडो झाड़ू पकड़ो -एक नया नारा है - मगर हे कौन्तेय कलम को ही पकड़ के रखना।

लेकिन विचार को झाड़ू से बुहारना संभव नहीं होगा। हे पार्थ कलम उठाओ। कलम में ही कल्याण है। कलम की कृपा से ही मंत्रियों की सम्पति दुगुनी हो गयी है। अभी तो पचपन महिने का सफर बाकी है और अगले पांच साल की गारंटी -वारंटी मिल गई है।

पार्थ सोचो मत, कलम उठाओ कलम की राह पकड़ो।

कलम का रंग केसरिया हो या लाल या हरा या सफ़ेद क्या फर्क पड़ता है  अक्षर तो सब काले ही छपते हे स्वर्णाक्षरों में लिखित इतिहास भी काला ही होता है।

 हे अर्जुन कलम उठाओ क्योंकि दिल्ली में विचारों की बड़ी कमी है।

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यशवंत कोठारी, ८६, लक्ष्मी नगर , ब्रह्मपुरी बहार जयपुर-३०२००२

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