शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

प्रमोद यादव का व्यंग्य - पीएम को प्रेमपत्र

पी.एम. को (प्रेम) पत्र.../ प्रमोद यादव

प्रेम-पत्र इसलिए लिखा है ताकि पत्र में आकर्षण रहे..खाली ‘पत्र’ लिखने से लोग दिग्भ्रमित हो सकते हैं..इसे शिकायती पत्र समझ सकते हैं..प्रार्थना-पत्र,आवेदन-पत्र या पारिवारिक-पत्र समझ सकते हैं..और भला ऐसे पत्र कोई पढ़ता भी है ? ऐसे पत्र लिखने वाले को ही मजा नहीं आता तो फिर पाने वाले को क्या ख़ाक मजा आयेगा ? हाँ..पत्र के साथ ‘प्रेम’ पिरो देने से पत्र का आकर्षण तो बढ़ता ही है, वजन भी बढ़ जाता है..लोगबाग़ पढने को उतावले हुए जाते हैं..हमारे जमाने में तो प्रेम-पत्र यानी लव-लेटर का जिक्र होते ही दिल बल्लियों उछलने लगता था..किसी से प्रेम हो न हो...यह बाद की बात.. पर प्रेम-पत्र लिखने-पढने का हर किसी का मन करता..लेकिन चंद नसीबवालों को ही ये नसीब होता..( हम जैसे को ) हमने खूब पत्र लिखे..पढ़े और लिए-दिए भी ..हर पत्र में एक नई ताजगी होती..प्यार का सुवास होता..प्रेम-पत्रों की यही तो विशेषता है...न लिखने वाला बोर होता है न पढने वाला..प्रेम जब प्रगाढ़ होने लगा तो प्रेम-पत्र पोथी में तब्दील होने लगे..सौ-सो पेज की कापी को हम आसानी से प्रेम-पत्र में तब्दील कर देते...और पाने वाले का भी जवाब नहीं..प्रत्युत्तर में दो-चार पेज हमसे ज्यादा ही लिख मारती ..अब तो पढने-लिखने का ज़माना ही न रहा.. मोबाईल-युग में इसका अवसान हो गया.. सब कुछ डाईरेक्ट हो गया है...किसी के पास समय नहीं..हमारे जमाने में तो बंदा तीन-चार साल तक रगड़कर प्रेम-पत्र ही लिखते रहता .. मजाल कि लड़की को छू भी ले... अब के बन्दे तो तीन-चार काल में ही लड़की को बाईक की पिछली सीट में लिए “ जिंदगी एक सफ़र है सुहाना “ गाते फिरते हैं.. प्रेम-पत्रों का कहीं कोई काम ही नहीं रहा ...हाँ..पिछड़े इलाके में इसका प्रचलन अब भी है..और निश्चित ही वहां के प्रेमीजन काफी सुखी होंगे हमारी तरह...ऐसी आशा है..चलिए.. और ज्यादा विषयांतर न होते हुए विषय पर आयें..पी.एम. साहब को प्रेम- पत्र लिखें-

परम आदरणीय पी.एम. साहब,

नमस्कार!

समझ नहीं आता ..पत्र कहाँ से और कैसे शुरू करें ? आप तो बेबाक कहीं भी,कभी भी “ भाईयों और बहनों” से शुरू हो जाते हैं..पर हमारे साथ ऐसा नहीं है..ओबामा ने तो मिलते ही “ केम छो प्राईम मिनिस्टर ? ” कहा....हम आपसे क्या कहें ? समझ नहीं आता..वैसे हम जानते हैं कि स्पष्ट बहुमत से सरकार बनने के बाद से ही आप “ मजे माँ “ हैं..ऐसे में केम छो पूछने का कोई तुक नहीं... पी.एम. बनने के बाद तो बिलकुल ही नहीं.. क्योंकि सारे पी.एम. “मजा मा “ में ही होते हैं..आपने चुनाव के समय कहा था कि अब अच्छे दिन आने वाले हैं..आपके तो आ गए साहब , हमारे कब आयेंगे ? आलू अभी भी आसमान पर है...प्याज अभी भी आंसू निकाल रहा है..कुछ तो कीजिये..

अरे हाँ... पहले आपको बता दें कि यह पत्र हम गजोधर भैया की जिद्द पर लिख रहें हैं..ये रोज रात को पानठेले पर पान चबाते हमें चबा जाते हैं...आपके क्रिया-कलापों की,विचारों की,दौरों की,भाषणों की,अभियानों की चर्चा-आलोचना बेधड़क बिलानागा रोज करते हैं और हर सवाल के जवाब की आशा हमसे करते हैं जैसे हम –हम ना हुए आपके पी.ए. हो गए.. वैसे हमें पी.एम. का पी.ए. बनने से कोई परहेज नहीं..जगह खाली हो तो कभी भी बुला लें..हम निराश नहीं करेंगे..

हाँ..तो आपको बता दें कि पत्र निश्चित ही हम लिख रहें हैं पर इसमें जो भाव हैं, सवाल हैं, संशय है , विचार है, क्रांति है... वो गजोधर के हैं..कहीं कुछ बुरा लगे तो उन्हें माफ़ कर दीजियेगा ..अब कल रात ही वो पूछ रहे थे कि इस बार के चुनावी दौरों में ( महाराष्ट्र में ) साहब चाय-का चौपाल क्यों नहीं लगा रहे ? अब हम क्या जवाब देते ? हमने तो इतना ही कहा कि इन दिनों केंद्र में ढोकला चल रहा है भैया .. राज्य तक आने में समय लगेगा.. एक बात और...भूटान, नेपाल दौरे से लौटने के बाद आपने बयान दिया कि अब एशिया के अच्छे दिन आने वाले हैं..तब गजोधर नाराज हो बोले थे- देश के तो आये नहीं..अब एशिया के जपने लगे..अमेरिका के बाद दो-चार और देश घूमेंगे तो कहेंगे-विश्व के अच्छे दिन आने वाले हैं...नारे को ग्लोबल कर देने से भला कोई अच्छे दिन आयेंगे ?

पी.एम. साहब..एक और राज की बात आपको खुले तौर पर बता दूँ..देश के स्कूली बच्चे इन दिनों आपसे काफी डरे-सहमें हैं..आपको इसकी खबर है या नहीं हमें पता नहीं.. मिडिया जो कुछ दिखाती है ,वही सच नहीं होता.. उसे तो वही दिखाना है जैसा आप देखना चाहते हैं ..अब हर किसी महात्मा की जयंती या दिवस में बच्चों को सरकारी आदेश के तहत स्कूल बुला लिए जाने का डर सताए रहता है.. दो अक्टूबर को बेचारे विद्यार्थी गांधीजी पर दो-चार भाषण दे मुक्त और संतुष्ट हो जाते थे...और इससे कुछ हो न हो लेकिन गांधीजी की जीवनी सबको याद हो जाया करता था ..पर इस बार आपने स्वच्छता मिशन के तहत उन्हें झाड़ू थमा साफ़-सफाई में लगा दिया..आगामी पीढ़ी गांधीजी पर अनभिज्ञता जाहिर करे...कौन गांधी ? कहे तो बुरा न मानियेगा..और हाँ..सबसे बुरा हाल तो बेचारे नौकरी पेशेवालों का था...उनकी छुट्टी गई सो गई..उनसे सारा आफिस और मोहल्ला साफ़ करवा दिया..आदेश के तहत था तो मरता क्या न करता ?..अब कैलेण्डर देख वे अगली किसी जयंती पर क्या होगा, इसका कयास लगाए फिरते हैं..जिस झाड़ू पर कभी किसी का एकाधिकार हुआ करता, उसे भी आपने आम कर दिया..उनका तो पत्ता ही साफ़ कर दिया..

आपके आगामी कार्यक्रमों को सुनकर एक पुरानी पार्टी के तो होश ही उड़ गए हैं.. पहले उन्हें शिकायत थी कि आप उनकी योजनाओं को उड़ाकर नाम बदल कर चला रहे..अब नया आरोप है कि उनके आदरणीय प्रकाश-स्तंभों को,स्वर्गीय महानुभावों को वन बाई वन उड़ाये लिए जा रहें है..पहले महात्मा गांधी.. और अब नेहरु-इंदिराजी ...एक तो वैसे भी वे कोमा में हैं..उनके साथ ऐसा खेल अच्छा नहीं..वो एक गाना है ना-बंदिनी का-“ मत खेल जल जाएगा...कहती है आग मेरे मन की..मत खेल..” तो पी.एम. साहब जरा इस पर गौर फरमाएं..इन पर रहम करें...

“न खाऊंगा,न खाने दूंगा “...”न गन्दगी करूंगा,न करने दूंगा “ के तर्ज पर आप कब हाथ लहराकर कहेंगे कि – भाईयों और बहनों- “ न महंगाई बढ़ेगी, न बढ़ने दूंगा “..हमें तो इसी नारे का इन्तजार है..क्योंकि बिना आलू-प्याज के आम आदमी की जिंदगी ठहर सी गई है..अब ये मत कहियेगा कि हमने पेट्रोल का दाम घटाया..ये कैसे और क्यूँकर घटता है,पब्लिक को मालूम है..अतएव आपसे विनम्र निवेदन है कि महंगाई कम करने पर ठोस काम करें ..आम आदमी को केवल इसी से मतलब है..आप कहाँ गए, किससे मिले इनसे उन्हें कोई लेना-देना नहीं..उनके लिए जिंगपिंग, पुतिन या ओबामा भी केवल गजोधर ही हैं..

आखिरी बात...आपके छप्पन इंची सीने की इन दिनों काफी बातें हो रही है..पाकिस्तानी सेना सीमा पर बेवजह फायर पे फायर कर रही..लोग मरे जा रहे.. और आप हैं कि चुप्पी साधे बैठे हैं..टी.वी. पर इस बात को लेकर बहस छिड़ी है..देशवासी कोरस में गा रहे हैं- “ क्या हुआ... तेरा वादा...” कुछ तो कहिये श्रीमान..

जाते-जाते एक बात और... इंदौर के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में आपने कहा कि केंद्र और राज्य के बीच छत्तीस के आंकड़े नहीं होने चाहिए..यह देश के विकास के लिए रुकावट है..केंद्र और राज्य को पास-पास ही नहीं बल्कि साथ-साथ होने चाहिए,तभी देश का चहुंमुखी विकास संभव है.. छः-आठ महीने पहले जब आप सी.एम.थे तो बताएं- केंद्र के कितने पास-पास या साथ-साथ थे..? माफ़ कीजियेगा,ये मैं नहीं गजोधर भैया पूछ रहे हैं...अंत में हम यही कहना चाहेंगे कि हमारी बातों से आपके मन को कहीं कोई क्लेश या दुःख पहुंचा हो तो गजोधर भैया को माफ़ कर दें..वे कडुवा जरुर बोलते हैं पर प्रेम से बोलते हैं..इस प्रेम-पत्र की हम यहीं समाप्ति करते हैं..जवाब मिला तो आगे की सोचेंगे..देश का ख्याल रखियेगा.. चलते है...वन्दे-मातरम..

आपका- गुरूजी

(वैसे हम गुरूजी तो गजोधर के हैं)

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- प्रमोद यादव

गया नगर , दुर्ग , छत्तीसगढ़ ,

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  1. इत्मिनान से लिखे खत की बात ही कुछ और होती है ।अच्छा बहुत अच्छा लिखा है ।बधाई

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