सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - रोग निवारक धनतेरस

दीपावली पर विशेष......
रोग निवारक धनतेरस को जाने
तेरह दीप तेरह रोगों के नाश करने वाले प्रतीक.....
    हिन्दु धर्मावलंबियों  द्वारा वर्ष भर रखे जाने वाले व्रतों  में सबसे उत्तम फल देने वाला प्रदोष व्रत भगवान शंकर और भगवती पार्वती को प्रसन्न करने वाला व्रत माना जाता है । यही वह व्रत है जो कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस के नाम से मनाया जाता है ,और दीपावली पर्व के पंचपर्वों की एक मुख्य  कड़ी के रूप में जाना जाता है । वैसे भी प्रदोष व्रत धन - धान्य और संतान सुख देने वाला हैं। इसी व्रत के साथ आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वनतरी के जन्म की कथा भी जुड़ी है।  धनतेरस के दिन धन के रूप में सोना खरीदने की परम्परा का उल्लेख शास्त्रगत नहीं लगता है। कारण यह है कि धनतेरस के दिन पृथ्वी पर जन्म लेने वाले भगवान विष्णु के अवतार  धनवन्तरी की प्रिय धातु पीतल है। यही कारण है कि शास्त्रवेत्ताओं द्वारा  धनतेरस के दिन पीतल के बर्तन ,पीतल की भगवान की मूर्ती पीतल का भगवान का सिहांसन ,पूजा सामग्री में शामिल घण्टी आदि खरीदने का सुझाव दिया जाता है। भगवान धन्वन्तरी आयुर्वेद  के आदि देव हैं। इनकी  भक्ति और पूजा आयुर्वेद चिकित्सकों  के लिए बड़ा महत्व रखती है ।
पंचपर्वों में शामिल प्रथम दीपोत्सव का प्रतीक
    भगवान धन्वन्तरी का जन्म धनतेरस दीपोत्सव के शुभारंभ का संदेश भी है। माँ लक्ष्मी की पूजा से ठीक दो दिन पूर्व मनाया जाने वाला यह पर्व  साधकों के लिए व्रत के रूप में खुशियाँ समेट लाता  है। परिवार के बड़े बुजुर्गो का मानना है कि इस  प्रथम दिन के पर्व पर किसी न किसी प्रकार की संपत्ति में वृद्धि अवश्य की जानी चाहिए त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वन्तरी की पूजा गोधुली बेला (गायोें के लौटने का समय) में की जानी चाहिए । व्रति एवं पूजक को भगवान धन्वन्तरी को प्रसन्न करने  इस मंत्र से जप करना चाहिए-
ऊँ नमों भगवते महासुदर्शनाय, वासुदेवाय धनवन्तरायेः
अमृत कलश हस्ताय सर्वभय , विनाशाय सर्व रोगनिवारणाय
    इस प्रकार भगवान धन्वन्तरी की पूजा आराधना पूरे परिवार की कुशल क्षेम के लिए अति उत्तम मानी जाती है। हिन्दु धर्मशास्त्रों में भगवान धन्वन्तरी को देवताओं का वैध माना गया है। कहते हैं धन्वन्तरी एक महान चिकित्सक थे जो जड़ी बूटियो के माध्यम से असाध्य रोगों को भी दूर कर दिया करते थे । इसी कारण उन्हें देव का स्थान प्राप्त हुआ । कालान्तर में शास्त्रों का अध्ययन कर इस बात के प्रमाण ढूंढे गये और भगवान धनवन्तरी के जन्म पर तेरह दिये जलाकर  दीपावली के आगमन की सूचना देने वाला पर्व बना दिया गया । तेरह दीपों की लड़ी एक -एक तिथि को समर्पित उल्लास एवं खुशियों का प्रतीक मानी जाती है।
जन्म को लेकर अलग- अलग धारणाएँ
आयुर्वेद के देव माने जाने वाले धन्वन्तरी जी को लेकर अलग -अलग धारणाएँ देखी एवं सुनी जा रही हैं। ऐसा भी माना जाता है कि भगवान धन्वन्तरी से पूर्व आयुर्वेद की रचना में चरक सहिेता का भी योगदान रहा है। वेदों कि संहिता में तथा ब्राम्हण  भाग में भी धन्वन्तरी का नाम नहीं मिलता है।  इतना अवश्य है कि महाभारत और कुछ पुराणों में भगवान विष्णु के अवतार के रूप में धन्वन्तरी  जी का उल्लेख  पाया जाता है। कहते हैं कि कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि पर भगवान धन्वन्तरी का जन्म हुआ। समुद्र मंथन के समय ही शरदपूर्णिमा को इंदु अर्थात चन्द्रमा ,कार्तिक द्वादशी के दिन कामधेनु गाये,चतुर्दशी को माँ काली और अमावस्या को माँ लक्ष्मी का प्रादुर्भाव सागर से ही हुआ । भगवान धन्वन्तरी  चार भुजाधारी हैं जिनमें ऊपर की दोनो भुजाओं में शंख और चक्र धारण किये हुए है और नीचे वाली दो भुजाओं में  जलुका और औषधि तथा अमृत कलश लिये हुए हैं। आयुर्वेद कि चिकित्सा से सम्बन्ध रखने वाले लोगों द्वारा इन्हें आरोग्य देव माना जाता है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि इन्होंने अमृततुल्य औषधियों की खोज की थी । भगवान धन्वन्तरी के कुल में ही दिवोदास का जन्म हूआ जिन्हें शल्य चिकित्सा का विशेषज्ञ माना जाता है। यह भी कहा जाता है कि वैदिक काल में जो महत्व अश्विनी को प्राप्त था वही पौराणिक काल में धन्वन्तरी को प्राप्त हुआ। अश्विनी के हाथ में मधुकलश तो धन्वन्तरी  के हाथ में  अमृत कलश होना बताया जाता है।
पूजने के लिए मंत्रों की कमी नही
भगवान धन्वन्तरी की पूजा और परिवार की स्वस्थता की कामना के लिए मंत्रो की कमी नहीं है। दीपावली से दो दिन पूर्व धन्वंतरी जी की पूजा के लिए एक साधारण सा मंत्र इस प्रकार है :-
ऊं धन्वन्तरायेः नमः
इस मंत्र के अलावा वृहद रूप लिये निम्न मंत्र भी  प्रचलित है :-
ऊँ नमों भगवते महासुदर्शनाय, वासुदेवाय धनवन्तरायेः
अमृत कलश हस्ताय सर्वभय , विनाशाय सर्व रोगनिवारणाय
त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णु स्वरूप,
श्री धन्वन्तरी स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः ।।
     इस मंत्र का जप करते हुए साधक भगवान धन्वंतरी से प्रार्थना करना चाहता है कि परम् श्रेष्ठ भगवान जिन्हें सुदर्शन वासुदेव धन्वंतरी के नाम से जाना जाता ह,ै जो अमृत कलश के  धर्ता हैं , सर्वभय नाशक हैं, सर्व रोगों का नाश करने वाले हैं , तीनों लोकों में जिनका प्रकाश ह,ै तीनो लोकों के निर्वाह करने वाले हैं, उन विष्णु स्वरूप धन्वन्तरी को मैं नमन करता हूँ। इस प्रकार दीपावली से पूर्व मंगल की कामना का सूचक पर्व धनतेरस इसी उद्देश्य से मनाया जाता है कि सभी लोग स्वस्थ रहते हुए पंच पर्व में धर्म कर्म के साथ आनंद और उत्सव मना सकें ।
    ऐसा माना जाता है कि आयुर्वेद का सर्वप्रथम प्रकाशन ब्रम्हा जी द्वारा किया गया। उक्त प्रकाशन में जहां एक लाख श्लोक शामिल बताये जाते हैं वही यह भी कहा जाता है कि एक हजार अध्याय सम्मिलित किये गये थे। सबसे पहले उस ग्रन्थ को पढ़ने का अवसर प्रजापति को प्राप्त हुआ। इसके बाद आयुर्वेद से सम्बन्धित उक्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ को अश्विनी कुमार ने पढ़ा और फिर इन्द्र देव ने भी उक्त शास्त्र का अध्ययन किया। सबसे बाद में इन्द्र देव से ग्रन्थ को प्राप्त कर उसे धन्वन्तरी जी ने पढ़ा। इसी महान ग्रन्थ को सुनकर सुश्रुत मुनि ने एक अन्य आयुर्वेद ग्रन्थ की रचना की । भगवान धन्वन्तरी को पहले जन्म में भगवान या देव का स्थान प्राप्त नहीं हुआ। उन्होंने अपने जन्म के बाद भगवान विष्णु से लोक में अपना स्थान तय करने निवेदन किया , किन्तु उस समय तक देवों के स्थान तय हो चुके थे। भगवान श्री विष्णु द्वारा धन्वन्तरी को वरदान दिया गया कि अगले जन्म में तुम्हें सिद्धियां प्राप्त होगीं, और तुम इस लोक में प्रसिद्धी पा सकोगे। तुम्हें देवत्व प्राप्त होगा और लोग तुम्हारी पूजा करेंगे। आयुर्वेद के अष्टांग विभाजन का वरदान भी भगवान विष्णु ने धन्वन्तरी जी को दिया । वही धन्वन्तरी जी आज इस मृत्यु लोक में भगवानों की तरह पूजे जा रहे हैं।

 

                           
                                           प्रस्तुतकर्ता
                                       (डा. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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