शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

हरदेव कृष्ण का आलेख - सोने की दीवानगी

स्वर्ण धातु का भाव बाजार में कम या ज्यादा होता रहता है पर भारत में इस के प्रति दीवानगी कभी कम नहीं होती। यह प्रतिष्ठा और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है, आड़े वक्त में यह काम आता है। यह दो मुख्य कारण तो इसकी वैल्यु को कभी कम नहीं होने देंगे। परंपरागत रुप से, श्रेष्ठता क्रम में, सोने को तीन श्रेणियों में बांटा जाता है- स्टैंडर्ड, आभुषण और गिन्नी। स्टैंडर्ड यानि 24 कैरेट सोने की शुद्धता 999.9 में आंकी जाती है। 22 कैरेट की शुद्धता का मान होता है-916.00। शुद्ध सोने से सभी प्रकार के गहने नहीं बनाए जा सकते। उसे मजबूती प्रदान करने के लिए 11 भाग सोना, एक भाग चाँदी व ताँबे का मिश्रण तैयार किया जाता है।

एक अनुमान के मुताबिक भारतीय महिलाएं लगभग 100 टन सोने के गहने हर साल खरीदती हैं। हिन्दू समाज के लिए तो इसका धार्मिक महत्व है। धन की देवी लक्ष्मी को स्वर्ण धातु बहुत पसन्द है। लक्ष्मी पूजन के समय पीत वस्त्र धारण करना शुभ और फलदायी माना जाता है। अग्नि को शुद्धि करने वाला माना जाता है और स्वर्ण को उसका प्रतीक। इसी कारण सोने के आभूषण कमर से ऊपर पहनना ही ठीक समझा जाता है। इसके अतिरिक्त अक्षय तृतीया को सोने की खरीददारी को शुभ माना जाता है। कोई भी शादी-ब्याह सोने के गहनों के बिना अधूरा माना जाता है। सोने का उपयोग केवल आभुषण या सिक्कों के रुप में नहीं होता। इसका प्रयोग दंतकला व सजावटी अक्षर बनाने के लिए भी होता है। स्वर्ण के यौगिक फोटोग्राफी में भी प्रयुक्त होते हैं।

वैसे तो संत-फकीर माया से दूर रहते हैं , लेकिन उनके भक्तों को तो सोने से मोह है सो उन्हें सोने से लाद कर रख दिया। शिरडी के साईं बाबा के स्वर्ण सिंहासन की कीमत करोड़ों की है। अमृतसर का विश्वप्रसिद्ध स्वर्णमन्दिर किसी परिचय का मोहताज नहीं है। तिरुपति बालाजी के मन्दिर पर तो जैसे सोने की बरसात होती है। इनका एक मुकुट शुद्ध सोने का है और उसका वजन 13 किलोग्राम है। यही नहीं इसमें हीरे भी खूब जड़े हुए हैं। इनकी सोने की धोती 40 किलोग्राम की है। यहीं से इस शानदार और दुर्लभ धातु के महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक के पास 3000 टन से ऊपर स्वर्ण भण्डार है और इससे कई गुना ज्यादा निजी क्षेत्र में है। स्वर्ण नियंत्रण कानून 1963 भी सोने के लगाव को सीमित नहीं कर पाया। कुछ सालों बाद इसे हटा दिया गया था।

ऐतिहासिक रुप से देखें तो ईसा से 2500 वर्ष पूर्व भी सोने का प्रचलन था। सिंधु घाटी की सभ्यता में यह पाया गया है। चरक संहिता में स्वर्ण और उसकी भस्म का औषधि रुप में वर्णन है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी इसका जिक्र आया है।

सोना वायुमण्डल की ऑक्सीजन से प्रभावित नहीं होता। यह मुक्तअवस्था में चट्टानों में पाया जाता है। पहाड़ी जल स्त्रोतों में कभी कभी इसके कण मिलते हैं। हरियाणा में जगाधरी के पास आदिबद्री मंदिर है। इसके साथ लगती सोम्ब नदी का क्षेत्र ऐसा है जहां माहिर लोग सोना निकालते हैं। नदी में कंकर रुप में सोना बहकर आता है। नदी की गोद से सोना तलाशने के धंधे में स्थानीय लोगों का कहना है कि जो नदियां हिमालय की गोद से निकलती हैं वे पहाड़ों के कई दुर्लभ खनिज पदार्थों को अपने साथ बहाकर लाती हैं। इन्हीं पदार्थों में सोने के सूक्ष्म कण होते हैं। फैलाव वाले क्षेत्र में नदी की गति कुछ धीमी हो जाती है तो ये कण रेत के साथ किनारों पर आ जाते हैं। नदी से सोना निकालने वाले लोग टीम बनाकर घुस जाते हैं। एक खास शीशे जैसी प्लेट से मिट्टी की परख की जाती है। जैसे ही सोने के सूक्ष्म कणों की हल्की सी चमक नजर आती है, फौरन उस मिट्टी को इकट्ठा कर लिया जाता है। इन लोगों के पास एक पहाड़ी लकड़ी से बना विशेष प्रकार का बक्सा होता है। इस बक्से के ऊपर बांस की लकड़ी की झाली लगी होती है। इसी झाली के ऊपर सोने के कणों वाली रेत को रख के उस पर पानी डाला जाता है। इससे हल्के रेतकण तो बक्से से बाहर हो जाते हैं और भारी सोने के कण बक्से में चले जाते हैं। नीचे बची रेत को दुबारा झाली पर डाल कर पानी गिराया जाता है। कई बार यही प्रक्रिया दोहराई जाती है। अंत में जो थोड़ी सी रेत बच जाती है उसमें पारा डालकर उसे खूब रगड़ा जाता है। ऐसा करने से सोने के बचेखुचे कण पारे से चिपक जाते हैं। आखिर में सोने और पारे को पर्याप्त आँच में गर्म किया जाता है। पारा तो जल कर खत्म हो जाता है पर बारीक सोने के कण बच जाते हैं।

बिहार की सिंहभूमि जिले में सुवर्णरेखा नदी में भी सोने के कण मिले हैं। सिक्किम में यह अन्य अयस्कों के साथ मिश्रित रुप मे मिलता है। हैदराबाद के हट्टी क्षेत्र से सोना प्राप्त हुआ है। मैसूर की कोलार खानों से भी सोना निकाला जाता है। वहां पारदन और सायनाइड विधि द्वारा सोना प्राप्त किया जाता है। इस तरह भारत में विश्व का लगभग दो प्रतिशत सोना प्राप्त होता है।

सोने का उपयोग केवल आभुषण या सिक्कों के रुप में नहीं होता। इसका प्रयोग दंतकला व सजावटी अक्षर बनाने के लिए भी होता है। स्वर्ण के यौगिक फोटोग्राफी में भी प्रयुक्त होते हैं।

हमारे पड़ोसी देश चीन में भी सोने के प्रति दीवानगी बढ़ती जा रही है। सूत्रों की माने तो वहां का केन्द्रिय बैंक अपनी नकदी व डालर को सोने में तबदील कर रहा है। वहां सोने की खुदरा खपत में वृद्धि देखी गई है। इस बात की पुष्टि वर्ल्ड गोल्ड कांउसिल ने भी की है। उसका अनुमान है कि चीन में सोने की खपत, जो इस समय 1132 टन है , 2017 में बढ़कर 1350 टन प्रति वर्ष हो सकती है। सोना निवेश का सशक्त माध्यम माना जाता है। आर्थिक सुरक्षा के मद्देनजर भविष्य में भी सोने का महत्व कायम रहेगा।

--------------------------------------------------------

(मुख्य सामग्री स्त्रोतः विकीपीडिया, नब्बे के दशक का नवभारत टाइम्स)

 

हरदेव कृष्ण, ग्राम/डाक – मल्लाह-134102

जिला पंचकूला (हरियाणा )

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------