रविवार, 5 अक्तूबर 2014

महावीर सरन जैन का संस्मरण - मेरे बड़े भाई

मेरे बड़े भाई : शुचिता के प्रतिमान श्री सूरज भान जैन 
श्री अक्षय जैन से मुझे मेरे बड़े भाई सूरज भान जैन के स्‍वर्गवास होने की सूचना प्राप्त हुई। भाई साहब पिछले एक साल से अस्वस्थ चल रहे थे। सन् 2001 में सेवानिवृत्त होने के बाद से नए वर्ष, होली, क्षमावाणी दिवस एवं दीपावली पर भाई साहब से बात करने का सिलसिला अनवरत बना रहा। पर्व पर शुभकामना देने और क्षमावाणी दिवस पर क्षमा याचना करने का क्रम चलता रहा। यदि किसी अवसर पर मैं देर कर देता था तो भाई साहब कहते थे "महावीर, मैं सबेरे से तुम्हारे टेलीफोन का इंतजार कर रहा था"। जीवन में उनसे मुझे जो स्नेह मिला, वह मेरे जीवन का बहुत बड़ा संबल रहा। इस वर्ष अर्थात 30 अगस्त, 2014 को मैंने सबेरे ही भाई साहब से क्षमा याचना की। यह हमारी आखिरी बातचीत थी। भाभी जी ने बतलाया कि अब तुम्हारे भाई साहब की तबियत ठीक नहीं रहती। तुम्हें बहुत याद करते हैं। मैंने कहा था कि थोड़ा मौसम ठीक हो जाए। हम अवश्य आयेंगे। मन की साध अधूरी रह गई। हम जाने का प्रोग्राम बनाते ही रह गए। वे महाप्रयाण कर गए। उन्होंने अपनी देह का त्‍याग कर दिया। मन उनकी मृत्‍यु के समाचार पर विश्‍वास करने के लिए तैयार नहीं है। भारतीय साधना परम्‍परा के अनुसार भी मृत्‍यु यात्रा का एक पड़ाव है - नवीन जीवन प्राप्‍त करने का उपक्रम। गीता का वचन है ः- ‘जातस्‍य हि धु्रवो मृत्‍यु ध्रुवं जन्‍म मृत्‍स्‍य च'।

मेरे मन पर बचपन से ही उनके व्यक्तित्व की शालीनता, भव्‍यता एवं उदात्त उत्‍कृष्‍टता की छाप  अंकित है। जब जब मेरे मन में उनके व्‍यक्‍तित्‍व का बिम्‍ब उभरता है वह उनके मनोयोग की मननशीलता एवं आत्‍मबल की तेजस्‍विता को चित्रांकित करता है। मेरे क्षात्र जीवन से ही वे मेरी गतिविधियों में रुचि लेते रहे।

सन् 1984 से लेकर सन् 1988 तक मैं रोमानिया में विजिटिंग प्रोफेसर रहा। सन् 1988 के बाद भारत लौटने पर विदेशों की आय को व्यवस्थित करने के लिए भाई साहब ने मुझे पी.पी.एफ. एकाउण्ट खोलने की सलाह दी। यह सलाह मेरे बहुत काम आई। भाई साहब ने पैतृक सम्पत्ति की आय को अलग करने के लिए मुझे आयकर वकील से मिलकर एच.यू.एफ. बनाने का परामर्श दिया। भाई साहब स्वयं आयकर विभाग में उच्चतम पदों पर कार्यरत रहे। श्रीमती इंदिरा गाँधी जी के कार्यकाल में फेरा (एनफॉर्समैण्ट) के डाइरेक्टर रहे। उनका नाम देश के बड़े से बड़े रईसजादों के मन में सिहरन पैदा कर देता था। सेंट्रल बॉर्ड ऑफ डाइरेक्ट टैक्सिस के सदस्य के रूप में तथा भारत सरकार के उद्योग मंत्रालय के ऍडिशनल सेक्रेटरी के रूप में कार्य करते हुए भाई साहब ने कर्मठता, ईमानदारी एवं शुचिता का कीर्तिमान स्थापित किया। उनसे मुझे सीखने की तथा उनके आदर्शों एवं सिद्धांतों के अनुरूप अपने जीवन को ढालने की प्रबल एवं अदम्य प्रेरणा प्राप्त हुई। वे जीवन भर मेरा होसला बढ़ाते रहे।

रोमानिया से लौटने के बाद तथा केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के निदेशक का पद भार ग्रहण करने के बीच जबलपुर के विश्वविद्यालय में मैंने एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन कराया और उसमें भाग लेने वाले विद्वानों के विचार विमर्श को टेपांकित कराकर रिपोर्ट तैयार कराई। भाई साहब अकादमिक मामलों में बहुत रुचि लेते थे। मैंने उनको भी रिपोर्ट की एक प्रति भिजवाई। उसको पढ़कर भाई साहब ने मुझे जो पत्र लिखा वह उनके मनोयोग को प्रदर्शित करता है तथा मेरे प्रति उनके स्नेह का दस्तावेज़ है। मैं वह पत्र अविकल प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
S.B.Jain
Former
Additional secretary, industry ministry
Member central board of direct taxex
Director of enforcement (fera)                             M-108 Greater Kailash-11
                                                       New Delhi-48
                                                        Date 29-01-1990

प्रिय महावीर और इला
इन दिनों तुम्हारी बहुत याद आई और चर्चा भी। रोमानिया के समाचार सुनकर ऐसा लगा कि तुम कहाँ फँस गये थे और बड़ा अच्छा हुआ कि तुम लोग समय से सकुशल देश वापिस आ गये। जब तुम दिल्ली आओगे तब विस्तार से बात होंगी।

तुम्हारे यहां संगोष्ठी हुई और उसका विवरण भी मिला। इस संगोष्ठी का ज्ञान-स्तर बहुत उच्च कोटि का था। अधिकतर तो ऐसी संगोष्ठी और सेमिनार में बड़ी साधरण बातें ही दुहराई जाती हैं। इसके लिये तुम्हें मेरी ओर से बधई। मैं तो कहता हूं कि हमारे परिवार में सबसे अधिक विद्वान तुम्हीं निकले। यह हम सब के गौरव की बात है।

तुम्हारा नववर्ष की बधई का संदेश भी मिला। हम लोग यही कामना करते हैं कि तुम्हारा यश बढ़ता रहे और तुम देश की और भाषा की सेवा करते रहो, जिससे कई शताब्दियों तक तुम्हारा स्मरण होता रहे।
तुम दोनों को मेरा नमस्कार। प्रिय ऋचा और मनु को हमारा प्यार।
तुम्हारा ही परम स्नेही
आपका
सूरजभान
(देखें- महावीर सरन जैन : पत्रों के दर्पण में (सम्पादक – डॉ. अनूप सिंह) पृष्ठ 48)

मैं भाई साहब के शुचितापूर्ण व्‍यक्‍तित्‍व से सबसे अधिक भावित रहा। उनके संपर्क से मैंने इस तथ्‍य को आत्‍मसात्‌ किया कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में स्‍थायी सफलता के लिए निष्‍कपटता, ईमानदारी, शुचिता तथा कर्मठता की भावना का क्‍या महत्‍व है। मैंने उनके जीवन को बारीकी से देखा और परखा। मैंने उनसे सीखा कि हमें विषम परिस्‍थितियों में भी धैर्य, विवेक, संयम, सहिष्‍णुता, उदारता बनाए रखना चाहिए। उन्‍होंने दूसरों के प्रति प्रेमभाव, मैत्रीभाव एवं मानवीय उत्‍कृष्‍टता की सद्‌प्रवृत्तियों का अपने जीवन में विकास किया। विनम्रता, उदारता एवं करुणा के शीतल जल प्रवाह से उनका चित्त आप्‍लावित रहा।

सन् 1945-46 से मुझे उनके सम्पर्क की बाते याद आ रही हैं। होश सम्भालने से लेकर 30 अगस्त, 2014 तक की क्षमा याचना की अवधि में, उनके प्रबुद्ध चिन्‍तन, संवाद शैली एवं उनकी सहज आत्‍मीय विनम्रता ने जो छाप मेरे मानस-पटल पर अंकित की, उससे प्रसूत स्‍मृति-धाराएँ मेरे हृदय-सागर को लहरा एवं गहरा रही हैं। विनय है कि असीम सत्ता दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे और उनकी स्मृतियाँ हमारे परिवार के सभी सदस्यों को निष्‍कपटता, ईमानदारी, शुचिता तथा कर्मठता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती रहें। 
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संपर्क:
प्रोफेसर महावीर सरन जैन
(सेवानिवृत्‍त निदेशक, केन्‍द्रीय हिन्‍दी)
123, हरि एन्कलेव बुलन्द शहर
Mahavirsaranjain@gmail.com

8 blogger-facebook:

  1. विनय है कि असीम सत्ता दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे.

    हमारी भी विनम्र श्र्द्धांजलि

    चन्द्रकुमार जैन


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    1. संवेदना की सहभागिता के लिए आपको धन्यवाद।

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  2. वह सर्वशक्तिमान परमात्मा दिवंगत आत्मा को शान्ति प्रदान करने के साथ सपरिवार आपको इस अकस्मात क्षति को सहन करने का धैर्य प्रदान करें |

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    1. शोक की घड़ी में आप जैसे मित्रों का संबल शक्ति दायक होता है।

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  3. बड़े भाई का होना ऐसा लगता है कि कंधे पर किसी का हाथ है और कोई कंधा है जिस पर हम सिर रख सकते हैं...हम कितना ही लड़ते झगड़ते रहें किंतु मुझे तो बचपन से ही - अस बिचारि जियँ जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता- की पंक्तियों एवं रामलीला में चारों भाइयों द्वारा निभाए जाने वाले दायित्वों से ही संसार का ज्ञान हुआ है। भाभियों की लाख महिला कुचेष्टाओं के तथापि भी मन में सदैव वही गूंज रहती है जो स्वर्गीय पिताजी वैद्य शिवदत्त रावत जी कहा करते थे कि - चलिबौ तो गैल को चाहें फेर कितनौऊ होइ. बैठिवौ चारि भैयइन कौ चाहै बैर कितनौ ऊ होइ...आपके जैसै भावुक मन और भाषाई परंपरात्मक संस्कृति में रचे-बसे-पगे व्यक्ति के लिए यह बहुत ही नाजुक समय है... हम इस भंवर में आपके साथ हैं...प्रभु उस दैवीय आत्मा को निज धाम में परम पद प्रदान करें ..ऐसी आकांक्षा है.... सादर
    डॉ राजीव कुमार रावत
    हिंदी अधिकारी
    आईआईटी खड़गपुर

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  4. आपकी सम्मति अनुभूतिगम्य होने के कारण अत्यंत मूल्यवान है। आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बड़े भाई वैसे भी पिताजी के बाद सिर पर एक वरद हस्त
    के ही सामान होते हैं फिर आपके भाई साहब विलक्षण
    व्यक्तित्व अपार छमता सहृदय और अत्यंत स्नेही व्यक्ति
    थे उनका अचानक स्वर्गवास आप और आपके परिवार
    की अपूरणीय छति है इस कठिन घडी में भगवान आपलोंगों को इस आघात को सहने की शक्ति दे तथा
    भाई साहब की दिवंगत आत्मा को चिरशांति यही प्रार्थना
    है

    उत्तर देंहटाएं

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