सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

सूर्यकांत मिश्र का आलेख - देव तुल्य बुजुर्गों की सेवा से न भागे हमारा समाज

1 अक्टूबर अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस पर विशेष ...
देव तुल्य बुजुर्गों की सेवा से न भागे हमारा समाज
- सभी को गुजरना है इस राह से -


    वृद्धावस्था इस मृत्युलोक में जन्में प्रत्येक प्राणी के जीवनचक्र का एक अहम पड़ाव है। यह ऐसी अवस्था है जब मनुष्य सहित सभी प्रकार के प्राणियों के शारीरिक ढांचे में थकावट की स्पष्ट झलक दिखाई पड़ने लगती है। सारी इन्द्रियां अपनी युवावस्था को त्याग कर आराम की स्थिति में आ जाती हैं। इसी समय विभिन्न प्रकार की व्याधियां भी सिर चढ़कर बोलने लगती हैं। श्रवणेन्द्रियां शिथील पड़ जाती हैं, आंखों की रोशनी धुंधली होने लगती है। मस्तिष्क की सोचने और समझने की क्षमता भी अपनी पूर्व की स्थिति में नहीं रह पाती है। इतना ही नहीं चलने-फिरने में उपयोगी पैरों की मांसपेशियां भी जवाब दे जाती हैं। हाथों से वजन तो क्या पानी का गिलास भी उठाया नहीं जा सकता है। सवाल यह उठता है कि इस स्थिति में उस वृद्ध अथवा वृद्धा के साथ कैसा व्यवहार किया जाए?  वृद्धावस्था की तकलीफों के आगे सहारा न बनकर भागने वालों को यह याद रखना चाहिए कि यह कोई बीमारी नही स्वयं उनका भी भविष्य है । एक कहावत के रूप में इसे यूं कहा जा सकता है- “बोये बीज बबूल के आम कहां से होय।” अर्थात आप जैसा करेंगें वैसा ही फल पायेंगें।

- सम्मान की परंपरा न भूले युवा भारत -
    हिन्दुस्तान युवा भारत के रूप में सारे विश्व में जाना जाता है। इस बात को स्वीकार करने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि हमारे सांस्कृतिक देश में बुजुर्गों का सम्मान पौराणिक काल की देन है। प्राण जाए पर वचन न जाए, वाले इस देश में  इक्कीसवीं शताब्दी की शुरूआत ने कु छ धुंधली तस्वीरें इस परिपेक्ष्य में प्रस्तुत कर दिखाई हैं। जहां बुजुर्गों की सेवा को  पुण्यकार्य माना जाता था वहां अब इसे परिजन एक अभिशाप मान बैठे हैं। सहारा देने वाले यह भूल रहे हैं कि वृद्धावस्था ईश्वर द्वारा रची गयी इस दुनिया के रंगमंच का अंतिम दृश्य है जो सभी को जीना है। हमारी पीढ़ी यह देख रही है कि उसके माता-पिता द्वारा दादा-दादी, नाना-नानी अथवा अन्य रिश्ते के बुजुर्गों के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया जा रहा है। यही पीढ़ी आने वाले भविष्य में उनका सहारा बनेगी। श्रवण कुमार से लेकर मर्यादा पुरषोत्तम भगवान श्रीराम और भीष्म पितामह की सेवा के कथानकों ने हमें बुजुर्गों के सम्मान का महत्व बखूबी समझाया है। आधुनिकता की चका-चौंध ने हमारे पारिवारिक मूल्यों को बहुत गहरायी तक रूदनावस्था में ला छोड़ा है। बावजूद इन सबके अपनी संस्कृति को विस्मृत कर अपनो को ही बहिष्कृत करना कहीं न कहीं हमारे अपने स्वार्थ को पुख्ता करता दिखायी पड़ रहा है।

- अंतिम संध्या में उजाले की दरकार -
    जीवन की अंतिम संध्या गहन अंधकार में न बीते इसके लिए जहाँ मजबूत कंधों को अपना कर्त्तव्य समझना होगा वहीं दूसरी ओर असक्त हो चुके परिवार के सबसे वरिष्ठजन को भी परिस्थितियों के अनुसार सामंजस्य बैठाने प्रतिबद्धता दिखानी होगी। सामाजिक रूप से वृद्धों की देखभाल युवा कन्धों पर ही डाली जाती है, किन्तु अंधेरी रातों में उजाले की आकांक्षा पूरी करने वालों की व्यस्तता भी किसी न किसी रूप में कुछ सहयोग की अपेक्षा रखती है।  वृद्धावस्था एक ऐसी अवस्था है जो भरपूर सहानुभूति की अपेक्षा रखती है। किसी के प्रति सहानुभूति को प्रकट करना भी मानवता का बड़ा गुण माना जाता है। इसी परिपेक्ष्य में किसी दार्शनिक ने कहा है सहानुभूति सहायता क ी निशानी है। यदि एक असहाय बुजुर्ग पुरूष अथवा महिला से सुबह-शाम उनकी तकलीफों के विषय में पूछ लिया जाये तो यह उनके लिए बड़ी औषधि का काम करता है। उनके खाने-पीने की चिन्ता और किसी प्रकार की इच्छा को टटोलना तो उन्हे वह ताकत दे जाता है जिसकी कल्पना उन्होने सपने में भी नही की होगी। मनुष्य अपने अंतिम पड़ाव में अपनों से ही उम्मीद की आशा छोड़ बैठता है, इसलिए उन्हें यह एहसास कराने की जरूरत है कि हम उनके कद्रदान अभी जीवित है। इस संबंध में प्रसिद्ध शायर ग़ालिब की लाईनें मुझे याद आ रही हैं -
    “किसी को आप बीती न सुना, क्योंकि संसार में प्रेम के रहस्य के सुनने योग्य लोग नहीं हैं। लोग तो दीवार और दरवाजे के समान जड़, यानी सहानुभूति शून्य ही हैं

- आनंद की अनुभूति है-वृद्धावस्था -
    वृद्धावस्था जीवन का उत्तरार्ध कहा जाता है यह जीवन की महत्वपूर्ण कड़ी है जो अगले जम्म की आधार शिला होती है।  वास्तव में देखा जाये तो युवावस्था ही वह उम्र है जिसमें वृद्धावस्था की कहानी छिपी होती है, अर्थात् वृद्धावस्था जीवन क ी एक कड़ी है, जिसका अपना आनंद है और वह आनंद तब मिलता है जब वृद्धावस्था परिपक्व हो जाती है। वृद्धावस्था की अपनी अनोखी मस्ती है। जब वृद्धावस्था पक जाती है तो वह उस पके फल की तरह हो जाती है जो स्वयं अपनी डाल छोड़ देता है। बुढ़ापे में मन एक-एक करके सभी प्रकार की जिम्मेदारियों से मुक्त होने लगता है और अंततः स्वतंत्र होकर एक अलग दुनिया में खो जाता है। यही वह स्थिति है जब मन अपने बेटे-बेटियों के अलावा नाती-पोतों में रमने लगता है। बेटे-बहुओं के व्यंग्य और कटाक्ष के बावजूद मन उन्हीं से जुड़ा रहता है, लेकिन जब मन का कहा पूरा नहीं होता तो घुटन पैदा होने लगती है और यहाँ से बुढ़ापा व्यर्थ की बक-बक और उलझनों में बेकार होने लगता है। ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर बुढ़ापे को कोसा जाने लगता है, ताने दिये जाते हैं और बूढ़ा व्यक्ति उपहास का पात्र बन जाता है। ऐसी विपरीत स्थिति के बनने पर यदि बूढ़ा मन को  मजबूत कर इन चीजों को ऐसे झटक दे जैसे धूल भरी चादर को झटका जाता है तो सारी समस्या खत्म हो सक ती है। प्रायः कहा जाता है कि बुढ़ापे में चिन्तन कुन्द हो जाता है, सोचने-विचारने को क्षमता समाप्त हो जाती है जबकि ऐसा नहीं है। कारण यह कि रामचरित्रमानस की रचना करने वाले महाकवि तुलसी दास जी ने पचहत्तर वर्ष की उम्र पार करने के बाद महाग्रंथ की रचना की । ऐसे एक नही अनेक उदाहरणों से हमारे शास्त्र भरे पड़े हैं।  

- ऐश्वर्य की चकाचौंध ने बे-सहारा किया -
    आधुनिकता के इस दौरा में घर के बड़े-बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता और गंभीरता में कमी होने के पीछे ऐश्वर्य की प्राप्ति और चकाचौंध ही मुख्य कारण के रूप में दिखायी पड़ रहे हैं। हमने स्वयं अपने बच्चों को विद्वान और धनवान बनाने के लिए उस राह पर ला छोड़ा है जहाँ से उन्हे केवल धन का मार्ग ही दिखायी पड़ता है। एक अच्छा इंसान बनने के लिए त्याग और तपस्या उनके आस-पास भी नहीं फटक पाती है। इक्कीसवीं सदी में प्रवेश पा चुके सभी युवकों को सफलता चाहिए, फिर वह किसी भी कीमत पर मिले।  हमारी नयी पीढ़ी यह जानने की उत्सुक नही कि सबसे बड़ी सफलता माता पिता की बुढापे में सेवा ही है।  गंभीरता पूर्वक विचार किया जाये तो इसमें हमारे अपने बच्चों का दोष नहीं क्योंकि हमने उन्हे ऐसा सिखाया ही नहीं कि जीवन में धन-दौलत पाना ही सब कुछ नही, संस्कारों का जीवित होना भी जरूरी है। आज ग्लोबलाइजेशन और औद्योगिकरण का युग है, जिसने सबसे ज्यादा हमारी शिक्षा पर प्रभाव डाला है। नैतिक शिक्षा की पद्धति से बे-खबर बच्चे सस्कारों से भटक चुके हैं। अब तो माता पिता भी अपने पड़ोसी के बच्चों को विदेश में नौकरी करते देख, ऐसी ही कल्पना अपने बच्चों के लिए भी करते हैं। जब बच्चे पढ़-लिखकर विदेशों में धन की इच्छा से रहने लगते हैं तो फिर भारतीय संस्कृति और बुजुर्गों की सेवा का पाठ वे कब और कैसे ध्यान रख सकते हैं। बुजुर्गों की देखभाल के लिए सरकार भी विशेष चिंतित दिखाई नहीं पड़ती है। महंगाई के इस दौर में महज चार-पांच सौ रूपये वृद्धजन भत्ता दिया जाना कौन सी चिंता का परिचय दे रहा है, इसे सभी जानते हैं।

                                           प्रस्तुतकर्ता
                                       (डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                
                                 dr.skmishra_rjn@rediffmail.com

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