सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

दामोदर लाल जांगिड़ का व्यंग्य - सिर्फ श्रद्धांजलियां लिखने वाले

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सिर्फ श्रद्धांजलियां लिखने वाले

अभी कितने ही लम्‍बे अर्से बाद कुछ दिन पहले की एक निहायत ही छोटी सी ख़बर थी कि एक और अदीब इन्‍तकाल फरमा गये। खबर सुनी और एक हजरात ने झट से मरहूम पर एक बड़ा लेख लिख डाला, लिख क्‍या डाला अखबार में छपने भी भेज दिया। उनका इतना उतावलापन देख कर के तो लगा कि ये हुजूर तो जैसे प्रतीक्षा ही कर रहें थे कि कब कोई साहित्‍यकार मरे और कुछ लिखने का मौका मिले। कोई उन हजरात से पूछें कि ऐसी क्‍या जल्‍दी थी, हाँ इतना तो जायज था कि मकतूल के सारे रस्मो रिवाज पूरे होने तक का लम्‍बा इन्‍तजार नहीं करते मगर गरीब को ठीक से दफनाने तो दिया होता। क्‍योंकि ऐसे में जोखिम यह रहती हैं कि अगर दफनाने में कुछ देरी हो जाय तो उस पर लिखा आर्टिर्कल दिवंगत के क्रिया कर्मों से पहले ही छप जाता हैं। उनका लिखा पढ़ कर तो शक भी होता कि जनाब ने पूरा लेख या तो उस लेखक के बीमार होने की खबर सुन कर ही लिखना शुरू कर डाला होगा या फिर ऐसे कुछ लेख लिख कर तैयार ही रखते हैं सिर्फ मरने वाले लेखक का नाम आदि बाद में समायोजित कर देते होंगे।

मुझे उस लेखक के बिना कोई एक आध साहित्‍यिक पुरस्‍कार लिये ही जन्‍नतनशीं हो जाने का दुखः उतना नहीं हुआ जितना उस पर श्रद्धान्‍जलि स्‍वरूप लिखे लेख को पढ़ कर हुआ । क्‍योंकि यही लेख अगर उसके जिन्‍दा रहते उसके किसी छपे आर्टिकल किसी ने उसका दिल रखने के लिये ही लिख दिया होता जो शायद वो लेखक यकीनन कुछ और जीने का मानस जरूर बनाता और न सही कम से कम आज दिन तो जरूर जिन्‍दा होता और ज्‍यादा नहीं तो साल दो साल तो और जी ही लेता। जब वो जिन्‍दा था तब तक तो उसे पुरस्‍कार में अपना कम्‍पीटीटर मान कर कभी उसकी टांग खिंचाई का कोई अवसर नहीं छोड़ा करते थे और आज जब मर ही गया तो अब उससे किसी को भी कभी कोई भी खतरा नहीं जान कर उसकी तारीफें करने का मौका भी नहीं चुके। यह साहित्‍यकरों की एक मानीखेज हरकत का नायाब नमूना हैं

। मुझसे रहा न गया और रहा नहीं गया और मैंने झट उनको टेलुफोन पर लिया। उन्‍होंने ठीक से नमस्‍कार का आदान प्रदान ही नहीं होने दिया और बोले कैसा लगा उन पर लिखा मेरा ताजा आर्टिकल। मैंने कहा जनाब उन पर लिखा आपका आर्टिकल तो कैसा है बहुत बाद की बात हैं कम से कम इतना तो पता अवश्य लगाते कि आपने जिस पर आर्टिकल लिखा हैं वो खुद कैसा है। एक मैंने ही क्‍या आपके अलावा किसी ने भी उनके मरने की कोई खबर सुनी ही नहीं। आज कल इस साहित्‍य के क्षेत्र में भी जमाना खराब चल रहा हैं, साहित्‍यकार लाग ऐसे भी हैं जो अपने नाम से मिलते जुलते नाम वाले किसी के मरने का भी फायदा उठाने से भी नहीं चूकते। हो सकता हैं कि उस साहित्‍यकार के मरने की खबर सही निकले, नहीं तो उसने आपकी प्रवृत्ति का फायदा उठा कर जबरन आपसे अपनी तारीफ करवा ही ली। वो रूआंसे हो कर बोले अगर ऐसा ही हुआ तो फिर मुझे क्‍या करना चाहिए। तो मैंने प्रत्‍युत्‍तर दिया कि आइंदा आरको इतनी जल्‍दी नहीं करनी चाहिए,कम से कम मरने वाले साहित्‍यिकार के घर बैठक में जाकर उसके मर जाने की तस्‍दीक कर लेनी चाहिए।

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