रविवार, 5 अक्तूबर 2014

मधुरिमा प्रसाद की लघुकथा - कुत्ता उठ गया 

कुत्ता उठ गया 

          सो कर उठते ही घर के बाहर कुछ चिकिर-चिकिर, कचर-पचर सी होती सुनायी पड़ी। बाहर निकल कर देखा, बगल के घर के सामने कुछ लोग जमा हैं और आपस में बाता-बाती किये जा रहे हैं। कई लोगों के एक साथ बोलने के कारण, बात कुछ समझ में नहीं आयी। टूटे-फूटे शब्दों में इतना भर सुन पड़ा---'अये है ! बेचारे को किसी ने मार डाला।' इतनी जानकारी से बढ़ी हुई सहज उत्सुकता के कारण उसी झुण्ड में पहुँचना आवश्यक लगा। पास जाने पर पता लगा कि उस घर के सामने जहाँ एक छोटा सा कूड़ा अड्डा बना हुआ था वहाँ एक कुत्ता मरा पड़ा है। 

          वहाँ पर तरह-तरह की बातें चल रही थीं। 

          कोई कह रहा था ---'किस बेदर्द ने मार डाला इसे।'  

          तो कोई कह रहा था ---'अरे नहीं जी ! मारेगा कौन ! अपने से ही मर गया होगा।' 

          तभी किसी ने कहा ---'लगता है कोई गाड़ी टक्कर मार गई।' 

          तभी एक महिला ऊँची आवाज़ में बोल पड़ी ---'अरे देखो न, ( घसीटने का निशान दिखाते हुए ), देखो, देखो ! इसे तो कहीं और से घसीट कर लाया गया है। फ़िर ये तो कोई बहिल्ला कुत्ता भी नहीं लगता है; पालतू लग रहा है।' 

          पीछे से अन्य कोई भी उसकी बात का समर्थन कर बैठा ---'नस्ल भी अच्छी मालूम पड़ती है।' 

          तब तक किसी ने कुत्ते के साथ अपनी पहचान भी निकाल ली ---'अरे ये तो बग़ल वाली गली का ही है। एक घर से निकलते-घुसते मैंने इसे कई बार देखा है।' उनके शब्दों का वज़न ये ज़ाहिर कर रहा था कि उस कुत्ते से पहचान होना कोई मामूली बात नहीं है। 

          इसी तरह सब अपनी-अपनी अटकलें लगा रहे थे कि एक दो आने-जाने वाले भी मुफ़्त में सलाह देते हुए आगे बढ़ गए थे। उनका समय शायद कीमती था इसीलिए सिर्फ सलाह ही दे सके थे कि 'अरे आप सब तमाशा ही देखोगे या इसे हटवाओगे भी ? अभी कुछ ही देर में ये फूलेगा, फिर फटेगा, बदबू फैलायेगा और उसके बाद बीमारी फैलेगी।'                 

          किसी की बुद्धि ने थोड़ा तेज़ी दिखाई ---'अरे डोम बस्ती तो पास में ही है कोई जा कर डोम बुला लाओ।' 

          पर अपनी जगह से हिल कोई नहीं रहा था। हिलता भी कैसे ! सौ-डेढ़ सौ का मामला लग रहा था ! जो कि किसी के घरेलू बजट में नहीं आता था।  

           तभी एक सज्जन टहलते हुए उधर आ निकले। सभी को लगा ये भी कुछ राय मशविरा देंगे ही। सब की नज़रें उनकी और उठ गयीं। वे अपने मोहल्ले के तो लग नहीं रहे थे इसलिए अपने से उनसे बोलने की पहल कौन करता भला ! पर उसकी ज़रूरत नहीं पड़ी। वे स्वयं भीड़ में घुसते हुए बड़ी गम्भीरता से बोले ---'क्या हुआ भाई ? ये भीड़ कैसी है ?'

          फिर माजरा समझ में आने के बाद सब की तरफ देखते हुए बोले ---ओफ़्फ़ो ! बस ! इतनी सी बात ! इसमें इतना परेशान होने की क्या ज़रूरत है। बगल में डोमों की बस्ती है, चार पैसे ही तो खर्च होंगे, अभी फिंकवाये देते हैं।'

          सभी के चेहरों पर राहत के साथ ही चमक भी आ गयी। सब ने एक-दूसरे को ऐसे देखा जैसे सब को उबारने के लिए वहाँ साक्षात् भगवान का ही आगमन हो गया हो। 

          'सब लोग दस-दस का नोट निकालिये। चुटकियों में काम हो जायेगा।' उस अजनबी की आवाज़ ने पूरी भीड़ का ध्यान अपनी और खींच लिया। अब, जबकि सवाल मात्र दस रूपये का था कोई कैसे मना करता ! वहाँ लगभग बीस-बाइस लोग जमा थे। सबको लगा चलो एक आदमी ज़िम्मेदारी ले रहा है, ये क्या कम है। सबने सहर्ष उनके हाथ में दस-दस के नोट थमा दिए। उन्होंने स्कूटर उठाया और लगभग पन्द्रह मिनट बाद अपने पीछे-पीछे एक सायकिल रूपी भैंसे पर डोम रूपी यमराज को लादे हुए आते दिखाई पड़े। उस डोम रूपी यमराज ने अपनी सायकिल रूपी भैंसे को एक किनारे खड़ा किया, फिर साथ लायी हुई रस्सी निकाल कर उसका एक सिरा उस स्वर्गवासी कुत्ते की टांग में बाँधा, दूसरा अपने हाथ में थाम कर सायकिल रूपी भैंसे पर चढ़ कर चल दिया। 

          वो अजनबी सज्जन भी अपना स्कूटर स्टार्ट करने लगे तो सभी लोग उनके पास पहुँच गए। एक ने उनका हाथ अपने दोनों हाथों में ले कर उन्हें धन्यवाद देते हुए कहा ---'भाई साहब ! आप बड़े मौके से आये और हमें इतनी बड़ी समस्या से छुटकारा दिला दिया। हम तो समझ ही नहीं पा रहे थे कि क्या और कैसे किया जाये !  आपका बहुत-बहुत धन्यवाद !'            

          'अरे नहीं, नहीं, भाई साहब ! शर्मिंदा न कीजिये; धन्यवाद की कोई ज़रूरत नहीं है इतना तो अपना कर्तव्य बनता है।' और फर्राटे के साथ उनका स्कूटर आगे बढ़ गया। 

          सबने सुकून की साँस ली। मुसीबत से छुटकारा मिल चुका था। तभी एक दस-बारह साल का लड़का, जो स्वयं भी इस सारे तमाशे का चश्मदीद भी था, आया और बोला---'अंकल, अंकल ! वो आदमी कुत्ता भी ले गया और पचास रूपये भी ले गया ?'

          अगले ने पूछा ---'कैसे पचास रूपये ?'

          इस पर वह बोला---'वो जो स्कूटर वाले अंकल थे न, उन्होंने दिए थे।'

फिर पल भर रुक कर बोला---'अरे वही अंकल जो उस कुत्ते के घर में रहते हैं '                            *************************

         

3 blogger-facebook:

  1. आज कल मौत भी कुछ लोगों का व्यापार बन जाती है..
    बहुत सोचा समझा व्यापार... वहीं हम लोग मात्र तमाशबीन होते जा रहे हैं-
    रचना इस बात को बखूबी समझानें में सफल रचना रही...

    अच्छी प्रस्तुति...
    नमन

    उत्तर देंहटाएं
  2. आजकल दुनिया बहुत यांत्रिक होती जा रही है और
    मतलबी भी यह कहानी इसका जीता जागता उदहारण
    है एक अच्छी कहानी प्रस्युत करने के लिये बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  3. उत्तम भावपूर्ण कहानी जो हमारे पास पड़ोस की हकीकत भी है मधुरिमा जी बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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