बुधवार, 22 अक्तूबर 2014

मोहम्‍मद इस्‍माईल खान की कहानी - पेन्शन

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पेन्‍शन

दामोदर मास्‍टर धुले हुये लट्‌ठे का सिलवटों भरा कुर्ता पायजामा पहने, सूखे पैरों में, सूखी बदरंग हुई चप्‍पलें डाले, ढ़ेर सा सरसों का तेल सर में चिपड़े अपने बेटे की पीछे बैठे स्‍कूटर से कोषालय की ओर चल पडे़। उबड़-खाबड़ रास्‍ता ओर तेल से चिकने हाथ स्‍टेपनी और हेन्‍डिल से बार-बार फिसलते तो दामोदर बाबू सर्कस करते नज़र आते। वे सम्‍भलने की कोशिश करते, बेटा डॉट भरी आवाज में कहता-आज गिरायेगें क्‍या? ज़रा सीधे बैठिये! दामोदर बच्‍चो की तरह सहम जाते। उनके चेहरे पर अपमानित होने के भाव, पास से गुजरने वाले राहगीरों के सिवा कोई न देख पाता।

हर महिने, उनके लिये यह सर्कस करना अनिवार्य था। पेन्‍शन मिलने का दिन जो होता था, आज का दिन। आज के दिन का इंतजार दामोदर बेसब्री से करते, और मन ही मन खुश रहते। पता नहीं आज की यह खुशी पेन्‍शन मिलने की है, या इसकी कोई और वजह है।

कोषालय कार्यालय के कम्‍पाउंड में दामोदर का यह सर्कस समाप्‍त हुआ और स्‍कूटर से उतर कर पुराने पीपल के इर्दगिर्द बने चबूतरे की ओर बढ़े उनके एक दो साथी पहले से आकर बैठे थे। बेटे ने स्‍कूटर का स्‍टैण्‍ड लगाते हुये कहा-भागने की क्‍या जल्‍दी पड़ी है, पेन्‍शन की किताब तो दीजिये!

घबराहट और अपमान से काँपती ऊंगलियों से आगे की जेब से पेन्‍शन की छोटी किताब खींच कर निकाली, तो पुरानी पड़ चुकी किताब के ऊपर कव्‍हर पिन से अलग हो गया। भयभीत बच्‍चे की तरह कातर नज़रों से बेटे की ओर देखा और काँपते हाथों से किताब आगे बढ़ाई। बेटे ने किताब झटक कर यूँ गुस्‍से से देखा कि कहीं सबसे सामने हाथ ही न उठा दे। अपमान सहते सहते अपमान भाव दामोदर के चहरे पर स्‍थायी रूप से जम गये थे।

यहीं बैठना कहीं जाना मत-एक आदेश देकर वह कार्यालय की ओर चला गया। दामोदर बाबू इस तरह चबूतरे की ओर बढ़े जैसे किसी हादसे से बचकर आये हों। अपने साथियों के सामने दामोदर बाबू की स्‍थिति ऐसी हो गई थीं, जैसे बेआबरू हो चुकी औरत अपने तार-तार हुये कपड़ों से तन ढांकने की कोशिश करती है और उसकी पीड़ा फटे कपड़ों के बीच से झाँक कर उसकी बेबसी बयाँ कर ही जाती है।

दामोदर बाबू -उनके साथियों ने दामोदर बाबू के अपमान को नज़र अन्‍दाज कर उनका स्‍वागत किया। ये स्‍थिति तो उनके जीवन में भी रोजमर्रा की बात थी। क्‍या बात है, पेन्‍शन के दिन के अलावा नज़र ही नहीं आते?

अब क्‍या नज़र आये, बूढ़े जो हो गये है। भजन पूजन में समय गुजर जाता है, बाकी खाते-पीते और आराम करते है।

कुछ इधर - उधर की बातें की, कि बेटा अखबार की बड़ी सी पुड़िया दामोदर को थमा गया, जिसका इंतजार दामोदर मन ही मन कर रहे थे। पुड़िया में बासी तेल में सने दो समोसे, कुछ भजिये और चार छः बासी जलेबियाँ थी, जैसे ठण्‍ड से अकड़ी हुई। लगता था ये सारा ''माल'' कल बिकने से बच गया था और हफ्‍तों से चीकट कढ़ाई में पड़े तेल में फिर गरम कर केन्‍टीन वाला बैच रहा था। दामोदर बाबू ने ललचाकर पुड़िया खोली, और जल्‍दी से खाना ही चाहते थे, कि शिष्‍टाचारवश उनके साथियों से कहा-लीजिये..............आप भी लीजिये......................।

नहीं-नहीं आप ही खाईये, हम तो घर से खाना खाकर आये है। दामोदर के साथियों की हालत भी कुछ अच्‍छी न थी। उनकी इबारतें उनके चेहरों से पढ़ी जा सकती थी, पर शिष्‍टाचरण तो करना ही पड़ता है साथियों के ना कहते ही, एक हाथ से पुड़िया थामी और उसमें मुंह घुसा कर जल्‍दी- जल्‍दी खाने लगे। भूख से व्‍याकुल पेट के आगे उन्‍होंने समर्पण कर दिया।

साथियों ने कहा-दामोदर बाबू तो बड़े भाग्‍यशाली है। 'श्रवण' जैसा सेवाभावी बेटा मिला है।

दामोदर मन ही मन अपने भाग्‍य को परखने लगे। दामोदर मास्‍टर किसी जमाने में बच्‍चों को श्रवण कुमार की कथा पढ़ाया करते थे। पर आज अपने बुढ़ापे में उन्‍होंने जाना कलयुगी श्रवणकुमार के माता-पिता प्रेम को। श्रवण कुमार की पुरानी कथा अब उन्‍हें काल्‍पनिक लगने लगी। एक सूखी बेजान हँसी उनके होटों पर तेरी। सर झटक कर वे फिर खाने में लग गये। उनकी बदहाली वे क्‍या बयाँ करें, वह तो खुद ही उनकी हालत से जा़हिर थी।

कहावत है कि बूढ़ा और बच्‍चा समान होते है। बूढ़ा भी कमजो़र, बच्‍चा भी कमजो़र। पर बूढ़े व्‍यक्‍ति के पास होता है, स्‍वाभिमान, अनुभव का खजाना, बुजुर्गी की गरिमा, अपने बड़े होने का अहसास, अपनी सफल पारी खेल जाने की ठसक। परन्‍तु जब अपने ही बच्‍चे उनके ये आभूषण बेकार सी चीज़ समझ, उनके व्‍यक्‍तित्‍व से नोचकर उनको नंगा कर दें, तो वह ऐसे जाते है जैसे अपराध बोध से सहमा एक लाचार और बेबस बालक।

दामोदर मन ही मन ईश्‍वर से प्रार्थना करने लगे कि पेन्‍शन के लिये उनका नाम सबसे आखिर में पुकारा जाय तो अच्‍छा। ताकि आज के दिन के इंतजार का मकसद तो पूरा हो। देरी होने पर बेटा, सड़क से उस पर ''रामभरोसे'' होटल में खाना भी खिला देगा। जहाँ थाली का मलतब भरपेट भोजन। आखिर दामोदर बाबू के बूढ़े शरीर में अटकी आत्‍मा को ज्‍यादा से ज्‍यादा समय तक रोके रखना, बेटे की भी तो जरूरत है, और फिर उनकी महिने भर से सूखती-सिकुड़ती आंतड़ियों को कुछ राहत भी मिल जायेगी।

भूख की शिदद्‌त दामोदर को आज के दिन का इंतजार कराती तो रोज़ का जीवन भी आसान नहीं था दामोदर का। आज रोज की तरह बड़े सबेरे उठ कर सारे घर का पानी नहीं भरना पड़ेगा। घर के आँगन में बने कुऐं पर पड़ा रस्‍सी डोल यूँ ही देर तक पड़ा रहेगा। आज रस्‍साकशी का खेल नहीं होगा। उनकी हथेलियों की पिठठ्‌न कुछ राहत महसूस करेगी। उनके कमजो़र हाथों पर उभरी नसें और न फूलेंगी। उनके पास धोने निचोड़ने को तो कुछ है नहीं। आज ही के दिन पहनने वाला लट्‌ठे का कुर्ता पायजामा, बस ...............। बाकी समय तो दामोदर बाबू का एक मैले बोसीदा पायजामें और नीम आस्‍तीन में गुज़र जाता है। तन ढका रहे यही कोशिश रहती है सदा। सर्दियों के मौसम में, दस बरस पहले रिटायरमेंट के समय भेंट स्‍वरूप मिली शाल, जिसका रंग अब पहचाना नहीं जाता और जगह-जगह कसारियों द्वारा बनाये गये छेदों से पटी हुई है। एक खालिस ऊन का स्‍वेटर जो स्‍वर्गवासिनी पत्‍नि ने पन्‍द्रह साल पहले बुना था और एक पुरानी ऊनी टोपी, पता नहीं कहाँ से दामोदर बाबू के पास आ गई थी। इन्‍हीं सब में दामोदर का जीवन कट रहा था। पर घर के कपड़े तो उन्‍हें धोने ही होते है। बेटे और बच्‍चों के कपड़े। बहू की साड़ियाँ, ब्‍लाऊज और बहू द्वारा बेशर्मी से डाले गये अंतरंग वस्‍त्र भी। अब आदत सी हो गई है तो अपमान भी महसूस नहीं होता। सारे घर आँगन को बुहारने के बाद ही कभी आधा पेट नसीब होता है तो कभी ...................।

बेटे की कठोर आवाज से दामोदर बाबू को तन्‍द्रा टूटी - चलिये नम्‍बर आ गया है। आज्ञाकारी बालक की तरह दामोदर बेटे के पीछे चल दिये।

यहाँ हस्‍ताक्षर कीजिये - ट्रेजरी अधिकारी ने कहा।

दामोदर ने काँपते हाथों से हस्‍ताक्षर किये। अधिकारी ने उनके हाथों में कुछ नोट थमाते हुये कहा - गिन लीजिये।

दामोदर ने हर बार की तरह नज़रें उठा कर बेटे की ओर देखा उसकी गिद्ध दृष्‍टि, दामोदर के कमजो़र काँपते हाथों में पड़े नोटों पर थी। फिर उसने दामोदर की सहमी आँखों में देखा और दामोदर का अस्‍तित्‍व पिघले मोम की तरह बह निकाला। उन्‍होंने काँपते हाथ बेटे की ओर बढ़ा दियें। इस आखरी अनुष्‍ठान के बाद उनका आज का पेन्‍शन पर्व पूरा हुआ। बिना आत्‍मा का शरीर लिये दामोदर बेटे के पीछे -पीछे कार्यालय से बाहर आ गये

 

मोहम्‍मद इस्‍माईल खान

एफ-1 दिव्‍या होम्‍स्‌ सी 4/30 सिविल लाईन

श्‍यामला हिल्‍स्‌ भोपाल 462002

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