मंगलवार, 7 अक्तूबर 2014

सप्ताह की कविताएँ

डॉ चन्द्रकुमार जैन

उबारने की याचना से 

बेहतर है 

जूझने की प्रार्थना !


भगवान से प्रार्थना कीजिए,याचना नहीं।

आपकी स्थिति ऐसी नहीं कि

कमजोरियों के कारण

किसी का मुँह ताकना पड़े

और याचना के लिए हाथ फैलाना पड़े

प्रार्थना कीजिए कि

मेरा सोया हुआ आत्मबल जागृत हो

प्रकाश का दीपक जो विद्यमान है

वह टिमटिमाए नहीं

वरन रास्ता दिखाने की स्थिति में बना रहे

मेरा आत्मबल मुझे धोखा न दे

समग्रता में न्यूनता का भ्रम न होने दे

जब परीक्षा लेने और शक्ति निखारने हेतु

संकटों का सैलाब आए

तब मेरी हिम्मत बनी रहे

और डूबने के बदले जूझने का

उत्साह भी बना  रहे कि ये बुरे दिन

अच्छे दिनों की सूचना देने आए हैं

प्रार्थना कीजिए कि 

मैं कभी हताश न होऊँ 

लड़ने की सामर्थ्य को

पत्थर पर घिसकर धार रखते रहें

योद्धा बनने की प्रार्थना करें

भिक्षुक बनने की नहीं !

जब अपना भिक्षुक मन गिड़गिडाए

तो उसे दुत्कार देने की प्रार्थना भी

भगवान से करते रहें।

बस फिर क्या - 

प्रार्थना ही पाना बन जायेगी

याचना खुद अलविदा कह जायेगी।

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प्राध्यापक, दिग्विजय कालेज 

राजनांदगांव। 

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विजय वर्मा

 मिटटी के दीये
 
दीये !
तुमने तो हमें
रौशनी ही दिये  ,
और बदले में  हमने
तुम्हें क्या दिये -----
उपेक्षा और तिरस्कार ,
परंपरा का त्याग ।
वह भी आखिर किसके लिए !
चीन में बने
क्षण-भंगूरों के लिए ।
कम हुआ मिटटी का कटना 
कटते गए हम जड़ों से ,
सामाजिक समरसता के 
रुक गए पहिये। 
दीये !
शतकों से सिमटकर
रह गये दर्ज़नों तक ,
शायद अगली बार
रह जाओ सिर्फ पांच तक
वह भी सिर्फ
पंच -देवों के लिए।
दीये !
कपड़े की बाती
माँ घी में सिंझाती ,
तब उसके आलोक से
भर उठते थे हिये।
दीये !
अब सादगी और पवित्रता
कहाँ है भाती !
चेहरे पे मुस्कान
बनावटी चीजें ही ला पाती।
ऐसे में तू भी आखिर
जीये तो
कैसे जीये।
दीये !
 
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विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र' 

गीत -

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राणा तुमको शत-शत प्रणाम ।।
थे वीर शिरोमणि त्यागी तुम,
माँ के  सच्चे   अनुरागी  तुम 
ना भटके  लोभ-प्रलोभन में ,
रहे   स्वतंत्रता  के  हामी तुम 
वन-वन  भटके  ना  बने  गुलाम ।।
राणा तुमको....
धरती   माँ  के  सच्चे  सपूत ,
थे धर्म-ध्वजा  के तुम वाहक 
मित्रों को  शीतल  शशि जैसै ,
दुश्मन को  अग्नि से  दाहक 
अरिदल में  भगदड़ मच  जाती ,
चेतक  की  खींचे  जब  लगाम ।।
राणा तुमको...
  कूंचा-कूंचा   अब   भी , 
  तेरा   यश  गाये
  तीर्थ बन गई रक्त -तलाई ,
  सब आकर शीश झुकाएं 
हल्दीघाटी धन्य हो गई ,पाकर तेरा नाम ।।
राणा तुमको...
आन-वान  ना  तजि ,
तजे थे तुमनें भोग रसीले 
हम गर्विले  तुम  पर  राणा ,
हे  साहसी,  वीर ,  हठीले 
था  मेवाड़ी  प्रखर- सूर्य , 
जो चमका  आठों - याम ।।
राणा तुमको शत-शत प्रणाम ।।
      -विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र' 
गंगापुर सिटी, स. मा. ,(राज.)322201
> ईमेल:-vishwambharvyagra@gmail.com

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देवेन्द्र सुथार 

आज का युवा


जीवन को जुआ मानते,

मोबाइल से मौज उडाते।

गुटके को गुड मानते,

संगीत को सगा मानते


पर....


मौत से मतलब नहीँ रखते

हिम्मत का हथियार नहीँ रखते।

कर्म तो करना ही नहीँ चाहते,

सत्य को स्वीकार नहीँ करते।

भाग्य पर भरोसा नहीँ करते,

जवानी का जश्न मनाते,

प्रेम का प्रसाद बांटते


पर...


परिश्रम से पंगा नहीँ लेते,

नम्रता का नाम नहीँ सुनते।

सेहत की सेहज नहीँ करते,

शराब का शौक नहीँ भूलते।




जीवन की मुख्य बातेँ


कविता को गलत पढ के सुधारा जा सकता है।

जीवन को एक बार गलत पढने पर

सुधारा नहीँ जा सकता है।

सदा ध्यान रखो अपने जीवन का,

लक्ष्य को गढ लो अपने कर्म से।

दूसरोँ को दोष मत देना,

करो काम ऐसा की जग-जग याद करेँ नाम तुम्हारा॥

व्यक्ति मरता है,उसका कर्म नहीँ।

अमर रहता है उसका नाम उसका शव नहीँ॥




नेत्रदान


जिन्दगी के लम्हेँ हैँ कम,

हर लम्होँ मेँ जी लो जीवन,

मौत कभी भी है अनजान,

अमर रहना है तो कर दो नेत्रदान।

संसार मेँ चाहे,न किया हो और किसी का भला,

जीवन भर करते रहे,तुम्हारा! तुम देखो-मैँ चला।

जाने से पहले, किसी को देँ तो जीवनदान,

अमर रहना है तो कर दो नेत्रदान।

तुम्हारी आँखोँ से वह देखेगा संसार,

देखेगा खुशी से,साकार करेँगा,अपने सपनोँ

और

करेगा जगत कल्याण

अमर रहना है, तो कर दो नेत्रदान।




माँ


माँ की दवाई का खर्चा उसे मजबूरी लगता है।

उसे सिगरेट का धुआं जरुरी लगता है।

फिजूल मेँ दोस्तोँ के साथ घूमना,

माँ से मिलना मीलोँ की दूरी लगता है।

वो घंटोँ लगा रहता फेसबुक के अजनबयियोँ से बतियाने मेँ

माँ का हाल जानना उसे बचकाना लगता है।

खून की कमी से मरते रोज लाचार माँ,

वो दोस्तोँ के लिए शराब की बोतलेँ खरीदता फिरता है।

वो बडी कार मेँ घूमता, लोग उसे रहीम करते,

पर बडे मकान मेँ माँ के लिए जगह थोडी रखता है।

माँ को देखे जमाना हुआ,

मगर बीबी का चेहरा उसे सुहाना लगता है।

माँ का दर्द माँ ही जाने।



-देवेन्द्र सुथार,बागरा,जालौर,राज.।

devendrasuthar196@gmail.com

1 blogger-facebook:

  1. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 9/10/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

    उत्तर देंहटाएं

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