ओम प्रकाश शर्मा का आलेख - माँ की सीख व स्वच्छता

image

माँ की सीख व स्वच्छता

विद्यालय प्रबंधन समिति के सदस्यों की कार्यशाला में स्वच्छता व बीमारियों की रोकथाम विषय पर जानकारी देने के लिए स्थानीय डॉक्टर को बुलाया था। उन्होंने बीमारियों की रोक थाम के लिए शारीरिक स्वच्छता कितनी आवश्यक बताते हुए अपने विषय पर प्रकाश डालना प्रारम्भ किया। उन्होंने सभी को सम्बोधित करते हुए पहली बात जो कही वह हाथ धोने से सम्बन्धित थी। उन्होंने बताया कि आजकल हम लोगों में से अधिकाँश अच्छी प्रकार से हाथ धोने का तरीका तक नहीं जानते जिस कारण हाथों में गन्दगी रह जाती है और कीटाणु हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं जिससे हम बीमारियों की चपेट मेन आ जाते हैं। हम अकसर हाथ में मामूली साबुन लगा पानी से उसे धो देते है लेकिन उससे हाथ साफ नहीं होते। हाथ साफ करने के लिए क्या करना चाहिए यह समझाते हुए उन्होंने बताया कि पहले पानी से हाथ गीले कर हाथ में साबुन अच्छी प्रकार से लगाओ और हाथ को अन्दर बाहर दोनों ओर से मलो, दोनों अंगूठों को दूसरे हाथ से बारी बारी से मलो, हाथ की पाँचों अँगुलियों की पोरों को बारी बारे से दूसरे हाथ की हथेली पर मलो आदि लगभग दस बातें हाथ के धोने के बारे में बता दी। उपस्थित सभी लोग उनकी बात को बड़े ध्यान से सुन रहे थे और डॉक्टर महोदय जिस प्रकार संकेत से उन्हें समझा रहे थे वे अपने हाथों से उसका अभ्यास भी कर रहे थे। मैं सोचने लगा कैसा ज़माना आ गया है कि हाथ को साफ करना सिखाने के लिए भी डाक्टर की आवश्यकता आ पडी है। माँ जिसे पहली शिक्षिका का सम्मान दिया जाता है तथा परिवार के सदस्य एक बालक को हाथ धोना तक सिखाने में असमर्थ हो गए हैं। फिर मन ही मन प्रश्न उठा कि वे सिखाए भी कैसे, जब उन्हें स्वयं ही इसका ज्ञान नहीं है और आज सीख रहे हैं। यदि उन्हें ज्ञात होता तो एक डॉक्टर महोदय को आज यह सब कुछ बताने की आवश्यकता न पड़ती। इसके बाद बहुत सी ज्ञानवर्धक बातें उनके द्वारा बताई गई पर मेरे मन में एक ही बात बार बार उमड़ रही थी कि भारत जो स्वच्छता पवित्रता को सदैव प्राथमिकता देता है उसे अपना कर्त्तव्य मानता है , धरती को पवित्र रखने के लिए, हर कार्य में धरती माँ को देवी के रूप में पूजता आया है किस प्रकार इतना नीचे गिर गया कि उसे हाथ धोना भी नहीं आता|

सांयकाल के सत्र में मुझे भी कुछ बोलना था और मैंने अपनी बात को हाथ धोने की बात से जोड़ते हुए प्रारम्भ किया, “ भाइयों और बहनों प्रात:कालीन सत्र में डॉक्टर साहब ने आपको समझाया कि हाथ कैसे धोने चाहिए। इसी प्रकार की शिक्षा मेरी माता जी ने भी जब मैं केवल तीन चार साल का था मुझे सफाई के बारे में बहुत ही सरल तरीके से मुझे दी थी जिसे मैं आजतक कभी भूला ही नहीं। मैं आज तक उनकी उस बात का अनुसरण करता हूँ । इस पर कुछ ने पूछा, “ ऐसा क्या बताया था ?”

उन्होंने कहा था, “ बेटा! दोनों हाथों में हमारा दाहिना हाथ बहुत पवित्र होता है इससे हम अच्छे अच्छे कार्य करते हैं, इससे हम भोजन करते हैं, इससे हम दान पुण्य करते हैं , इसी से हम लिखते है पूजा कर्म में भी इसी हाथ का प्रयोग करते हैं इसलिए जब हम हम अपने शरीर की गन्दगी की सफाई करें तो हमेशा बाएँ हाथ से ही कर्नी चाहिए।” अब मैंने उपस्थित महिलाओं की ओर इशारा करते हुए प्रश्न किया “आजकल आप में से कितनी माताएँ अपनी सन्तान को इस बात को समझाती हैं और कितनों  को उनकी माता ने यह बात बताई है?”

थोड़ी देर के लिए कोई कुछ नहीं बोला कुछ देर बाद एक महिला खडी हो कहने लगी,” मैं तो अपने बच्चों को बतातीं हूँ |”

मैंने कहा, “आप ठीक करती है लेकिन हमारे शहरों में माताएँ तो दाहिने हाथ से ही सफाई करती है और दाहिने हाथ से ही खाती है क्योंकि बाएँ हाथ में तो उनके बड़े- बड़े नाखून होते हैं|” मेरे इतना कहने पर वह महिला अपने बढ़े हुए नाखून छिपाने लगी। मैंने उन्हें समझाया कि डॉक्टर साहब ने जिस प्रकार हाथ धोने की बात कही उससे नाखून के अन्दर की गन्दगी दूर नहीं हो सकती लेकिन हमारी महिलाएं जब आटा गूंथती है तो उसमें सारा मैल आटे में आ जाता है। और वह गन्दगी सारे भोजन को दूषित कर देती है। मात्र इतना कहने के बाद मैने उन्हें नैतिक मूल्यों के बारे में बताना प्रारम्भ किया ।

कई महीने व्यतीत हो गए। एक दिन गाँव के एक प्राथमिक विद्यालय में मुझे निरीक्षण् दल के एक सदस्य के रूप में जाने का अवसर मिला। सभी औपचारिकता पूरी करने के बाद हमने बच्चों को एक कक्ष में एकत्रित कर उनसे कुछ बाते जाननी चाही। बात ही बात मैने उनसे पूछा,” आपके शौचालय की सफाई कौन करता है” वे तो बहुत साफ हैं तो बच्चे कहने लगे,” हम खुद करते है।“

मैंने कहा,’ कैसी करते हो ?”

“पहले पानी डालते है फिर ब्रश से साफ़ करते हैं और फिर और पानी डालते हैं|”

”शाबाश! अब आप बताओ आप अपनी सफाई कौन से हाथ से करते हैं?”

केवल एक बालिका बोली,” बाएँ हाथ से।”

मैंने उसी से प्रश्न किया, “दाहिने से क्यों नहीं?”

“क्योंकि हम इस हाथ से खाना खाते है,लिखते हैं”

मैंने पुन: पूछा, “ क्या यह आपकी मैडम ने बताया है?”

“नहीं मेरी माताजी ने।”

बाद में मुझे पता चला कि उस बच्ची की माँ विद्यालय प्रबंधन समिति की सदस्य हैं और वे उस दिन जिस दिन मैंने यह बात समझाई थी कार्य शाला में उपस्थित थीं। पहले माताओं का समझाने का तरीका निराला होता था। वे शिक्षा देने के लिए अपने आराम की भी चिंता नहीं करती थीं। हमारी माताजी ने हमारे होश संभालने के बाद कभी भी नहाने के लिए नहीं कहा। लेकिन उनकी रसोई का असूल था कि स्नान करके पूजा स्थल पर ईश्वर वन्दना करने के बाद ही कोई भोजन लेने का अधिकारी होता था। इसलिए हम सब में प्रात: सबसे पहले उठने की होड़ लगी रहती थी क्योंकि भोजन तो तभी मिलता था जब हम स्नान कर लेते और ईश्वर के सामने प्रार्थना कर लेते थे। बचपन की वही आदत आज भी बनी हुई है। लेकिन आजकल जमाना बदल गया है आजकल की माताओं के मुँह से अकसर यह सुनने को मिलता है कि पहले ब्रेकफास्ट कर लो फिर नहाते रहना आपके लिए मैंने सारा दिन रसोई में ही तो नहीं रहना है।

वैसे तो यह एक छोटी सी बात लगती है और शहरों के अमीर घरानों में ऐसी सुविधाएँ भी हैं कि उन्हें गन्दगी में हाथ नहीं लगाना पड़ता। लेकिन आम जनता के पास ऐसी सुविधाएँ नहीं हैं। मेरा मानना है कि स्वच्छता अभियान की सफलता के लिए माताओं का सहयोग जरूरी है वही अपनी संतान में स्वच्छ्ता के संस्कार स्थायी रूप से डाल सकतीं हैं। अत: देश की आधुनिक महिलाओं को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। उसके बाद वे ही बालकों और बालिकाओं में ऐसे संस्कार डालकर मातृभूमि को स्वच्छ व निर्मल बनाने में सबसे अधिक मददगार साबित होंगी

---

ओम प्रकाश शर्मा 

एक ओंकार निवास छोटा शिमला १७१००२  

0 टिप्पणी "ओम प्रकाश शर्मा का आलेख - माँ की सीख व स्वच्छता"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.