शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - दिमागी सेहत को दुरुस्त रखने का 'नोबल' रोमांच

दिमागी सेहत को दुरुस्त रखने का 'नोबल' रोमांच

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

क्या आपने कभी सोचा है कि दिमाग के अंदर भी एक ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) काम करता है? चौंकिए मत, 2014 का चिकित्सा क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार इसी जीपीएस की खोज के नाम रहा। मशीन और इंसान में एक मौलिक अंतर यह है कि मशीनों के पास दिमाग नहीं होता। अगर होता तो मशीनें अब तक इंसानों को अपना गुलाम बना चुकी होतीं। पर संसार के बाकी जीवधारियों को पछाड़ कर धरती पर छा जाने वाले इंसान के दिमाग का विकास कैसे होता है और यह काम कैसे करता है, यह बात खुद इंसान के लिए पहेली बनी हुई है।

दिमाग को पढ़ने की दिमागी जुगत

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इधर कुछ समय से इस पहेली को सुलझाने की कोशिशें की जा रही हैं। प्रयोगशालाओं में इंसानी दिमाग जैसी संरचनाएं बनाई गई हैं और दिमाग को पढ़ने के लिए तमाम परियोजनाएं शुरू की गई हैं। कहा जा रहा है कि इस तरह जल्द ही हमारा अपना दिमाग हमारे काबू में होगा। लिहाज़ा, दिमाग के जीपीएस की खोज करने वाले ब्रिटिश अमेरिकी शोधकर्ता जॉन ओ कीफ तथा नार्वे के एडवर्ड मोजर व उनकी पत्नी मे-ब्रिट मोजर को संयुक्त रूप से इस पुरस्कार के लिए चुना गया है। पुरस्कार विजेताओं के नामों की घोषणा स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में नोबेल अवार्ड कमेटी ने की। कमेटी ने कहा कि इन तीनों को दिमाग के अंदरूनी जीपीएस सिस्टम का पता लगाने के लिए यह पुरस्कार दिया गया। दिमाग की इसी खूबी के चलते जीव अपनी जगह के निर्धारण में सक्षम होते हैं। 

नोबेल कमेटी ने कहा, इनकी खोज ने उस गुत्थी को सुलझा दिया है जिसने बहुत से दर्शनशास्त्रियों और वैज्ञानिकों को सदियों से जकड़ा हुआ था। यह खोज दिमागी बीमारियों में खासकर अल्जाइमर के मामले में क्रांतिकारी कमद साबित हो सकती है। पुरस्कार के रूप में मिलने वाली कुल राशि 80 लाख स्वीडिश क्रोनर (करीब 11 लाख डॉलर) का आधा हिस्सा जॉन ओ कीफ को दिया जाएगा तथा शेष राशि मोजर दंपत्ति को मिलेगी। विजेताओं को पुरस्कार 10 दिसंबर को स्टॉकहोम में होने वाले औपचारिक कार्यक्रम में दिया जाएगा। 

रास्ते की तलाश का दिमागी रिश्ता

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ओ कीफ ने 1971 में दिमागी जीपीएस के पहले घटक का पता लगाया था। उन्होंने चूहे के दिमाग के एक खास हिस्से में एक नर्व सेल की पहचान की थी। चूहे को कमरे में रखते ही दिमाग का यह हिस्सा सक्रिय हो गया। यह हिस्सा चूहे के दिमाग में कमरे का नक्शा बनाने में सहायक बना। 2005 में मोजर दंपत्ति ने दिमागी जीपीएस के अन्य घटक को पहचाना। इसके जरिए दिमाग सटीक स्थान निर्धारण और रास्ते की पहचान में सक्षम होता है।

जॉन ओ कीफ यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ लंदन के सेंसबरी वेलकम सेंटर इन न्यूरल सर्किट्स एंड बिहेवियर के निदेशक और एडवर्ड मोजर व मे-ब्रिट मोजर: नार्वे यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में कावली इंस्टीट्यूट ऑफ सिस्टम्स न्यूरोसाइंस और सेंटर फॉर द बायोलॉजी ऑफ मेमोरी के संस्थापक निदेशक हैं। 


उत्साहित करने वाला शोध कार्य

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चिकित्सा के क्षेत्र में इस बार का नोबेल पुरस्कार न केवल इस क्षेत्र के विशेषज्ञों का बल्कि सामान्य लोगों का भी उत्साह बढ़ाने वाला है। यह पुरस्कार संयुक्त रूप से तीन वैज्ञानिकों को मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को लेकर उनकी महत्वपूर्ण खोज के लिए दिया गया है। इन तीनों वैज्ञानिकों के प्रयास न केवल इस अहम विषय के अलग-अलग पहलुओं से जुड़े रहे हैं, बल्कि वे कालखंड के हिसाब से भी एकदम अलग हैं।

ज्ञातव्य है कि ब्रिटिश-अमेरिकी साइंटिस्ट जॉन ओ कीफे ने 1971 में अपने प्रयोगों के जरिए यह पता लगाया था कि दिमाग के एक खास हिस्से में सक्रिय प्लेस सेल्स  आसपास के इलाके का मैप तैयार कर लेते हैं। इसके बाद 2005 में इनके रिसर्च को आगे बढ़ाया नार्वे के साइंटिस्ट कपल मे ब्रिट मोजर और एडवर्ड मोजर ने। इन्होंने दिमाग के दूसरे हिस्से में सक्रिय ग्रिड सेल्स का पता लगाया, जो आसपास की स्थितियों के साथ तालमेल बनाते हुए हमारा इधर-उधर जाना आसान बनाते हैं। दिमाग के काम करने के तरीके, खासकर ऊंचाई और गहराई की समझ बनाने की इसकी प्रक्रिया ने लंबे अर्से से विज्ञान जगत को उलझा रखा था। कई तरह की बीमारियों का इलाज और रोबॉट तथा कंप्यूटर जैसे क्षेत्रों में इनोवेशन की रफ्तार इस गुत्थी की वजह से थमी हुई थी।

ब्रेन मैपिंग प्रोजेक्ट

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गौरतलब है कि स्थान की समझ बनाने से जुड़ी दिमागी प्रक्रिया पर केंद्रित इस रिसर्च के निष्कर्ष आगे चलकर लोगों, स्थितियों, सुगंधों और अनुभवों आदि के संदर्भ में भी खासे उपयोगी साबित हो सकते हैं। बहरहाल, दिमाग को समझने की इन कोशिशों का मकसद सिर्फ मानसिक विकारों से निपटने के रास्ते खोज लेना भर नहीं है। इसके पीछे कहीं न कहीं वह सोच भी काम कर रही है, जो कुछ तबकों को बाकी दुनिया से श्रेष्ठ बनाए रखना चाहती है। जैसे, पिछले ही साल इंसानी दिमाग को पढ़ने के लिए अमेरिका ने 10 करोड़ डॉलर की लागत वाला जो ब्रेन मैपिंग प्रोजेक्ट लॉन्च किया था, उसका उद्देश्य कुछ ऐसा ही है।

उधर दिमाग की गुत्थियां सुलझाने की पहल को राष्ट्रपति ओबामा रोजगार सृजन के संदर्भ में देख रहे हैं। अपनी इस चिंता के जरिये वे अमेरिकी जनता को आश्वस्त करना चाह रहे होंगे कि वे रोजगारों को एशियाई लोगों के हाथों में नहीं जाने देना चाहते। लेकिन आज हर देश यही यही चाहेगा कि बड़े आविष्कार उसकी जमीन पर हों और उसकी जनता की दिमागी सेहत दुरुस्त रहे। 

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प्राध्यापक, दिग्विजय कालेज,

राजनांदगांव।

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