सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

अनुराग पाठक की कहानी - उखड़े हुए पौधे

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काफी सिमट कर अपनी बर्थ पर बैठ पाई थी शुभ्रा। गहनों और चूड़ियों से छन छन खन खन की ध्वनि बीच बीच में फूट पड़ती। संजय या कोई और उससे कहेगा तब वह थोड़ा आराम से बैठ पाएगी। अभी तो संकोच और शर्म के कारण बर्थ पर सिमट कर बैठ सकी थी शुभ्रा। ट्रेन में आते ही अकेलेपन ने उसे बुरी तरह दबोच लिया था ।एक अकेला आदमी चन्द्रमा पर कितना अकेला हो सकता है आज वह भरी ट्रेन में महसूस कर सकती है। संजय से उसकी शादी हुई है। शुभ्रा विदा होकर ग्वालियर से दिल्ली जा रही है। संजय के साथ दस बारह लोग ही होंगे। संजय के मम्मी पापा दो तीन लडकियां और सात आठ दूसरे रिश्तेदार । इस बीच दो लड़कियां शुभ्रा के अगल बगल आकर बैठ गई।शुभ्रा और अधिक सिमट कर बैठ गई। एक झटके से ट्रेन रुक गई। लेकिन वह सिर्फ तन्द्रा भंग करने वाले झटके को महसूस कर पाई। इसके पहले ट्रेन बिना खड़ बड़ के शांत गति से चल रही थी या बिना खड़ बड़ के शांत गति से रुकी थी उसे पता नहीं।
कई स्टेशन छाप ध्वनियाँ आ आकर उसके कानों में समाने लगी। अरे! ये तो आगरा है। मतलब दो घंटे हो गये। मम्मी पापा मन्नू घर पहुँच गये होंगे। आज सब होंगे। मैं ही नहीं होऊँगी। मम्मी पापा बीच में मैं हमेशा। आज मम्मी पापा बीच में मन्नू मेरी जगह। हमेशा मुझसे झगड़ने वाला मन्नू आज मेरी जगह। कितना रो रही थी मम्मी। पापा तो दूर ही खड़े थे। बाद में आये जब ट्रेन चलने लगी थी और फफक कर रो दिए थे। आज सब साथ होंगे केवल मैं ही नहीं होऊँगी। हमेशा पापा के आसपास चक्कर लगाने वाली मैं । अपनी बातों अपनी जिदों से पापा को हमेशा तंग करने वाली मैं । आज कहीं नहीं। इतना सोचकर शुभ्रा के मन में अजीब सी हूक उठी। उसके ह्रदय में कुछ खदबदाने लगा


           " तुम्हें संजय पसंद है ना।" यही पूछा था पापा ने जब संजय की फोटो उसे दिखाई गई थी और उसके परिवार की स्थिति समझाई गई थी । ठीक ठाक घर है ।अच्छी खासी नौकरी भी है संजय की। क्या कहती शुभ्रा ?हां या ना कैसे करती? कितना परेशान थे पापा उसके लिए। दोनों लड़कियां शुभ्रा के पास से उठकर चली गई। शुभ्रा की घुटन थोड़ी कम हुई। पर वह आराम से पैर फैलाकर नहीं बैठ सकी। ट्रेन में आरक्षण हो और बर्थ पर शुभ्रा के पैर न फैले हो ऐसा हो ही नहीं सकता था। एक बार मामा के यहाँ बनारस जाते समय मन्नू उसकी बर्थ पर आकर बैठ गया था तो कैसा झिड़क दिया था मन्नू को ।मम्मी ने समझाया भी था शुभ्रा को ।
पर शुभ्रा ने भी कह दिया था -"क्यों आ जाता है बार बार यह मेरी जगह पर। इसकी सीट अलग है ना। ट्रेन में कम चिक चिक है ये और आ गया दिमाग खाने।" इतना बड़ा भाषण शुभ्रा ने मन्नू की शिकायत में दे दिया था।
मम्मी ने भी शुभ्रा को दिखाने के लिए मन्नू को झूठ मूठ डांट दिया था  - "क्यों पहुंच जाता है बार बार दीदी के पास तेरी सीट अलग है ना।"
मन्नू वापस अपनी सीट पर जाकर बैठ गया। शुभ्रा ने विजय मुस्कान लिए अपने पैर बर्थ पर फैला लिए थे और पत्रिका खोल ली थी। पर मामा के यहाँ दो दिन रुकने के बाद ही शुभ्रा का मन ऊब गया था।
वह कहती -"कैसा शहर है यह धूल धूल भीड़ भाड़। सारे अनजाने चेहरे ,कोई भी जाना पहचाना नहीं, सबके चेहरे उदास बुझे हुए। ग्वालियर में तो इतनी देर में कई जाने पहचाने लोग मिल जाते। सबके चेहरे खिले हुए ,इनके जैसे बुझे नहीं। यहाँ का तो पानी भी खारा है। जैसे लोग वैसा पानी।" इतना बड़ा भाषण शुभ्रा मामा के यहाँ बनारस में दो दिन रहने के बाद ही देने लगती। फिर शुभ्रा को कई कोशिशों के बाद वहां रोकना मुश्किल हो जाता।
संजय ने अब सुध ली। वह शुभ्रा के सामने वाली बर्थ पर आकर बैठ गया था। दोनों लड़कियां अपनी जगह पर चली गई थी। संजय ने देखा कि कितना भोला चेहरा है शुभ्रा का। शुभ्रा की आंखें बंद थी। पर पलकों के भीतर कुछ हलचल थी। जैसे सारी नाजुक सुन्दरता पलकों के भीतर हलचल कर रही हो। शुभ्रा की आदत है कि वह कॉलेज से आकर सीधे चाय बनाती है। पर आज वह चाय नहीं बना पाई गैस के सामने खड़ी रही। टकटकी लगाये गैस को देखती रही। वह शक्कर का डिब्बा नहीं उठा सकी। उसे लगा कि शक्कर का डिब्बा उठाते ही वह घनघनाकर नीचे गिर जाएगा और सामने बैठे लोग भड़भड़ाकर जाग जायेंगे। शुभ्रा चाय नहीं बना सकी । वह दूसरे कमरे में चली जाती है।
अरे ! ये मेरा कमरा नहीं है। कहाँ गया मेरा कमरा ? मेरा कमरा नहीं, मेज कुर्सी नहीं ।कहाँ गई मेरी किताबें मेरा पेन । पेन जिसका निब मन्नू ने तोड़ दिया था । कितना रोई थी मैं। मेज पर ही तो थी मेरी डायरी । कहाँ गई मेरी डायरी? जिसका एक एक शब्द मैंने लिखा था। उन शब्दों में ही तो था मेरा पूरा जीवन।


         "बारह जनवरी विवेकानन्द जयंती कालेज में भाषण प्रतियोगिता में प्रथम स्थान मिला अच्छा लगा।"
       " बाइस फरवरी मेरा जन्मदिन सीमा राखी दीपा सुमन सब आये ।घर में पार्टी हुई ।सुमन ने 'शेखर एक जीवनी' उपन्यास गिफ्ट किया । अच्छा लगा।"
         "आठ मार्च कालेज में महिला दिवस पर निबन्ध लेखन प्रतियोगिता । सुमन फर्स्ट। मैं सेकेण्ड। अच्छा लगा।"
        " बीस अप्रेल आज पापा ऑफिस से देर से आये। पापा तनाव में थे। पर उन्होंने कुछ बताया नहीं। उनकी पीड़ा देखकर भी मैं कुछ नहीं कर पा रही।"
        "छ: जून मन्नू कक्षा दस में फर्स्ट डिवीजन पास हुआ। वह बायलोजी लेगा । सब खुश हुए। अच्छा लगा।"
         "सोलह जून मेरा बी ए फायनल का रिजल्ट आया। मैं और सुमन फर्स्ट । सीमा सेकेण्ड दीपा थर्ड राखी फेल। पापा मिठाई लाये। सबने खाई।"


          " कहाँ गई मेरी डायरी । मेरा एक एक दिन। जिसके कारण मैं थी ।मेरा अस्तित्व था। कमरा नहीं। पेन किताबें नहीं। डायरी नहीं । मैं क्यों हूँ? हूँ भी या नहीं। खोज जो रही हूँ खुद को। इस कमरे में, उस कमरे में । बदहवास।"
             "अरे ! ये तो मम्मी पापा का कमरा आ गया। वही कमरा वही दीवारें ।दीवार पर वही पेंटिंग हाथी वाली जिसे मैंने बनाया था। पापा कितने शौक से फ्रेम में जड़वा कर लाये थे वह पेंटिंग। उन्होंने ही जिद करके अपने कमरे में लगवाई थी मेरी हाथी वाली पेंटिंग। कहा गई मेरी पेंटिंग? वही पलंग ।पलंग पर वही चादर फूल और पत्तियों के प्रिंट वाली जिसे मैं और मम्मी राखी के दिन लाये थे।"
          " अरे! ये पलंग पर कौन बैठा है। मम्मी! मम्मी नहीं लगती ।मम्मी इनसे दुबली होंगी। कहाँ गई मम्मी ?कमरा वही ,सामान वही पर मम्मी कहाँ गई? डायरी पेन किताबों के साथ मम्मी भी नहीं है।"
पागलों की तरह बदहवास भागती रही शुभ्रा। अपने कमरे, अपने सामान, अपने पापा मम्मी को ढूंढते हुए। अपने अतीत में, अपनी कल्पनाओं में।
           "अरे! यहाँ तो मेरा बगीचा होना चाहिए था ये दीवाल कहाँ से आ गई।"
वह दीवाल को पागलों की तरह धक्के देने लगती ।इस प्रक्रिया में कभी पैर पटकती कभी सर। इस बीच पसीना अधिक निकला या आंसू उसे पता नहीं।
                  "मेरा बगीचा भी गायब हो गया। जिसके पौधों को मैं रोज पानी देती थी। कहाँ गये मेरे पौधे?गुलाब ,गेंदे,सेवंती के पौधे। खिले हुए फूल दूर कर देते थे मेरे मन की उदासी को। गुलाब,गेंदे, सेवंती के फूल बात करते थे मुझसे। उनकी साँसे महसूस करती थी मैं। किसने उखाड़ के फेंक दिए मेरे पौधे?  मेरे साथी, मेरे दोस्त। उखड़े हुए पौधे क्या फिर कहीं लगाये जा सकते है ?क्या वे फिर फल फूल सकते है।" शुभ्रा बदहवास ढूंढती रही अपने जड़ से उखाड़ दिए गये पौधों को। शुभ्रा के मन में जमी बर्फ पिघलने लगी। समुद्र मंथन चलता रहा। पर नीला अथाह अतल समुद्र अपनी सीमा भंग नहीं कर सका ।शुभ्रा की आँखें खुली नहीं। समुद्र को फिर बर्फ हो जाने दिया गया।
            " मेरी शुभी तो मेरी सबसे अच्छी बच्ची है ।वह तो कभी जिद नहीं करती। वो तो मीठी दवा सबसे पहले पी लेती है।"-शुभ्रा को एक आवाज सुनाई देती है।
             "अरे! ये पापा की आवाज है।"


शुभ्रा भागती है कहीं दूर से आ रही इस आवाज के पीछे। कहाँ है पापा? ये तो तीन साल की शुभी को कहे गये पापा के प्यारे शब्द है जो आज भी गूँज रहे है घर में ।पर केवल आवाज ही क्यों है? पापा कहाँ है? खांसी और बुखार से तपती तीन साल की शुभी को पापा अपनी गोद में बिठाए है और चम्मच से कहीं दवा पिला रहे है। पर शुभी को पापा दिख नहीं रहे ।
           "पापा मैं कभी जिद नहीं करूंगी ।जल्दी ही दवा पी लूंगी पर आप आ जाओ।" तीन साल की नन्हीं शुभी की आवाज शुभ्रा को सुनाई देती है।
                 "शायद पापा फिर अँधेरे में पर्दे के पीछे छिपने का ,मुझे डराने का पुराना खेल खेल रहे हैं। पर जब मैं डर कर हार कर आपको नहीं खोज पाती थी तब तो आप आकर मुझे गोद मैं ले लेते थे। आज आप क्यों नहीं आते मैं हार गई आप जीत गए मुझे आकर गोद में ले लो।"


तीन साल की शुभी पापा को खोज रही है। अँधेरे में,पर्दे के पीछे। उस आवाज के पीछे जिसका इन्तजार शुभी दिन भर करती थी। सुख में भी जब क्लास टीचर शुभी को होमवर्क में वैरी गुड देती थी, दुःख में भी जब शुभी से कांच का गिलास टूट गया था और मम्मी ने उसके गाल पर चपत लगाकर डांट दिया था तब भी शुभी दिन भर रोते हुए पापा का इन्तजार करती रही थी कि कब पापा की आवाज सुनाई दे और शुभी मम्मी की शिकायत पापा से कर सके। पर आज बेतहाशा खोजने पर भी वह पापा की आवाज को नहीं खोज पा रही। चार साल की शुभी खिड़की में से नन्हे नन्हे हाथ बाहर निकालकर दूर दीखते ऑफिस से आते पापा को 'आ जाओ आ जाओ ' कहकर बुला रही है। पर उसके पापा उसकी आंखों से ओझल हो जाते है। शुभ्रा बुलाती रहती है पापा को -'आ जाओ आ जाओ'।पर पापा नहीं दीखते कहीं नहीं दीखते। पूरे घर में पापा नहीं दीखते। शुभ्रा के मन में जमी बर्फ अब पिघली ही नहीं बल्कि समुद्र अपनी सीमा भंग कर गया। किनारे भीग गई। बंद आंखों से ही झर झर आंसू बहते रहे पर आंखें खुली नहीं। उफनते समुद्र को फिर बर्फ हो जाने दिया गया।


                   "ये फूलों से सजा हुआ कमरा किसका है? कैसी फूलों की महक है या किसी ने सेंट छिडक दिया है। फूलों से सजे पलंग पर ये कौन बैठा है। चेहरे से कुछ जाना पहचाना लग रहा है। कहीं यह संजय तो नहीं।"
पर आंसुओं से भीगी धुंधली आंखें उस धुंधले चेहरे को पहचान नहीं पाती ।शुभ्रा की आंखें खुल जाती है ।ट्रेन अपनी पूरी गति से चल रही थी। सामने संजय अभी भी बैठा था। संजय की दृष्टि शुभ्रा के चेहरे की और थी। शुभ्रा ने पहली बार संजय को भरपूर दृष्टि से देखा। उसे लगा कि किसी ने उसे गहरे अंधे कुएं से हाथ पकड़ कर खींच लिया हो। जंगल में खो जाने पर किसी ने पीछे से परिचित आवाज दी हो। शुभ्रा एक टक संजय के चेहरे को देखती रही। भयभीत समर्पित धुंधली दृष्टि चुम्बकीय मजबूत आशावान चेहरे पर।

 

अनुराग पाठक
       982758545
शालीमार पाम पिपल्याहाना
इंदौर

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