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November, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पी़डीएफ ईबुक – गोवर्धन यादव का कहानी संग्रह - महुआ के वृक्ष

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पीडीएफ ईबुक – गोवर्धन यादव का कविता संग्रह - बचे हुए समय में

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पीडीएफ ई बुक : गोवर्धन यादव का कहानी संग्रह - तीस बरस घाटी

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पीडीएफ ईबुक : गोवर्धन यादव का लघुकथा संग्रह

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प्रमोद यादव का व्यंग्य - दौरों का दौर

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दौरों का दौर / प्रमोद यादव कार्टून-साभार-हरिभूमि,रायपुर ‘ गुरूजी...नमस्कार...’ शेविंग करने खिड़की पर दर्पण धरे गुरूजी बैठे ही थे कि सामने एकाएक गजोधर का कद्दुनुमा चेहरा उभर आया.. ‘अरे गजोधर...नमस्कार..कैसे हो ? क्या हालचाल है ? ‘गुरूजी ने दाढ़ी में ब्रश से साबुन पानी फिराते पूछा. ‘ बस गुरूजी..दया आपकी..’ गजोधर बोला. ‘सबेरे-सबेरे कैसे भई ? कोई विशेष बात ? ‘ गुरूजी अन्दर से ही पूछे. ‘ नहीं गुरूजी..कोई ख़ास तो नहीं..पर एक-दो बातें पूछनी थी..’ गजोधर ने झिझकते कहा. ‘ अरे एक-दो नहीं..चार पूछो..लेकिन अन्दर आकर पूछो..बाहर खिड़की से ही सवाल-जवाब करोगे तो लोगबाग “ अद्धा-पौवा “ वाली खिड़की समझ..तुम्हारे पीछे लाईन लग जायेंगे..’ गुरूजी ने मजाक करते कहा. ‘ क्या गुरूजी..आप भी मजाक करते हैं..पूरे शहर वाले जानते हैं कि ये एक बुद्धजीवी की खिड़की है..यहाँ दूसरी तरह के नशे का सेवन (और उन्मूलन) होता है..’ ‘ तो बताओ गजोधर..तुम किस नशे में अलसुबह गिरते-पड़ते यहाँ पहुँच गए ? ‘ ‘ वो क्या है गुरूजी कि ...’ बात को बीच में ही काटते गुरूजी बोले- ‘ अरे पहले अन्दर तो आओ..दरवाजा खुला है..’ गजोधर दरवाजा धकेल अन्दर घुसते …

एम. आर. अयंगर की कहानी - गुरुजन

गुरुजनसुनील जब हाई स्कूल में दाखिल हुआ तो जाना कि शहर के रेल्वे क्षेत्र के सभी स्कूलों के अग्रणी छात्र इसी स्कूल में आ गए हैं. सुनकर एक तरफ तो बड़ी खुशी हुई कि यहाँ की पढ़ाई बहुत अच्छी होती होगी, तभी तो सारे स्कूल के छात्र यहां आ गए हैं. लेकिन मन के अंदर एक डर भी था कि यदि पढ़ाई में ढिलाई हुई तो कक्षा के प्रथम तीन में स्थान प्राप्त करना आसान नहीं होगा. इसी डर के कारण मन ही मन धीरे - धीरे निश्चय बढ़ने लगा कि मन लगा कर पढ़ाई करनी पड़ेगी और करनी है. आईए सुनते हैं आगे की बात - सुनील के मुख से. “वह दिन मुझे याद है जब कक्षा 7 वीं की मार्कशीट (अंकतालिका) देख कर पिताजी ने कहा था, - पिछले बरस भी तुम्हें इतने ही प्रतिशत अंक मिले थे. अब भी वही हैं, तो तुमने क्या प्रगति की ?” मैंने बड़े शान से कहा था कि वह कक्षा छः की पढ़ाई थी और यह कक्षा 7 की पढ़ाई हैं. यदि मेरे अंक प्रतिशत कायम हैं, तो मैंने कक्षा को स्तर के अनुपात में ही प्रगति की होगी, अन्यथा अंक प्रतिशत कम हो जाते. पिताजी उससे आगे कुछ बोल नहीं पाए या बोले नहीं. किंतु अब लग रहा था कि इतना काफी नहीं है – अब होड़ बढ़ गई है और प्रतिशत कायम रखने …

सविता मिश्रा की लघुकथाएँ

दो जून की रोटी
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आंचल में दूध आंख में पानी भरा है, रह रह छलक जा रहा था क्योंकि आंचल का दूध तो अब सुख चूका था| नन्हा गुल्लू फिर भी चूस रहा था! भूख से अंतड़िया दिख रही थी| खुद को बेचने को मजबूर हो चुकी थी किसनी| पर उससे भी पूरी कहाँ हो रही दो जून की रोटी| बिकने वाली चीज सस्ती जो आंकी जाती है|
भूख से बिलबिला रहा था गुल्लू ,पर किसनी के पास उसके पेट की आग़ को बुझाने के लिये एक फूटी कौड़ी भी ना थी|
तभी एक दलाल की नजर पड़ी ,उसने बोला - "किसनी क्यों न इसे किसी अमीर परिवार के हवाले कर दें| वहां खूब आराम से रहेगा वह बच्चे की तलाश में है, तू कहें तो बात करूँ|"
सुनते ही किसनी ने सीने से चिपका लिया! कैसे दिल के टुकडे को अलग करने की हिम्मत जुटाती! आखिर इसी के लिये तो जी रही थी|
"मेरा यही सहारा है ये चला जायेगा तो मर ही जाउंगी मैं तो|"
दलाल के खूब समझाने पर उसके भविष्य के खातिर आख़िरकार किसनी राजी हो गयी पर शर्त भी रक्खी की उस घर में वो लोग नौकरानी ही सही उसे जगह दें तब|
आज अपने नन्हे को स्कूल ड्रेस में स्कूल जाते देख उसके आंसू झर-झर बहे जा रहे थे! वह उसके भविष्य के प्रति आश्…

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - मतदाता के गर्व और मतदान के फर्ज़ की आवाज़

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मतदाता के गर्व और मतदान के फर्ज़ की आवाज़ डॉ.चन्द्रकुमार जैन  मतदाता जागरूकता अभियान का असर देखिये कि विगत वर्षों के दौरान मतदाता पंजीकरण,विशेषकर युवाओं में, 10-15 प्रतिशत से बढ़कर 30-35 प्रतिशत हो गया है और 2010 के बाद हुए लगभग सभी राज्य विधानसभा चुनावों में बड़ी संख्या में मतदाता वोट डालने आये। इनमें युवाओं और महिलाओं की भागीदारी अधिक रही। निर्वाचन प्रबंध प्रक्रिया के केन्द्र में मतदाता पंजीकरण तथा निर्वाचक शिक्षा हैं, लेकिन गुणवत्ता तथा मात्रा की दृष्टि से भारत में मतदाता भागीदारी आदर्श भागीदारी वाले लोकतंत्र से अभी भी दूर है। इसे एक चुनौती के रूप में लेने की ज़रुरत ही नहीं, बल्कि ज़मीनी और विश्वसनीय प्रयासों से इस दूरी को पाटने की पहल भी ज़रूरी है। लेकिन, स्वीप प्लान इस दिशा में प्रभावी भूमिका का निर्वहन कर रहा है।  मजबूत लोकतंत्र, जानदार थीम -------------------------------------प्रारंभ भारत निर्वाचन आयोग ने 2010 में अपने हीरक जयंती समारोह में कम निर्वाचक जागृति तथा मतदाताओं के कम बाहर निकलने के विषय की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए मजबूत लोकतंत्र के लिए विशाल भागीदारी को अपना थीम बना…

पुरुषोत्तम विश्वकर्मा का हास्य व्यंग्य : बुद्धुमल का ब्याह

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बुद्धुमल का ब्याह बुद्धु शब्द शायद बुद्ध शब्द ही का कोई विकृत क्लोन हो सकता है,यह शब्द किसी जुबां के किसी लुगत में चाहे मिले या न मिले मगर इस शब्द के संबोधन के भावों को चरितार्थ करने वाले राष्ट्र,जाति पांति, धर्म, पंथ और संप्रदाय के दायरे से परे दुनिया के हर कोने में बहुतायत में मिल ही जायेंगे,इनकी नफरी को देखते हुए ये दूसरे ग्रहों पर भी मिल जाये इसकी भी प्रबल सम्भावनाये हैं। जो प्रबुद्ध होते हैं वो तो पुरजोर प्रयास करके इनको इसलिए ढूंढते हैं ताकि उनसे अपनी तुलना कर खुद ही अपने आप पर गर्व कर सकें और जो बुद्धुमल होते हैं वो कुम्भ के मेले में भी अपना जोड़ीदार बड़ी आसानी से तलाश लेते हैं कई सज्जन तो इस बुद्धुमल का लेबल चिपकाए सरेआम इस मकसद से घूमते रहते हैं ताकि जरूरतमंदों को उन्हें तलाश लेने में जरा सहूलियत हासिल हो सके। हां इसमे कई बार अपवाद भी सामने आ जाते हैं कि शिशु के नामकरण संस्कार के दिन पंडित महाशय तो यजमान के सामर्थ्य के अनुरूप अच्छी खासी दक्षिणा लेकर कई देर तक अपना पञ्चांग उलट पलट कर,काफी सोच विचार करने के बाद बालक का नाम बुधदेव रखते हैं मगर निक नेम की बीमारी और घरवालों का प्य…

प्रमोद यादव का हास्य-व्यंग्य : डिनर विद डब्बू

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डिनर विद डब्बू / प्रमोद यादव ‘ एक बात तो बताओजी..आप का सिर कैसे घूम गया है ? ‘ पत्नी चाय का मग थमाते बोली. ‘ क्यों ? क्या हुआ ? मैंने क्या किया भई ? पति ने चौंकते हुए पूछा. ‘ अरे ..आप भी पूरे बुद्धू के बुद्धू ही ठहरे..आप से मेरा मतलब पार्टीवाले से है.. दिल्ली के मफलर वाले की पार्टी से..’ ‘ अरे तो ऐसा कहो न..तुम आप-आप करोगी तो मैं खुद को ही समझूँगा न ..हाँ ..बोलो-क्या कह रही थी ? ‘ ‘ अजी मैं सुनी हूँ कि वे कल मुंबई में डिनर पार्टी कर रहे हैं..’ ‘ तो तुम्हें इससे क्या भई ? ‘ पति ने कहा. ‘ पहले पूरी बात तो सुना कीजिये..कहते हैं कि जिनको उनके साथ डिनर करना है वे बीस हजार रूपये देकर कर सकते हैं..इतनी महँगी थाली तो राजे-महाराजे भी कभी न खाए हों फिर ये जनाब क्यों इतनी महँगी थाली खाने-खिलाने पर तुले हैं..और फिर इनके साथ बैठकर खायेगा कौन ? मुंबई में तो बीस रूपये में भरपेट भोजन मिल जाता है..’ पत्नी बोली. ‘ अरे यार तुम कहना क्या चाहती हो ? ‘ ‘ यही कि ये डिनर पार्टी का माजरा क्या है ? ‘ ‘ भई ..वे पार्टी के लिए फंड जुटा रहे हैं..लोगों से दान मांग रहे हैं..लंच-डिनर केवल प्रतीक है..अब खाली-पीली कैस…

राजीव आनंद का आलेख - हरिवंशराय बच्चन : भारत के बेमिसाल व सर्वाधिक लोकप्रिय कवि

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27 नवंबर को 107वीं जयंती पर विशेषडॉ. हरिवंशराय बच्चन : भारत के बेमिसाल व सर्वाधिक लोकप्रिय कविडॉ. हरिवंशराय बच्चन का परिचय बहुत ही मुख्तसर सा है जो वे खुद दिया करते थे कि ''मिट्टी का तन, मस्ती का मन, क्षणभर जीवन, मेरा परिचय.''छायावाद के प्रखर और आधुनिक प्रगतिवाद के मुख्य स्तम्भ माने जाने वाले डॉ. हरिवंशराय बच्चन ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री डब्ल्यू.बी.ईटस के कार्यों पर शोध कर प्राप्त किया था. यह उपलब्धि हासिल करने वाले वे पहले भारतीय थे. अंग्रेजी साहित्य में पीएचडी की उपाधि लेने के बाद उन्होंने हिन्दी को भारतीय जन की आत्मभाषा मानते हुए हिन्दी क्षेत्र में साहित्य सर्जन का महत्वपूर्ण फैसला लिया तथा आजीवन हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने में लगे रहे. कैम्ब्रिज से लौटने के बाद डॉ. बच्चन आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र में कार्यरत रहे, बाद में अपने दिल्ली प्रवास के दौरान विदेश मंत्रालय में दस वर्षों तक हिन्दी विशेषज्ञ जैसे महत्वपूर्ण पद पर रहे. इन्हें राज्यसभा में छह वर्ष तक के लिए विशेष सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया. 1972 से 1982 तक डॉ. बच्चन अपने पुत्रों अम…

नन्दलाल भारती का आलेख - ॥ हिन्‍दी जीवन मूल्‍यों की संवाहक है।॥

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डॉ․नन्‍दलाल भारती एम․ए․ । समाजशास्‍त्र । एल․एल․बी․ । आनर्स । पोस्‍ट ग्रेजुएट डिप्‍लोमा इन ह्‌यूमन रिर्सोस डेवलपमेण्‍ट (PGDHRD) विद्यावाचस्‍पति (PhD)सम्‍मानोपाधि हिन्‍दी जीवन मूल्‍यों की संवाहक है। जैसाकि हम मानते हैं हिन्‍दी हमारी मातृभाषा है,राष्‍ट्रभाषा एवं राजभाषा है,आजादी की भाषा है,जन-जन की भाषा है आम आदमी की भाषा है,राष्‍ट्रीय एकता विश्‍वबन्‍धुत्‍व की भाषा हिन्‍दी है परन्‍तु संवैधानिक रूप से हिन्‍दी को आज भी पूर्णतः न राष्‍ट्रभाषा का दर्जा प्राप्‍त है और नहीं राजभाषा का। यह हिन्‍दी का दुर्भाग्‍य नहीं देश और देशवासियों का दुर्भाग्‍य है। यदि देश और देशवासियों का दुर्भाग्‍य न होता तो क्‍या हम आजादी 67 के बाद भी हम आजाद देश में बिना हिन्‍दी राष्‍ट्रभाषा के सांस भर रहे हैं। यह वही हिन्‍दी है जिसे भारतवासी आजादी की भाषा कहते हैं,राष्‍ट्रीय एकता की भाषा कहते है परन्‍तु आजादी के 67 साल के बाद भी हिन्‍दी को राष्‍ट्रभाषा का पूर्णतः दर्जा नहीं प्राप्‍त हो सका है। हिन्‍दी को पूर्णतः राष्‍ट्रभाषा एवं राजभाषा का दर्जा नहीं प्रदान किया जाना राजनैतिक इच्‍छाशक्‍ति की कमी ही का द्योतक है। ये कै…

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - कवि केदारनाथ सिंह–एक संस्मरण

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कवि केदारनाथ सिंह ने नांदगाँव में पढ़ी थी कविता -----------------------------------------------------------ज्ञानपीठ पुरस्कार पर संस्कारधानी की सगर्व बधाई
डॉ.चन्द्रकुमार जैन 
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने हाल ही में प्रख्यात हिन्दी कवि केदारनाथ सिंह को एक भव्य आयोजन में 49वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया। पुरस्कार समारोह का आयोजन संसद भवन के बालयोगी ऑडिटोरियम में किया गया। गौरतलब है कि राजनांदगांव में मुक्तिबोध स्मारक-त्रिवेणी संग्रहालय की स्थापना के सिलसिले में 2005 में आयोजित एक काव्य गोष्ठी में श्री केदारनाथ सिंह में काव्य पाठ किया था। मुझे उस यादगार काव्य गोष्ठी के संचालन का सौभाग्य मिला था। आज वास्तव में संस्कारधानी भी सगर्व कह सकती है कि भारत के सर्वोच्च साहित्य सम्मान से विभूषित कवि ने हमारे यहाँ कविता पढ़ी है। इतना ही नहीं, मुलाक़ात के दौरान जब मैंने मुक्तिबोध जी के साथ डॉ.पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और डॉ.बलदेवप्रसाद मिश्र जी के स्मारक को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह जी की मंशा के अनुरूप, जिला प्रशासन और मुक्तिबोध स्मारक समिति की पहल से यह आकार देने की परियोजना की कहानी बता…

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - दूरियों के दर्द का सवाल और पीढ़ी अंतराल

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दूरियों के दर्द का सवाल और पीढ़ी अंतराल डॉ.चन्द्रकुमार जैन  पीढ़ियों का अंतराल तो हमेशा होता हैसमय के आगे -हर अगला कदम पिछले कदम सेखौफ खाता हैकि हर पिछला कदम अगले कदम से बढ़ गया हैरश्मि प्रभा की ऊपर दी गईं पंक्तियाँ चंद अल्फ़ाज़ों में पीढ़ी अंतराल की एक दास्तान का मुकम्मल बयान मालूम पड़ती हैं। बहरहाल, एक और सीन देखिये। ब्रिटिश अखबार गार्डियन में प्रकाशित अपने लंबे लेख के एक अंश 'वट्स रॉंग विद मॉडर्न वर्ल्ड' में अमेरिकी लेखक जोनाथन फ्रेंजन ने जिन मुद्दों को उठाया, उन पर सलमान रुश्दी ने प्रतिक्रिया क्या दी थी शुरू हो गया एक लिटरेरी ट्विटर वार। आइए देखें, इस झगड़े की जड़ क्या है। आखिर जोनाथन ने कहा क्या- अगर मैं सन् 1159 में पैदा हुआ होता, जब दुनिया काफी विश्वसनीय हुआ करती थी, तो शायद अभी की अपनी 53 बरस वाली उमर में यह महसूस कर पाता कि आने वाली पीढ़ी मेरे मूल्यों के महत्व को समझते हुए उन्हें सराहेगी। वह उन चीजों की तारीफ करेगी, जिनकी तारीफ मैं कभी किया करता था। तब शायद उसमें अनुमान जैसा कुछ न होता। लेकिन मैं पैदा हुआ सन् 1959 में। यह वह समय था जब लोग टीवी को सिर्फ प्राइम टाइम में ही दे…

पुरुषोत्तम विश्वकर्मा के हास्य-व्यंग्य

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मोबाईल का मर्ज      आज जब में चाचा दिल्लगी दास से मिला तो देखा कि जनाब व्यस्त का कम अस्तव्यस्त ज्यादा लगे। मेरे शुभ प्रभात का प्रतुत्तर दुए बिना ही मुझे अपने पीछे पीछे आने का इशारा कर सीढियों की और दौड़ पड़े।उन्हें सीढियों पर ऐसे बन्दर की भांति कुलांचें भरते हुए देख कर कोई सोच भी नहीं सकता कि बुढऊ घुटनों के पुराने दर्द का रोगी हो सकता है। देखा तो चाचा छत के एक विशेष कौने में एक खास दिशा की ओर मुंह कर के बड़े जोर जोर से बोल रहे थे कि हाँ हाँ अब थोड़ा थोड़ा सा टावर मिल रहा है। वो क्या है कि हमारे यहां टावर की बड़ी समस्या रहती है । कभी तो नो नेटवर्क कवरेज,कभी नेटवर्क इज बिजी ही मिलता है,अब आप समझे नहीं तो यूं समझ लो कि ट्रेफिक जाम ही मिलता है, इसकी शिकायत भी की मगर आज तक तो कुछ नहीं हुआ। कॉल करने वाले की बात का जवाब हाँ हूँ में ही देकर अपने मोबाइल इंस्ट्रूमेंट,उसके कवर,केस,ब्लेक में खरीदी गई सिम आदि के ही के बार में अजीब अजीब किस्म की मालूमात देते रहे,जब अगले ने अपना मोबाइल सेट स्विच ऑफ़ कर दिया तब जाकर के उसका पिण्ड छोड़ा। चाचा बड़े ही अनमने भाव से अपने मोबाइल इंस्ट्रूमेंट को अपनी लठ्ठे की बनिया…

सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - सड़कों पर बढ़ रहे हादसे - कारण अनेक

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सड़कों पर बढ़ रहे हादसे - कारण अनेक
- ट्रैफिक नियमों को सख्त करना जरूरी -
    यूँ तो समस्याएँ हर देश में होती हैं। कहीं ज्यादा तो कहीं कम, कहीं विकास से संबंधित समस्याएँ तो कहीं आवास की समस्याएँ, बेरोजगारी और जनसंख्या समस्या भी अनेक देशों के लिए विकराल रूप लेती जा रही हैं। हमारा भारत वर्ष ऐसी ही अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है। एक ओर जहाँ हम जनसंख्या और बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे है वहीं दूसरी ओर आतंकवाद और नक्सलवाद हमारे सीने पर मूँग दल रहा है। ये कुछ ऐसी समस्याएँ है जिससे लगभग विश्व के सभी देश त्रस्त है, किन्तु भारत वर्ष में मूलभूत सुविधाओं में शामिल सड़क सुविधा ने एक अलग ही समस्या खड़ी कर दी है। हम अपने देश के नागरिकों को सड़क पर चलते समय सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं। इसका मुख्य कारण सड़कों की खराब स्थिति ही है। केन्द्र सरकार से लेकर प्रदेश सरकार तक कि यह जवाबदारी है कि वह अपने नागरिकों को यातायात की सुरक्षित व्यवस्था उपलब्ध कराये। सड़क सुरक्षा के मामले में भारतवर्ष विश्व के दूसरे देशों से बहुत पीछे है। भारतवर्ष के संदर्भ में यदि यह कहा जाये कि सड़क सुरक्षा संबंधी समस्याएँ आतंकवाद और …

एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य - इतनी जल्दी भी क्या है?

हिंदुस्तान में हर बच्चे को बचपन में खरगोश और कछुए की कहानी सुनाई जाती है। जिसमें खरगोश और कछुए के बीच रेस होती है। खरगोश जल्दी-जल्दी फुर्ती से चलता है और अंततः हार जाता है। तथा कछुआ धीरे-धीरे रेंगते हुए चलता है और अंततः विजयी हो जाता है। हिंदुस्तानियों के मन-मस्तिष्क में यह कहानी बसी हुई है। तथा इसके असर से हिंदुस्तानियों की सारी फुर्ती गायब हो गई है। हर कोई हर काम में यही सोचता है कि ‘इतनी जल्दी भी क्या है’ ? यदि उपरोक्त कहानी का कोई दोष नहीं है तो हिंदुस्तानियों के डीएनए में ही जरूर कोई न कोई ऐसा दोष है जो हमेशा इनके मष्तिष्क को संदेश देता रहता है कि ‘इतनी जल्दी भी क्या है’? इसलिए ही यहाँ के लोग नम्बर एक के कामचोर और आलसी होते हैं। ये या तो काम करते ही नहीं या फिर मस्ती से इतना धीरे-धीरे करते हैं कि लगता है कुछ हो ही नहीं रहा है। सुबह सोकर उठने के लिए पत्नी दस बार भी कहे तो लोग यही कहते हैं कि इतनी जल्दी भी क्या है ? अभी तो पाँच ही बजे हैं। जब तक आठ न बज जाय अधिकांश हिंदुस्तानियों की नीद नहीं जाती। जो लोग सुबह समय पर उठ भी नहीं सकते वे कोई काम समय पर कैसे करेंगे ? लेकिन सुबह जल्दी उ…

महावीर सरन जैन का आलेख - अन्तरराष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला (आईपीए)

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अन्तरराष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला (आईपीए) प्रोफेसर महावीर सरन जैन संसार में बहुत सी भाषाएँ हैं जो बोली तो जाती हैं मगर उनकी कोई लिपि नहीं है। इनका भाषावैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए संसार भर की भाषाओं में बोली जाने वाली भाषाओं की ध्वनियों (speech sounds) और स्वनगुणिमिक अभिलक्षणों (prosodic features) के मानकीकृत प्रतिनिधित्व के लिए अंतर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक एसोसिएशन की स्थापना हुई। इसकी शुरुआत तो सन् 1886 में फ्रांसीसी एवं अंग्रेजी के अध्यापकों की सम्बंधित सोच से मानी जा सकती है। इस एसोशिएशन की स्थापना सन् 1887 में हुई तथा फ्रांसीसी भाषा में इसको ‘ l’Association phonétique internationale’ नाम दिया गया। बाद में, इस एसोशिएशन ने मुख्य रूप से लैटिन वर्णमाला के आधार पर ध्वन्यात्मक अंकन की एक वर्णमाला प्रणाली विकसित की जिससे संसार की किसी भी भाषा को ध्वन्यात्मक रूप से अंकित किया जा सके। यह ध्यान में रखना चाहिए कि यह किसी भाषा विशेष की लिपि नहीं है। जिन भाषाओं की अपनी लिपियाँ हैं, वे परम्परागत लिपि कहलाती हैं। संसार की परम्परागत लिपियों में, देवनागरी लिपि अपेक्षाकृत सबसे अधिक वैज्ञानिक है…

कुलदीप ठाकुर की कविताएँ

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कुलदीप ठाकुर
जन्म तिथि- 4 सितंबर 1984
शिक्षा- एम.ए.
प्रकाशित कृतियाँ- पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
सम्प्रति- हिमाचल सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग में कार्यरत 
विशेष- 100 प्रतिशत दृष्टिहीन, संगीत में विशारद
पता: गाँव बानसा [मचोदी], तहसील रोहड़ू जिला शिमला
ई-मेल- kuldeepsingpinku@gmail.com

प्यार कभी मरता नहीं है।
प्यार कभी मरता नहीं, जीवित रहता है, मरने के बाद भी
प्यार तन से नहीं होता, प्रेम प्यास है आत्मा की।
शायद इस दुखयारी की, आस्था नहीं है भगवान में,
नित्य पूजा की थाली लेकर, जाती है शमशान में।
वृक्ष के नीचे पूजा करके, दीपक वहाँ जलाती है,
फिर नैनों के जल से उस दीपक को बुझाती है,
जाते हुए कुछ सूखे फूल, बिखेरती उस स्थान में।
नित्य पूजा की थाली लेकर, जाती है शमशान में।
उस के जाने के बाद वहां कोई, रोता हुआ आता है,
उन सूखे हुए फूलों  को, सीने से लगाता है।
फिर बुझा हुआ दीपक जलाकर, उड़ जाता है आसमान में,
नित्य पूजा की थाली लेकर, जाती है शमशान में।
सपने।
मेरी आंखों में जब देखे सपने,
मुझसे बोला  मुझे दे दो सपने,
पैसा चाहे जितना भी ले लो,
बेच दो मुझे अपने सपने।
पैसे नहीं है तुम्हारे पास,
क्यों सजाये है…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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