प्रमोद यादव की कहानी - तेरहवां दिन

कहानी

तेरहवां दिन / प्रमोद यादव

पहला दिन-

दूसरा दिन-

तीसरा दिन-

आज तीसरा दिन है ..बार-बार यह ख्याल दिल में आता तो वह बेबस हो जाता कि क्या करें ? एक अजीब से तनाव ने मन को बेचैन कर रखा था...पूरे रास्ते वह इसी भय से आतंकित रहा कि काका,बुआ, माँ...नाते-रिश्तेदार और गाँव वालों को क्या जवाब देगा ? कैसे मुंह दिखाएगा ? किसी को चाहे लाख वह अपनी मजबूरी समझाए लेकिन कोई कैसे समझेगा ? सब यही कहेंगे कि दीना भी जोरू का गुलाम निकला...पड़ोस के चंदू की तरह...नालायक और कमीना...जो माँ-बाप को बुढापे के दिनों दर-दर भीख माँगने को मजबूर कर छोड़ दिया था..फिर भी लोग चंदू को उससे तो अच्छा ही कहेंगे...बाप के मरने के बाद कम से कम कन्धा देने तो पहुँच गया था..और एक वह.... वह चाहकर भी बाप को कन्धा नहीं दे पाया...लेकिन उसकी विवशता कौन समझे ?

उस दिन राजी को उसने मायके जाने से स्पष्ट मना किया लेकिन वह भी अपने जिद्द पर थी..नीति को साथ ले चली गई. उसी दिन उसका दौरा जाना भी जरुरी था..तीन दिनों का दौरा था.अगर राजी मायके नहीं जाती तो समय पर खबर मिल जाती..और अंतिम बार वह बाबूजी के दर्शन कर लेता..पड़ोस के शर्माजी ने जब तीसरे दिन तडके ही उसे बताया कि दो दिन पहले गाँव से कोई रिश्तेदार बाबूजी के देहावसान की खबर देने आया था..उसने ये भी बताया कि आपका मोबाईल नहीं लग रहा..मैंने भी कई बार कोशिश की पर हर बार ‘बंद’ ही बताया..तब आपको यह खबर सूचित करने कह चला गया.. खबर सुन वह सन्न रह गया था ..पास की कुर्सी में वह लुढ़क सा गया..बाबूजी के साथ गुजरे बचपन से लेकर चार साल पहले तक की स्मृतियाँ बिजली की गति से दिमाग में कौंध गई..वह लगभग रोने को हो गया..आँखों से झर-झर आंसू बहने लगे..जितना वह पोंछता-बाबूजी की यादें उतनी ही और स्पष्ट होती जाती..शर्माजी ने तब बहुत ही संजीदगी के साथ धीरज बंधाते हुए उसे राजी-नीति को लेकर तुरंत ही गाँव जाने को कहा.

ताज्जुब की बात कि राजी बगैर किसी चिल्ल-पों के..बिना किसी अवरोध- विरोध के चुपचाप गाँव चलने तैयार हो गई..पूरे रास्ते भर नीति को ले चुपचाप बैठी रही..और वह.....वह कभी बाबूजी को याद कर आँसूं बहाने लगता तो कभी इस बात का ख्याल कर चिंतित और परेशान हो जाता कि माँ.. काका...बुआ व अन्य रिश्तेदारों को क्या जवाब देगा..बारम्बार रेनू और शंकर की भी याद आती रही ...पूरे चार साल बाद अपने गाँव लौट रहा था.. गाँव पहुंचा तब रात के नौ बज चुके थे..पूरा गाँव सन्नाटे के आगोश में डूबा था..चौक-चौराहे पर एक-दो मरियल किस्म के कुत्ते ही ‘भौं-भौं’ कर रहे थे..दरवाजा खटखटाया ही था कि खुल गया..सामने छोटी बुआ ख़डी थी...काफी अँधेरे में भी वह पहचान गई और ‘दीना...बेटा दीना..’ कहते दहाड़ मार रोने लगी..राजी नीति को गोदी से उतार बुआ के पाँव छूने लगी..तभी अन्दर से माँ के रोने की आवाज आई..वह खुद भी स्वयं पर काबू न पा सका और बच्चों की तरह फूट-फूट रोने लगा..सबने मिलकर उसे अन्दर दीवान पर बिठाया...पानी पिलाया.. समझाया ..चुप कराया..पर सिसकी थम ही नहीं रही थी..माँ भी अब तक सुबक रही थी.आँखें कुछ खुश्क हुई तो उसने देखा-ढेर सारे जाने-पहचाने चेहरों से घिरा है.. बड़ा काका..छोटा काका..बड़ी बुआ..छोटी बुआ..जमुना काकी..छोटा फूफा..रेनू..शंकर ....सबकी नजरें उसे ही घूर रही थी..माँ के सिरहाने एक कोने में राजी और नीति गठरी की तरह सिमटी बैठी थी..बड़ी बुआ ने रात अधिक होने और लम्बे सफ़र की थकान का हवाला दे तीनों का खाना तुरंत लगवाया और परछी में बिस्तर लगाने चली गई..बाकी बातें सुबह करने का निर्देश देते बड़ी बुआ ने सभी को सोने कह दिया..दीना चाहकर भी माँ से कुछ न बतिया सका..वह पल-पल अपराधबोध से ग्रस्त होता गया..पूरी रात सो नहीं सका..बाबूजी को याद कर रोता रहा..माँ को सहज सान्तवना तक नहीं दे पाने का दुःख उसे सालता रहा..

चौथा दिन-

पांचवा दिन-

छठवां दिन-

आज छः दिन हो गए बाबूजी को गुजरे..जिस रात वह आया,पूरी रात जागता रहा..सुबह सब के चहरे पर एक ही सवाल था..बड़े काका ने ही पहले पूछा..जब उसने अपने दौरे में होने की बात और राजी के मायके में होने की बात कही तो काका ने ऐसी नज़रों से देखा जैसे कह रहें हों- ‘ अच्छा बहाना है ‘ माँ ने कुछ भी नहीं कहा..मालूम हुआ कि उसकी अनुपस्थिति में शंकर ने बाबूजी को ‘अग्नि’ दी..उसके आने से छोटा काका थोडा खुश सा दिखा..अब तक उसे ही घर की सियानी करते देखा..इन पांच-छः दिनों में जो-जो हुआ.. कितना कुछ खर्च हुआ, काका ने उसे बताया..बड़े फूफा और छोटे मामा उसी दिन अस्थि विसर्जन के लिए निकले थे जिस दिन वह गाँव आया...आज तडके ही दोनों लौटे..सुबह से घर में इतनी गहमा-गहमी रही कि राजी और नीति बेहद घबराई-घबराई सी लगी.. फूफा और मामाजी इलाहाबाद से मुंडन कराके लौटे थे..घंटों तक दोनों पाटे पर खड़े रहे..घरवाले, नाते-रिश्तेदार और गाँव के लोग उनकी आरती उतार उन्हें नारियल-धोती भेंट करते रहे..वह चुपचाप पीछे खड़े इस रस्म को देखता रहा..राजी भी आरती की थाल लिए खडी थी..वह चकित था कि राजी ने अभी तक कोई ‘बखेड़ा’ कैसे नहीं खडी की..वह माँ के साथ भी ठीक बर्ताव कर रही थी..इन पांच-छः दिनों में वह राजी से पल दो पल ही बतिया पाया..सिर्फ रूपये-पैसे लेने के समय ही उसे बुलवाता..राजी भी बिना कोई सवाल किये पैसे दिए जा रही थी जो उसके लिए एक सुखद आश्चर्य था..सुबह से दौड़-धूप इतनी थी कि रात जल्दी ही नींद आ गई..

सातवाँ दिन-

आठवां दिन-

नौवां दिन-

दसवां दिन-

जिन सवालों का सामना करने से वह घबराता रहा वही सवाल आज गाँव के पञ्च काशी ने कर दी..उसका कहना-बोलना,समझाना उसकी बुजुर्गियत के हिसाब से सही भी था फिर भी न मालूम क्यों उसे वह सब सुनना अच्छा नहीं लगा..काशी के बाद तो कईयों ने यह बात कही और सभी ने परोक्ष-अपरोक्ष रूप से उसे ‘जोरू का गुलाम’ ठहराया..सबने इल्तिजा की कि बाप तो उपेक्षा से मर गया..अब बूढी माँ और बच्चों को बचा ले.. इस घर को बचा ले..उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि किसको क्या कहे ? पूरे चार सालों में एक बार भी वह गाँव नहीं आया था ..कभी-कभार चुपके से राजी से नजरें बचा घर में रूपये भेज देता और कई बार पकड़ा जाता तब राजी से जमकर लड़ाई होती..

आज दसवां दिन है..दशगात्र है..सबसे पहले उसी का मुंडन हुआ..फिर बारी-बारी पच्चीसों का....तालाब के किनारे अजीब ही दृश्य नजर आ रहा था.. जैसे पूरा गाँव वहीँ सिमट आया हो ..दूर-दराज के नाते-रिश्तेदार भी शामिल थे..यहाँ भी कईयों ने एक ही बात को अलग-अलग लहजे में कहा और सब ने घर टूटने का जिम्मेवार उसे ही ठहराया..राजी पर किसी ने उंगली नहीं उठाई...आज पहली बार उसे भी लगा कि घर राजी की वजह से नहीं बल्कि उसकी अपनी कमजोरी और नामर्दी की वजह से टूटा..

अच्छी तरह याद है उसे वह दिन जब चार साल पहले एक छोटी सी बात पर टूटन की स्थिति निर्मित हुई थी..उस दिन राजी ने नए झुमके बनवाये थे..इसके पहले भी उसने दो-तीन और सोने की चीजे राजी के लिए बनवाई थी..उस दिन माँ ने झुमके देख कहा था- ‘ अरे दीना..रेनू के लिए भी तो एक नकफूल बनवा दे..बहुत जिद्द करती है..बहु तो अक्सर जेवर तुड़ाती –बनवाती रहती है..कभी टुकड़ा निकले तो बनवा दे..’ इसके पहले भी माँ कई बार यह बात कह चुकी थी..उस दिन माँ कुछ आक्रोश के स्वर में बोली तो वह सचमुच बहुत शर्मिन्दा हुआ था..पास ही राजी भी खडी थी जो अप्रत्याशित ही माँ को बोल दी- ‘ हमारे पास कोई सोने की खान नहीं है माँ जी ..’

बस इतनी सी बात इस कदर बढ़ी कि मोटी अक्ल की राजी ने यहाँ तक कह दिया- ‘ अगर अपनी लाडली से इतना ही प्यार है तो अपने जेवर तुड़वाकर क्यों नहीं बनवा देती आप...’ राजी उसी दिन पैर पटकने लगी कि उसी दम वह गाँव से जायेगी और फिर कभी नहीं आएगी... उसे भी मजबूरी में जाना पड़ा..तब से वह गाँव नहीं आया...कभी-कभार शंकर-रेनू के ख़त आते..अपनी जरूरतों को लिखते..और चोरी-छिपे वह रूपये भेज देता..लेकिन उनके लिए वह ज्यादा कुछ नहीं कर सका..राजी की पैनी नजर हर वक्त उस पर बनी रहती..आज गाँव आये उसे आठ दिन हो गए.. इन आठ दिनों में राजी उसे एकदम बदली नजर आई..माँ के पास बैठी अक्सर बतियाती रहती..वह चकित था कि इस कदर ‘नार्मल’ कैसे हो गई ? नरसों तेरहवीं है..उसकी छुट्टी भी वहीँ तक है..उसी दिन शाम-रात को निकलेगा तभी दूसरे दिन समय पर आफिस पहुँच पायेगा..आज घर पूरा बाजार सा हो गया है..इस भीड़ में सोना भी एक समस्या है..समझ नहीं आता कि कहाँ और कैसे सोये ?

ग्यारहवां दिन-

बारहवां दिन-

‘ राजी..दुबारा यह बात तुमने जुबान से निकाली तो ईश्वर की सौगंध .. तुम्हारी जुबान खींच लूंगा..’

उसकी गुस्से भरी रोबदार आवाज से राजी काँप गई..ऐसे तेवर उसने पहले कभी नहीं देखे थे..उसने तो बस इतना ही कहा था- ‘ माँ जी के सारे जेवर अब उनके लिए निरर्थक हैं..उसे तुम मांग लो न..’ बस इतना ही बोल पाई थी और वह बरस पड़ा था..उसने सख्त चेतावनी दी कि भूले से भी यह बात फिर कही तो उससे बुरा कोई न होगा..इस बीच माँ कब कमरे में आई और चली गई,दोनों को पता न चला..आज बारहवां दिन है..सारा सामान वगैरह बंध चुका है..जाने के टेंशन में वह ठीक से रात को सो न सका..

तेरहवां दिन-

माँ रोये जा रही थी..बाहर तांगे पर सब सामान लद चुका था..उसकी आँखों में भी आंसू तैर रहे थे..माँ के पैर छूने झुका तो वह और जोरों से रोने लगी..पीछे हटा तो राजी पैर छूने झुकी..पैर छू सीधी हुई तो माँ ने आँचल की ओट से एक लाल कपडे की पोटली निकाल राजी को थमाते बोली- ‘ अब मेरे लिए ये सारे जेवर निरर्थक हैं बहु..ईश्वर करे तुम्हारे लिए हमेशा सार्थक रहे..’

राजी एकाएक रो पड़ी और जेवर लेने से इंकार करते बोली - ‘ नहीं माँ जी...इसे अपने पास ही रखिये..हमारी रेनू की शादी में काम आयेंगे..’ और उसने अपने साईड बैग से एक चौकोर डिब्बा निकाल माँ को देते कहा- ‘ इसमें मेरे सारे जेवर हैं माँ..अब इसे रेनू ही पहनेगी...मुझे अब गहनों का शौक नहीं रहा..एक मंगल-सूत्र ही काफी और सार्थक है मेरे लिए.. मुझे कुछ चाहिए तो बस आपका आशीर्वाद ही चाहिए..वही दीजिये मुझे..’ माँ ने हजार कोशिश की लेकिन राजी ने डिब्बा वापस नहीं लिया..

जिंदगी में पहली बार उस दिन राजी बहुत खूबसूरत लगी..पिछले कई सालों का तनाव बाबूजी की तेरहवीं में ख़त्म जो हो गया था...

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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग , छत्तीसगढ़

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7 टिप्पणियाँ "प्रमोद यादव की कहानी - तेरहवां दिन"

  1. vah pramod ji vyang lekhan to aap ka KAMAL hai hi
    sanjeeda kahani bhi aap utni hi sundarta se nibha
    dete hain meri badhaiee

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    1. श्री अखिलेश जी..पहले कहानियाँ ही लिखता था..यदा-कदा ही व्यंग्य पर कलम चलता था..अब व्यंग्य में ही मजा आता है ..वो भी सम-सामयिक लिखने में..आपका बहुत-बहुत शुक्रिया ..हौसला अफजाई का..प्रमोद यादव

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  2. बहुत अच्छी और संवेदनशील कहानी।

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    1. श्री विकास जी..सादर शुक्रिया ..टिपण्णी के लिए...प्रमोद यादव

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    2. श्री नैनवाल जी...सादर धन्यवाद आपका....

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