शनिवार, 15 नवंबर 2014

अशोक गौतम का व्यंग्य -- आह! कवि की चाह

व्यंग्य@          आह! कवि की चाह
बातों ही बातों में वर्मा जी ने बताया कि मुहल्ले में दबी जुबान है कि लोगों को रात को कवि की आत्मा सड़क पर घूमती हुई मिल रही है तो मैंने वर्मा जी से हंसते हुए कहा,‘ बंधु! जो जीव महीनों अपने कमरे से बाहर न निकल सूरज के स्वागत के गीत लिखता रहा हो उसकी आत्मा मरने के बाद सड़कों पर क्या खाक घूमेगी? सड़कों पर तो वह तब निकले जो उसके पेट में जिंदा जी कुछ गया हो ।

पर कल जब मैं बाजार से गोभी के पत्ते लेकर अंधेरे में घर न चाहते हुए आ रहा था तो अंधे मोड़ पर मुझे गुजरे कवि के खांसने की सी आवाज आई। पर मैंने कोई ध्यान इसलिए नहीं दिया कि आजकल हमारे मुहल्ले के आदमियों को तो आदमियों को कुत्तों तक को भी खांसी हो रही है। पर जब अचानक गया कवि सामने सीना ताने खड़ा हो गया तो मेरे कांधे से गोभी के पत्तों से भरा झोला गिरते- गिरते बचा।  उसे देख मेरी घिग्घी बंध गई तो कवि ने ही सस्वर मुझसे पूछा,‘ और मित्र! कैसे हो? कैसा महसूस कर रहे हो मेरे जाने के बाद?’
‘ काफी मस्ती में हैं सब! सबकुछ वैसे ही चल रहा है। समाज के चलने में कवि या श्रोता जाने पर कोई फर्क नहीं पड़ता। पर हां ! तुम्हारे  जाने के बाद तुम्हारे पड़ोस वाले ‘ार्मा जी जरा दिक्कत में हैं!’
‘ क्यों? ’ लगा कवि की आत्मा भीतर तक आहत हो गई हो।

‘असल में उनको सूझ नहीं रहा कि जो रोटी वे परलोक के नाम पर तुम्हें दिया करते थेे अब किसको दें। यार , जिंदा रहते तो कहीं गए नहीं , पर मरने के  बाद भी यहीं क्यों डटे हो! मरने के बाद ही सही ,आदमी को इधर उधर तो हो ही जाना चाहिए!  कैसे आदमी हो यार तुम भी? पहले तुम मुहल्ले वालों को अपनी कविताओं से डराते रहे और अब ... आखिर तुम हमसे चाहते क्या हो?’ कह मैं उसके मुंह से उसके मन की बात सुनने को उसका मुंह ताकता रहा तो वह लंबी सांस ले बोला, ‘मित्र! मरने के बाद उस मुहल्ले से जाना कौन नहीं चाहता जहां हफ्तों नलके पानी का मुंह ताकते रहें। जहां की स्ट्रीट लाइटों के बल्ब लगने से पहले ही उतर जाएं। सड़कें ऐसीं कि.... लोग अपने घरों का गंद दूसरों के घरों के आगे मुंह अंधेरे अपना मुंह छुपा रख जाएं । मैं भोलाराम का जीव तो हूं नहीं कि जो अभी भी अपनी पेंशन के चक्कर में सरकारी दफ्तरों में चप्पलें चटखाता धक्के खा रहा हो।  मैं तो स्वछंद कवि हूं कवि! असल में क्या है न कि हर लेखक की आत्मा इस लोक को दो ही कंडीशनों के आधार पर छोड़ती है,’ कह उसने गहरी संास ली।

‘कौन सी हैं वे दो कंडीशनें?? जल्दी कहो ताकि मुहल्ले की सीरियल देखती मांओं को अपने बच्चों को कम से कम सीरियल का मजा किरकिरा होने पर सुलाने के लिए यह तो न कहना पड़े कि, सो जाओ वरना कवि की आत्मा आ जाएगी।
‘ किसी भी श्रेणी के लेखक को वैसे तो मरने के बाद भी मोक्ष नहीं मिलता। दूसरे , वह मोक्ष चाहता भी नहीं! उसकी सबसे बड़ी कमजोरी यही होती है। पर फिर भी जो तुम चाहते हो कि मैं मरने के बाद इस मुहल्ले को छोड़कर चला जाऊं तो....?’
‘ कहीं तुम्हारी पांडुलिपियां तो यहां नहीं रह गईं जो तुम उन्हें भेजने को....’

‘काहे की पांडुलिपियां यार!  सब कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा मैंने -सबने ‘शब्दों का कुनबा जोड़ा.....’ कह वह पहली बार हंसा तो मैं खुश हुआ कि चलो, हमारा कवि मरने के बाद ही सही, हंसा तो सही।
‘ तो तुम्हारे नाम की हरिद्वार के पंडों को खिला आएं क्या??’
‘नहीं! उनका तो में पैदा होने से पहले ही घोर विरोधी रहा हूं।’
‘तो क्या तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारा गया- पिहोवा कर आएं?’
‘नहीं, कबीर काशी के बदले  मगहर  में मरने के बाद स्वर्ग नहीं गए थे क्या?’
‘तो?? मरने के बाद भी हमारा पीछा छोड़ने का इरादा नहीं है क्या?’

‘ मित्र! लेखक न हरिद्वार चाहता है न काशी! वह तो बस यही चाहता है कि  उसे जिंदा जी नहीं तो मरने के बाद ही सही एक ठो छोटा -मोटा ऊपर जा बताने  के लिए सम्मान@श्रद्धांजलि मिल जाए ताकि वे लोग भी जान जाएं कि.... और एक मैं हूं कि जिसे जिंदा जी न कोई सम्मान मिला, न मरने के बाद श्रद्धांजलि न तिलांजलि !’ कह कवि की आत्मा सिसक उठी तो मैंने उसे चुप कराते कहा,‘ तो हे दिवंगत कवि ! बस , इत्ती सी बात? ऐसा करते हैं कल रविवार भी  है , सब घर में ही मिलेंगे सो धूप में ताश खेलने के बदले तुम्हारे सम्मान में मुहल्ले में एक कांट्रिब्यूटिड सम्मान समारोह  और उसके बाद तुम्हारे जाने की खुशी में श्रद्धांजलि सभा  कर देते हैं....’
‘दोनों एक साथ क्यों?? मुझे दो बार याद नहीं किया जा सकता क्या??’

‘अरे तुम भी न यार! किस गुजरे वक्त की बात कर रहे हो?  इस बात से अनभिज्ञ क्यों हो कि आज हम सौहार्द के उस संक्रमण दौर से गुजर रहे हैं जहां लोग  जिगरी  दोस्त से भी हाथ मिलाने के तुरंत बाद अपने हाथ डीटोल साबुन से चार बार धो दूसरे ही क्षण भूल जाते हैं .... तो कल तुम्हें मरणोपरांत मुहल्ला श्री के सम्मान से अलंकृत किया जाएगा और उसके बाद भावभीनी श्रद्धांजलि..... ‘शार्टकट का जमाना है भाई ! आज किसीके लिए  न वक्त जिंदों के पास है  और न मरों के पास । चाय- समोसा तो खैर इतनी थकान के बाद होगा ही,’ मैंने हंसते हुए कहा तो कवि की आत्मा ने चैन की सांस लेते मुझसे पूछा,‘  तो कितने बजे आऊं कल ? प्रेस वालों को जरूर बुलाना!’

‘बारह बजे तक आ जाना ,  तब तक आठ- दस लोगों को इकट्ठा तो कर ही लूंगा।’
तो ठीक है। कल बारह बजे मिलते हैं। जो लेट हो जाओं तो मोबाइल पर संपर्क कर बता देना। मैं इंतजार करूंगा।  मेरे पास अब वक्त ही वक्त है।’
‘पर जरा सज धज कर आना।  हमें भी लगे कि..... ’ आगे मैं कुछ कह पाता मैंने पाया कि सामने से कवि की आत्मा गायब थी।

अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन- 173212 हि.प्र.

3 blogger-facebook:

  1. अनुपम व्यंग्य...... बेहद उम्दा और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@आंधियाँ भी चले और दिया भी जले

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    उत्तर
    1. चतुर्वेदी जी, आपने कुछ कहा मेरा प्रयास सार्थक हुआ. आभार.

      हटाएं

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