शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

यशवंत कोठारी का व्यंग्य - आधे अधूरे

ताज़ा व्यंग्य

आधे –अधूरे

यशवंत कोठारी

सरकार काले धन के मकड़ जाल में फंस गई है। न उगलते बन रहा है और न निगलते। कितना धन है न मुझे पता है न आपको पता है न सरकार को पता है न ही पुरानी सरकार को पता था। मगर पाई पाई वापस लेन का कमिटमेंट है जो पुराना है.

विरासत पर सियासत जारी है , पटेल के बिना गांधी अधूरे हैं वैसे गांधी जी तो अधनंगे रहते थे उस फ़क़ीर के नाम से क्यों सियासत की रोटियां सेकी जा रही है ?

सच पूछो तो हम सब आधे अधूरे हैं। राधा के बिना कृष्ण अधूरे हैं, लक्ष्मी के बिना विष्णु अधूरे हैं, पारवती के बिना शिव अधूरे हैं तथा अप्सराओं के बिना इंद्र अधूरे हैं। शिव तो अर्ध नारीश्वर का रूप ले कर पूरा होने का अधूरा प्रयास करते हैं। शहीद दिवस हो या राष्ट्रीय एकता दिवस सब देश की जनता के बिना आधे -अधूरे हैं , सरकार को बड़ा दिल रखना चाहिए.

आधी -अधूरी रोटी खाकर भी देश की जनता सियासत का बोझ और राजाओं के नखरे सहती हैं , और राजा है कि प्रजा के लिए कुछ नहीं। हस्तिना पुर में धृतराष्ट्रों का मेला लगा हुआ हैं और संजय धृतराष्ट्रों को अपनी समझ और सुविधा से महाभारत सुना रहा है। रोम जलता रहता है और नीरो बंसी बजता रहता है। संजीवों का खेल चलता रहता है।

पूरे समाज में खेल पोलमपुर चलता रहता है. समझौते और समर्थन के लिए परदे के पीछे खेल चलता रहता हे. ज्ञानी परम ज्ञानी , ध्यानी, परम ध्यानी ,योगी. परम योगी , भोगी बाबा सब अपनी खोल में चले जाते हैं। अब किसका डर है। ज्ञानी जन जानते हैं परमात्मा भी आत्मा के बिना अधूरे हैं तो गांघी यदि पटेल के बिना अधूरे हैं तो किम आश्चर्यम ? स्वर्ग के बिना नरक अधूरा हे और नरक के बिना स्वर्ग वासी अधूरे हैं। यह अधूरापन ही तो व्यक्ति में अहंकार भर देता है.

हम सब आधे अधूरे हे, पूरा कोन है। अच्छे दिनों के लिए भटकना ही हम सब के नसीब में हैं।

पत्रकारों के माइक छीने जाने लगे हैं उन्हें विरुदवाली गाने के लिए विवश किया जा रहा है। सत्ता, संगठन ,सरकार सब मिलकर गंगा नहा रहे हैं। काले कुबेर गंगा में अपने पाप धो रहे हैं और चमकता चेहरा लेकर सरकार की पीठ पर हाथ रख रहे हैं। खाण्डव प्रस्थ की गंदगी कचरा साफ नहीं हो रहा है क्योंकि सब आधे अधूरे हैं

आधे अधूरे का यह आलाप आत्मालाप ,प्रेमालाप, एकालाप , हो गया लग ता हे, क्योंकि ये सब प्रलाप के पूर्व रूप हे। प्रभु सब को पूरा करे, किसी को आधा अधूरा न रखे , क्योकि शायर ने कहा है

चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिए ,

यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है।

००००००००००००००००००

यशवंत कोठारी , 86 , लक्ष्मी नगर ब्रह्मपुरी बहार, जयपुर -302002

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