शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - सड़कों पर बढ़ रहे हादसे - कारण अनेक

सड़कों पर बढ़ रहे हादसे - कारण अनेक
- ट्रैफिक नियमों को सख्त करना जरूरी -


    यूँ तो समस्याएँ हर देश में होती हैं। कहीं ज्यादा तो कहीं कम, कहीं विकास से संबंधित समस्याएँ तो कहीं आवास की समस्याएँ, बेरोजगारी और जनसंख्या समस्या भी अनेक देशों के लिए विकराल रूप लेती जा रही हैं। हमारा भारत वर्ष ऐसी ही अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है। एक ओर जहाँ हम जनसंख्या और बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे है वहीं दूसरी ओर आतंकवाद और नक्सलवाद हमारे सीने पर मूँग दल रहा है। ये कुछ ऐसी समस्याएँ है जिससे लगभग विश्व के सभी देश त्रस्त है, किन्तु भारत वर्ष में मूलभूत सुविधाओं में शामिल सड़क सुविधा ने एक अलग ही समस्या खड़ी कर दी है। हम अपने देश के नागरिकों को सड़क पर चलते समय सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं। इसका मुख्य कारण सड़कों की खराब स्थिति ही है। केन्द्र सरकार से लेकर प्रदेश सरकार तक कि यह जवाबदारी है कि वह अपने नागरिकों को यातायात की सुरक्षित व्यवस्था उपलब्ध कराये। सड़क सुरक्षा के मामले में भारतवर्ष विश्व के दूसरे देशों से बहुत पीछे है। भारतवर्ष के संदर्भ में यदि यह कहा जाये कि सड़क सुरक्षा संबंधी समस्याएँ आतंकवाद और नक्सलवाद से भी बड़ी समस्या है तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।


    भारतवर्ष सड़क यातायात के मामले में विश्व के तीसरे सबसे बड़े नेटवर्क के रूप में काम कर रहा है, किन्तु इसी से जुड़ी सुरक्षा व्यवस्था में वह फिसड्डी सिद्ध हो रहा है। हमारे देश में सड़क सुरक्षा से जुड़ी सुविधाएँ संतोषजनक स्थिति में नहीं हैं। जहाँ तक मैं समझता हूँ भारतवर्ष नयी सड़कों के निर्माण और पुरानी के रख-रखाव में जो राशि खर्च करता है वह किसी विकसित राष्ट्र से कहीं अधिक है। फिर ऐसी कौन सी कमजोरी है कि हम सड़कों की स्थिति ठीक नहीं रख पा रहे है। हमने सी.सी. रोड से लेकर डामरीकृत सड़कों का जाल बिछाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी हैं। केन्द्रीय सरकार ने प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत फण्ड जारी किये तो स्वयं प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने भी मुख्यमंत्री सड़क योजना के नाम से इस हेतु राशि उपलब्ध करायी है। बावजूद इन प्रयासों के हमारे संकल्प अधूरे ही हैं। कारण की तलाश करें और गहरायी में झांकें तो भ्रष्टाचार ही एकमात्र कारण दिखायी पड़ता है। सड़कों की सुन्दरता के लिए गौरवपथ योजना को सरकारों ने अमल में लाया। महज एक से दो किलोमीटर या इससे भी कम लंबाई की सड़कों के लिए करोड़ों रूपयों का भुगतान ठेका एजेन्सियों को किया गया। गौरवपथ निर्माण के कुछ ही महिनों बाद जर्जर गौरवपथ अपने सीने पर बिछायी गयी रेत, गिट्टी और सीमेन्ट की, निकृष्टता की कहानी बयाँ करता दिखायी पड़ने लगा। बावजूद इसके सरकार  ने न तो ठेकेदार से गुणवत्ताहीन निर्माण के लिए सवाल-जवाब किया और न ही किये गये अनुबंध के अनुसार उन पर कोई ठोस कार्रवाई की गयी।


    सवाल यह उठता है कि हमारे देश में सड़क सुरक्षा का दृश्य इतना भयावह क्यों है? दूसरा प्रश्न यह भी है कि सड़कों पर होने वाले हादसों पर हमारी सरकारों, निजी निर्माण कंपनियों एवं सामाजिक संगठनों के संदर्भित मायने कहाँ तक खरे उतर रहे हैं? वास्तव में यातायात की बढ़ती माँग आधुनिक शैली की मूलभूत आवश्यकता है। हमारे देश में सड़क सुरक्षा से जुड़े जो भी प्रयास अब तक किये गये हैं, वे या तो निष्प्रभावी रहे हैं या फिर आंशिक सफलता पर आकर दम तोड़ चुके हैं। हमारी केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों तक ने दुर्घटनाओं पर नियंत्रण एवं समाधान हेतु राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा परिषद का गठन तो किया, किन्तु अब तक सुरक्षा की दृष्टि से कोई ठोस रणनीति प्रस्तुत नहीं कर पायी है। सड़क दुर्घटना में होने वाली मौतों के लगातार बढ़ते आंकड़ों के बावजूद भी ऐसी कोई राष्ट्रीय नियंत्रण योजना कार्यरूप नहीं ले पायी है जैसी कि पोलियो, क्षयरोग, मलेरिया या अन्य बीमारियों का सामना करने के लिए बनायी गयी है। सामाजिक तथा नागरिक प्रतिष्ठानों की ओर से भी सड़क दुर्घटनाओं के विरोध में उस तरह की गूँज सुनाई नहीं पड़ती जिस तरह की अन्य मुद्दों पर स्पष्ट दिखायी देती है।


    यातायात से संबंधित इस संवेदनशील मुद्दे पर यदि हम तकनीकी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोचें तो हमारे देश में उदारीकरण के बाद से वाहनों की संख्या जिस रफ्तार से बढ़ी है उस रफ्तार से उन साधनों में वृद्धि नहीं की गयी जिन पर वे दौड़ रही हैं। वाहनों के बढ़ते दबाव के अनुरूप सड़कों की गुणवत्ता और विस्तारीकरण पर जरूरी ध्यान नहीं दिया गया है। छोटे शहरों की बात तो दूर जिला मुख्यालयों और राजधानियों में भी सड़कों की दुर्दशा सरकारों को आईना दिखा रही है। बावजूद इन विरोधाभासों के न तो हमारी सरकारें नींद से जागी हैं और न ही सड़कों पर चलने वाले हमारे देशवासी चौकन्ने हुए हैं। सड़क दुर्घटनाओं के दूसरे पहलू पर यदि हम गौर करें तो राज्य सरकारों द्वारा अपनायी गयी लाइसेंसिंग प्रणाली पुराने नियमों पर ही दौड़ लगा रही हैं। आर.टी.ओ. कार्यालय से जारी किये जाने वाले दुपहिया-चौपहिया वाहनों के लाइसेंस प्रायः बिना जाँच परख के जारी कर दिये जाते हैं। आर.टी.ओ. की यह लापरवाही भी छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक में देखी जा रही है। इस तरह की लापरवाही के पीछे सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार के रूप में सामने आ रहे हैं। भरपूर लाइसेन्स शुल्क नियमों के विरूद्ध वसूल करते हुए, राज्य सरकार के उक्त विभाग द्वारा एक बड़े उद्योग का रूप अख्तियार कर लिया गया है। सड़क दुर्घटनाओं का एक प्रमुख कारण समय बाधित हो चुके वाहन भी बन रहे हैं। केन्द्र सरकार के सर्वे आंकड़ों के अनुसार 1.5 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाएँ खराब सड़कों के कारण हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर लगभग 1.75 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाएँ खराब वाहनों के कारण होती दिखायी दे रही हैं। इसी तरह लगभग 1 प्रतिशत दुर्घटनाओं के पीछे खराब मौसम कारण बनकर सामने आ रहा है।


    सड़क दुर्घटनाओं के बढ़ रहे मामले जो गंभीर चिन्ता का कारण हैं उनके पीछे हमारे देशवासियों में ट्रैफिक सेन्स का अभाव होना भी मुख्य कारक रहा है। कुल दुर्घटनाओं के 75 प्रतिशत हादसे ड्राइविंग संबंधी त्रुटियों से हो रहे हैं। सड़कों पर पैदल चलने वाले या सायकिल से अपना काम निपटाने वाले लोग भी सड़कों पर गैर-जिम्मेदाराना बर्ताव कर सड़क हादसों को जन्म दे रहे हैं, रही-सही कसर सड़कों पर मंडराने वाले मवेशी-गाय, बैल, भैंस, कुत्ते आदि पूरा कर रहे हैं। आंकड़ों के आईने में झांका जाये तो उक्त कारणों से 4 प्रतिशत के बराबर हादसे हो रहे हैं। यह चौंकाने वाली बात है कि हमारा देश सड़क दुर्घटनाओं के मामले में विश्व में प्रथम स्थान पर खड़ा है। भारतवर्ष सहित विश्व के सौ से अधिक देशों ने संयुक्त राष्ट्र की पहल पर सन् 2010 से 2020 तक के दशक को सड़क सुरक्षा दशक के रूप में मनाने की स्वीकृति दी है। इसका एकमात्र उद्देश्य सन् 2020 तक सड़कों पर होने वाले हादसों को नियंत्रित कर एक संदेश देना ही है


    सड़कों पर होने वाली दुर्घटनाओं को कम करने के लिए कुछ सख्त कदम उठाये जाने चाहिए। उदाहरणतः राष्ट्रीय राजमार्गों पर सरकारी मदिरा दुकानों सहित अवैध रूप से मदिरा बेचने पर प्रतिबंध लगाया जाये। नशे की हालत में वाहन चालन की दशा में चालक पर कठोर कानूनी कदम उठाये जायें। राज्यवार सड़क सुरक्षा कोष तथा जिला स्तरीय सड़क सुरक्षा समितियों का गठन करते हुए कोष में जुर्माने की कम से कम 50 प्रतिशत राशि जमा करायी जानी चाहिए। स्थायी वाहन चालक लाइसेन्स जारी करने से पूर्व प्रशिक्षण अनिवार्य करते हुए भी सार्थक प्रयास किये जा सकते हैं। इसी तरह के अन्य मूलभूत संशोधनों को लागू करते हुए सड़क हादसों को नियंत्रित किया जा सकता है। समस्या विकराल है, किन्तु पुलिस, जनता, कानून आदि मिलकर काम करें और अपनी जवाबदारी का निर्वाह ईमानदारी पूर्वक करें तो सड़क हादसों में टूट रहे परिवार बचाये जा सकते हैं। संयुक्त प्रयास ही नियंत्रण की बैशाखी का काम कर सकता है।


 


                                               प्रस्तुतकर्ता
                                       (डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                     dr.skmishra_rjn@rediffmail.com

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