गुरुवार, 13 नवंबर 2014

सुशील यादव का व्यंग्य - दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है


दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है .......?

दिल के नादान होने की  अमूमन उम्र  सोलह से बाईस चौबीस की होती है |इस उमर में उल्फत के नगमे ,इश्क के फितूर ,आशिकी के मिजाज ,और आवारगी के न जाने कैसे कैसे चोचले दिमाग में घुसे होते हैं|
कुछ  साइनटिस्टो ने, बता रखा है कि दिल या  दिमाग के फिसलने का न कोई मौसम होता है, न दिन बादल होते हैं,और   न ही कोई उमर होती है |
दिल के ‘बच्चा’ होने की घोषणा कोई भी ,किसी भी उमर में, कर सकता है  |’दिल तो बच्चा   है जी’ कहके किसी भी अक्षम्य अपराध से माफी मागी जा सकती है |    

  अपने तरफ के, अच्छन मिया को  सठियाये हुए (above above sixty sixty) पाच छ साल हो गए|दिल अब भी जवान लिए घूमते हैं |अपने  अतीत के  दस बीस  प्रेमिकाओं के किस्सों  को आज भी  अनुलोम~विलोम की तरह बिना नागा दोस्तों की महफिल में दुहराते रहते हैं |इन किस्सों से बेगम यकीनन नावाकिफ रहती हैं वरना वे भरी  महफिल शीर्षासन करवाने से बाज न आती |

अच्छन मिया का नारा है जो काम करो ‘डंके की चोट’ में करो, मगर डंका इतनी दूर हो कि आवाज बेगम तक न पहुचे |
उनने सठीयाए हुए सालों को, यादों की जुगाली के सहारे बिता देने के कई  सारे प्लान बना रखे थे| टी वी वालों ने उनमे  पानी फेर के रख दिया |सत्यानाश हो इन चेनलों का |मिनट दर मिनट ब्रेकिंग न्यूज दिखा कर ,उत्सुकता को प्रमिका की तरह  ज़िंदा रखते हैं ,कल मिलोगे तो एक अच्छी  बात बताउंगी |मिल लो तो, कहती है कौन सी बात .....?
अच्छन मिया को अफसोस  होता है कि सिवाय इश्क फरमाने और अब्बू मिया की दूकान में अंडे बेचने के वे कुछ कर न सके|

अच्छन मिया दूकान के खाली समय में ‘स्वस्फूर्त दार्शनिक’ हो जाया करते हैं |
सब पुराने प्रकांड विद्वान, पंडित, महात्मा,साधू   लोग ज्ञान कहाँ से  पाते रहे  |?
वे सोचते ,उस जमाने में न साहित्य का भंडार पढने को  था न आज  जैसी गूगल साईट थी |
बस पालथी मार के योग आसन लगा लो, आखे बंद कर  ध्यानस्थ हो जाओ,ज्ञान की बड़ी बड़ी फाइल अपने आप डाउनलोड हो जाती थी |अंत में प्रभु स्वयं आकर पूछते वत्स  कुछ और डाउनलोड करना है ?

अपनी दूकान में दार्शनिकता के अलावा अच्छन मिया को समय समय पर समीक्षक ,आलोचक या क्रुद्ध वक्ता  बनते  इस मोहल्ले के कइयों ने देखा है |
आपने अंडा लिया नहीं कि वे बातों में उलझा लेते हैं |
क्या लगता है आपको ,ये झाड़ू वाले आगे टिक पायेगे .....?
गजब की टेक्नीक है जनाब दाढ़ी वाले की  ,हर किसी से,प्यारा खिलौना, बच्च्चो की तरह छीने जा रहे हैं |
कहीं गाधी झपट लिये, लोगों ने कुछ न कहा चलो,वे महात्मा थे सब के थे ,उनके भी हो लिए कोई बात नहीं | देखते देखते पटेल ले लिए ,शिवाजी ले गए ,नेहरू को छीने जा रहे हैं |जनता के दिलो दिमाग में अपने आदर्श का सिक्का जमाये दे रहे हैं ,भूल के भी अब अटल जाप नहीं करते पता नहीं क्यों ? 
राम ,फिर राम की मैली गंगा, सब उन्ही का हुए जा रहा है |मै तो कहता हूँ ,बातों का माया जाल है,सम्मोहन है | सम्मोहित हुए जा रही है, जनता |इन्हें तंद्रा से आखिर जगाने वाला है कोई ....? 
     
  अच्छन मिया ,मुंशी जी को पढ़े होने का प्रमाण देते कहते हैं ,कलम के जादूगर अकेले  मुन्शी जी थे|उनकी लेखनी में गजब का सम्मोहन था लोग उनके बनाए लिखे पात्रों को आजीवन  बिसरा न पाते थे |
अब जो बातों के जादूगर पैदा हो गए हैं वे ‘मॉस’ को हिप्नोटाईज किये दे रहे हैं |

अपनी जनता , हर किसी के सम्मोहन में, बातों बातों में आ जाती है |कभी योग बाले बाबा, कल के मदारी की तरह ,बकबक करते करते अंत में अपनी दवाई ,अपने नुस्खे के बेच के ,जेबे ढीली करवा लेते हैं |कभी ‘इनट्यूशन’ वाले बाबा  सरे आम लोगों  को बताते हैं कि ‘शक्तियाँ’ कहाँ छीपी हुई हैं क्यों आपके काम में रुकावटें पड रहीं हैं?
कल  ये किया है तो आज ये कर, यहाँ ये चढा वहां  वो टोटका कर  ,शक्तियाँ तेरे काम में मदद के लिए तैयार बैठी हैं |चल ,’दसबंद’ ,इधर ढीली कर |
नादान लाखों लोगों को झांसे में आते करोड़ों ने देखा है,देख रहे हैं  |
इन ‘झाड फूँकिस्टों’ की सम्मोहन विद्या जबरदस्त होती है |
शुरू शुरू में नादाँ दिल वाले कुछ कौतुहल में इनके नजदीक  जाते हैं, बाद में इनके  मुरीद बनते समय नहीं लगता | वे लोग इनका परचम उठा लेते हैं|
अपने तरफ लंबी लाइन के पीछे एकाएक खड़े हो जाने की परंपरा सदियों से है |
”येन गता: सा पन्था” मानने वालों की कमी, कभी न रही|
जिस गली में तेरा घर न हो बालमा उस गली से हमें गुजरना नहीं, जैसी कमोबेश स्तिथि सदियों से बनते रही है |
जहाँ झंडे का रंग हमारे मन के माफिक न हो वहां हमारा क्या काम ....?
लाइन में खड़े होने के, देर बाद पूछते हैं ये लाइन किसलिए है भाई  ?

कोई देर से खड़ा ,खिसियाया हुआ कह देता है मय्यत में आये हैं ,कंडे देना है..... |ये सुन के अगला किसी बहाने खिसक लेता है|जान न पहचान फिर कंडा काहे का ...?
अच्छन मिया के साथ यही कुछ ‘मिटटी’ देने के नाम पर हो जाता है ....|वैसे भी वे किसी की मय्यत में जाने से तौबा किये रहते हैं |   

लेटेस्ट रिपोर्टिंग के लिए. मै कहीं और नहीं भटकता |देश विदेश ,मोहल्ला पडौस की सभी जानकारी बिना कहीं  गए ,अच्छन मिया मार्फत मुहय्या हो जाती है |
मुहल्ला पडौस में लड़की भागने~भगाने के किस्से हों ,रेप बालात्कार की कोई घटना हो तो उनके दूकान में अन्डो की बिक्री में,जबरदस्त  उछाल आ जाता है |
कभी कभी अच्छन मिया जब गुस्से में होते हैं, तो देशी जनता  उनके गुस्से का निशाना बनती हैं |
मसलन ,देखो कैसी भेड चाल है |

जिसे देखो आजकल झाड़ू की बात करता है |
हिम्मत है तो काहे नहीं फेर देते प्रजातंत्र की कीचड़~गन्दगी  में झाड़ू .....?
लड्डू को प्रसाद की तरह टुकडे टुकड़े  बाँट देती है ये जनता |
किसी एक पार्टी को बड़ा सा  टुकड़ा दे के किस्सा ख़तम करो| किसी एक की भूख तो मिटे |
दुअन्नी  चवन्नी पकडाने से ‘ईदी’ मनने   का नहीं, दो तो अठन्नी से उप्पर की दो ....|
ये नादाँ लोग न जाने आमची मुंबई  को कहाँ ले जाने पे उतारू हैं ...क्या पता .?

सुशील यादव
२०२ ,श्रीम सृष्ठी
सनफर्मा रोड ,अटलादरा
वडोदरा 390022
mobile 08866502244 
susyadav7@gmail.com

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  1. बहुत ही सुन्दर, स्तरीय और सामयिक रचना है..पढ़कर बेहद ही आनंद आया..बहुत-बहुत बधाई...प्रमोद यादव

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