बुधवार, 12 नवंबर 2014

सपना मांगलिक का आलेख - जिंदगी हैं बेटियां

जिंदगी हैं बेटियां

बेटा है कुल का दीप ,तो बाती हैं बेटियां

सिर गर्व से हम सबका ,उठाती हैं बेटियां

सुख दुःख का समय हो,या हंसी का मौसम

चन्दन की तरह छाँव ,लुटाती हैं बेटियां

बेटियां इन्द्रधनुषी सात रंगों की छटा सरीखी होती हैं । वह भावना ,रिश्तों को निभाने की क्षमता ,विश्वासपात्र ,सहानुभूति से परिपूर्ण ,सेवाभाव को समर्पित होती हैं । कहा जाता है की बेटा कुल का चिराग है लेकिन कुल का चिराग सिर्फ एक कुल का ही नाम रोशन करता है जबकि बेटियाँ दो ,दो कुलों का नाम रोशन करती है । फूल की खुशबू की तरह दो घर आँगन महकाती है । बेटा यदि सोना है तो बेटियां हीरा होती हैं । वैसे भी आज के दौर में हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं की बेटियां किसी से कम नहीं होती । हम पीटी उषा ,प्रतिभा पाटिल ,इंदिरा गाँधी ,कल्पना चावला ,सुनीता विलियम्स ,किरण वेदी ,सोनिया गाँधी,नैना कोचर,पेप्सिको की इंदिरा नूई ,सरोजनी नायडू ,लता मंगेशकर आदि बेटियों के जीवन काल से प्रेरणा लेनी होगी की उन्होंने अपने माँ,बाप का नाम रोशन कर समस्त नारी जाती का भी मान बढाया ।

हंसती खेलती चहकती महकती फूल सी कोमल गुडिया जब घर आँगन में खेलती है तो अपनी नटखट किलकारियों और बातों से माँ बाप का ह्रदय उल्लाहस से भर देती है । कभी माँ की चूड़ियाँ पहनना ,कभी श्रृंगार करने की कोशिश में अपना पूरा मुंह सौन्दर्य प्रसाधनों से पोत कर इठलाना ,कभी आँखें मुंदती ,कभी मुस्कराती ,कभी नखरे दिखाती नटखट भोली बिटिया कब सब की आँख का तारा बन जाती है ,पता भी नहीं चलता ।

बचपन से ही बेटियां समझदारी का परिचय देती है जितने छोटे छोटे उनके हाथ होते हैं उतने ही छोटे छोटे कार्य वह अपने आप बाल्यावस्था से ही करने की कोशिश में लगी रहती हैं ,जिम्मेदारी का यह भाव बेटियों में जन्मजात होता है ,आखिर उसे ही तो बड़े होकर अन्य कई लोगों के जीवन की धुरी बनना होता है । पढ़ाई में जहाँ बेटा माँ बाप से भागदौड़ करवाता है वाही बेटियां अपनी पढाई स्वयं लगन से करती हैं । जहाँ बेटे की रात दिन जायज नाजायज फरमाइशें पूरी करते करते माँ बाप थक जाते हैं वहीँ बेटी अपने माँ बाप से अपनी फरमाइशे छुपाने और वक्त व् पिता के हैसियत समझकर और सोच विचार कर मांगने में लगी होती है ।

बेटी न केवल अपने माता पिता की अच्छी दोस्त होती है अपितु उनके लिए एक स्नेहपूर्ण नर्स ,एक सलाहकार की भी भूमिका अदा करती हैं जब माँ बीमार होती है तो बेटी स्नेह से उसका सिर सहलाती है ,पिता के लिए अदरक वाली चाय और अखबार देकर उनका मूड सही करने की कोशिश करती हैं । माँ बाप भी दिल खोलकर बेटी से बात कर लेने के बाद खुद को हल्का महसूस करते हैं । मेरे विवाह के बाद पिता दवाई समय पर लेंगे या नहीं ,माँ आराम करेगी या नहीं यह चिंता भी दिन रात बेटी को ही सताती है बेटे को नहीं । बेटी के बिना घर आँगन ,गली चौपालें रिश्ते नाते सभी सूने अधूरे एकांकी होते हैं । सावन के त्यौहार की रौनक भी बेटियों से ही होती है । रक्षा बंधन की मधुर स्नेपूर्ण भावना भी बेटी और बहिन के कारण ही होती है । बहिन के बिना भाई का जीवन और भाई के बिना बहन का सावन अधूरा ही रहता है । जब भाई बहन आपस में झगडा करते हैं तो हर माँ बाप के मुंह से यही निकलता है क्यों परेशां कर रहा है वो तो एक दिन पराये घर चली जायेगी तू ही हमारी छाती पर मूंग दलेगा उम्रभर ।

दूसरी तरफ बेटी का ससुराल कितना ही संपन्न हो और प्रेम करने वाले परिजन उसे मिले हो मगर बेटी मन ही मन अपने माता पिता और भाई बहन को एक पल के लिए भी नहीं भूलती उसका मन हमेशा मायके की खैरियत की दुआ मांगने में लगा रहता है । जहाँ माँ बाप के बुढापे में और उनके हाल चाल पूछने में बेटा अपने कीमती वक्त की बर्बादी समझता है वाही बेटी अपनी अपार ससुराल और पति व् बच्चों की जिम्मेदारियां निभाते हुए भी रोज उनका हाल चाल पूछने और उनसे मिलने का समय निकाल ही लेती हैं

अतः हम कह सकते हैं की बेटियां हमारे जीवन का हिस्सा नहीं वरन सम्पूर्ण जीवन ही होती है । कहा जाता है की बेटे के बिना सृष्टि चल सकती है मगर बेटी के बिना सृष्टि ख़तम हो जाएगी । प्रकृति ने भी बेटियों को सृजन का अधिकार प्रदान कर इस बात की पुष्टि की है ।

 

 

 

साहित्यकार /कवि/स्वतंत्र पत्रकार

सपना मांगलिक (आगरा)up 282005

Sapna8manglik@gmail.com

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