मंगलवार, 18 नवंबर 2014

भूपेन्द्र मिश्र की ग़ज़लें

बहार- - गजल

ये जो ग़ज़लें लिखी हैं तुम्हारे लिये,

कह न देना नहीं ये हमारे लिये

 

याद आऊं किसी दिन कहीं मैं तुम्हें,

गुनगुनाना इन्हें तुम हमारे लिये।

 

जिन्दगी दो ध्रुवों का मिलन ही तो है,

हम तुम्हारे लिये, तुम हमारे लिये।

 

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मगर ऐ खुदा, क्यूं तू रहता जुदा,

कुछ उजाला तो कर, कुछ तो जलवा दिखा।

 

हम तड़पते रहे हैं तुम्हारे लिये,

पास आ जा तो अब तुम हमारे लिये।

 

एक तेरे सिवा और क्या चाहिये ?

देख लूँ मैं तुझे वो नजर चाहिये।

 

कुछ को ये चाहिये, कुछ को वो चाहिये,

मुझको तेरे सिवा और क्या चाहिये ?

 

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पर तू सुनता नहीं क्यों मेरी बात है?

रोशनी है कहाँ ? रात ही रात है।

 

वो ग़ज़ल तो सुना जा हमारे लिये,

जिसको मैंने लिखा था तुम्हारे लिये।

 

ये जो ग़ज़लें लिखी है तुम्हारे लिये,

कह न देना नहीं ये हमारे लिये

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(२)

नशा इश्क का छाया हैं मेरी आंखों में,

मेरी जान जरा आ जा मेरी बाँहों में।

ऐसे देर न कर, जरा आगोश में आ,

मैंने फूल बिछाएं हैं तेरी राहों में।

जाने कब से तू बसी हैं इन निगाहों में,

मैनें ढूंढा है तुझे चाँद और तारों में ।

जो न तू तो क्या रखा है इन बहारों में,

तू ही तो हँस रहीं है हर कहीं नजारों में ।

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(३)

इक ग़ज़ल तो सुना रात अभी बाकी है,

बात हुई ही कहाँ ; बात अभी बाकी है ।

दिल से दिल कि मुलाकात अभी बाकी है,

वायदे हैं मगर ईजहार-ए-वफा बाकी है ।

हुस्न कि इश्क से तकरार अभी बाकी है,

नींद आती है मगर ख्वाब अभी बाकी है ।

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कौन जाने कि सुबह होगी ना होगी कब तक,

है हकीकत यही की रात अभी बाकी है ।

ऐसे चिलमन से ना झाँको जरा आगोश में आ,

बात हुई ही कहाँ बात अभी बाकी हैं ।

इक ग़ज़ल तो सुना रात अभी बाकी है,

दिल से दिल कि मुलाकात अभी बाकी है।

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(४)

रोना नहीं कभी तुम मेरी ग़ज़ल को पढ के,

हर दम ही मुस्कराना मेरी ग़ज़ल को पढ के ।

कुछ याद आने पर जो आंखों में आये आंसू,

चुपके से पोंछ लेना मेरी ग़ज़ल को पढ के ।

ये बात तय शुदा है हम मिल नहीं सकेंगे,

मिल के जुदा जो होते वो लोग और होगें ।

शिकवा गिला न करना मेरी ग़ज़ल को पढ के,

हर दम ही मुस्कराना मेरी ग़ज़ल को पढ के ।

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(५)

जब लोग बहुत हो महफिल में, लेना तुम मेरा नाम नहीं,

ऐसे ही कभी चुपके चुपके कर लेना हमको याद कही।

आये भी याद हमारी तो कहना कि कुछ भी याद नहीं,

पहचान अगर भी लो मुझको कहना कोइ पहचान नहीं।

हम जैसे भाग्य के मारो का हरदम ऐसा ही हाल रहा,

खाना गम आंसूं पी लेना लेकिन करना फरियाद नहीं।

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(६)

कर चुके नफरत बहुत, कुछ प्यार करके देख लो,

प्यार की ताकत को थोड़ा आजमा कर देख लो।

बाहर को पूजा है बहुत ,अन्दर भी अब कुछ देख लो,

औरों की खातिर आज फिर खुद को मिटा के देख लो।

मिटने वाले क्या मिला तुझको मिटाने से यहाँ,

अब आ गया है वक्त कि खुद को बना के देख लो।

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Prof. Bhupendra Mishra “Sufi”

मिलता है आखिर क्या लहू को यूं बहाने से उन्हें,

अगर करना ही कुछ है तो जरा आंसू बहा के देख लो।

ये दुनिया बन नहीं सकती कभी बन्दूक के बल पर सुनो,

सभी मस्ती में झूमेंगे जरा बंशी बजा कर देख लो।

देखा है औरों को, सुना भी है बहुतों से यहाँ,

वो अपने दिल के परदे पर जरा सूफीको अब तुम देख लो।

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(७)

बेवजह ही क्यूं हमारे दिल को तोड़ा आपने,

क्या हमारी थी खता जो यह सजा दी आपने।

एक दिन तो आये थे हमको हँसाने के लिये,

आज क्या हुई बात जो मुझको रुलाया आपने।

ठीक है मैं कुछ नहीं हुँ तुम सबों के सामने,

पर किसी मुरदे सा क्यूं ऐसे जलाया आपने।

लाचार होकर ही झुका हुँ सिज्दे में तेरे ऐ खुदा,

तब मेरे सिने पे क्यूं खंजर चलाया आपने।

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(८)

यही तो दर्द है मेरा; मुझे लूटा बहारों ने,

नहीं तो जो कजाँ आती तो इतना मैं कहाँ रोता?

जला कर आशियाँ मेरा, तमाशा देखने वालों,

अरे यह भी कभी सोचा , न मैं होता तो क्या होता।

न होता इश्क दुनिया में तो इस दुनिया का क्या होता,

न मैं होता, न तुम होते, खुदा भी कुछ नहीं होता।

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(९)

जलवा ये हुस्न लेकर मैं क्या करुँगा, बोलो,

खूने जिगर जो मानो कतरा ए इश्क दे दो।

बेहोश कर चुका है, जामे शबाब तेरा,

आ जाये होश ऐसी थोड़ी शराब दे दो।

दिन के उजाले में तो, कौंधा करे हैं आंखें,

जो चाहती मुहब्बत थोड़ी सी रात दे दो।

हँसती हुई कहानी शायर तेरा न चाहे,

गर चाहिये ग़ज़ल तो मीठा सा दर्द दे दो।

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(१०)

तनहाईयों में खोई तनहा मैं रह गयी,

गाये जिसे न कोई नगमा वो रह गयी।

मांगूं खुदा से क्या जो खुदा ही रहे नहीं,

आयेंगे मेरे पास यही आस रह गयी।

तड़पती है मेरी प्यास बुझाएगा इसको कौन?

रोया करेगी रोज वो बरसात रह गयी।

खोयी रहूं मैं उनमें तमन्ना ये रह गयी,

बाकी बची है रात मगर वो रहे नहीं।

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Prof. Bhupendra Mishra “Sufi”

Poet Introduction:

Prof. Bhupendra Mishra “Sufi”

Address: B.Mishra , Lane No.- 7, Krisna Toli ,

Brahmpura, P.O.- MIT, Muzaffarpur,

Bihar, India PIN-842003

E-Mail- jaijivsansthan@gmail.com

 

Profession: University Professor of Economics in Bihar University, Muzaffarpur from 1962 to 2000

Principal: R.P.S. College , Jaintpur, Muzaffapur

Author of -“Tumhare Liye” (Kavya Sangrah), Bahr-e-Gajal, Swan Song, Hind Ki Jai Kaho, Samya, Jai Jeev

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